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कोरोना योद्धा : सांसों को साधने का समय

WebdeskMay 06, 2021, 01:32 PM IST

कोरोना योद्धा : सांसों को साधने का समय

हमें अपनी जीवन पद्धति, योग, प्राणायाम, प्रकृति से संवाद को पुन: अपनाना होगा। अपनी जड़ों से उखड़ने के परिणाम अच्छे नहीं होते। अपनी जमीन पर खड़े रहेंगे तो कोई वायरस हमें प्रभावित तो कर सकता है, पराजित नहीं ऊपनी छोटी-सी जिंदगी में मैंने ऐसा समय नहीं देखा था। बुखार और तेज खांसी ने पहले मुझे बेहाल किया, फिर मेरी पत्नी भूमिका को। मुझे लगा यह मौसमी बीमारी है, किंतु जब रिपोर्ट आई तो हम भी कोरोना मरीजों में शामिल हो गए। यहां ह्यपॉजिटिवह्ण होना एक सजा थी। सबसे दूर रहना एक मजबूरी। सच में यह भरोसे को हिलाने वाले और बेहद डरावने दिन थे। तुरंत दिल्ली स्थित गंगाराम अस्पताल के डॉ. अतुल गोगिया की सलाह ली और घर पर ही दवाएं प्रारंभ कीं। आरंभ में एक रोटी भी खा पाना कठिन था। मुंह बेस्वाद था। कोरोना का नाम ही आतंकित कर रहा था। अजीब से हालात थे। कुछ अच्छा सोचना भी कठिन था। एक सप्ताह तक यही हाल रहा, किंतु मन को संयमित करते हुए दोस्तों की सलाह पर आयुर्वेद, होम्योपैथ का भी सहारा लिया। इसके अलावा, गिलोय का काढ़ा, नारियल पानी, नींबू पानी, हल्दी पानी, मौसमी और संतरे के जूस पर पहले तीन दिन काटे। हमें लगा कि कुछ बेहतर हो रहा है। सप्ताह भर में चीजें सामान्य होती लगीं। खान-पान, संयम और धीरज दरअसल एक पूंजी हैं। किंतु यह तब काम आती हैं, जब आपका खुद पर नियंत्रण हो। मेरी पहली सलाह यही है कि बीमारी को छिपाना एक आत्मछल है। खुद के साथ धोखा है। अतिरिक्त आत्मविश्वास हमें कहीं का नहीं छोड़ता। इसलिए तुरंत डॉक्टर की शरण में जाना आवश्यक है। प्रकृति के साथ, आध्यात्मिक विचारों के साथ, सकारात्मकता के साथ जीना जरूरी है। योग-प्राणायाम की शरण हमें लड़ने लायक बनाती है। सही मायने में हम अपनी सांसों को साधकर ही अच्छा, लंबा निरोगी जीवन जी सकते हैं। ये २० दिन कैसे गुजरे कहना कठिन है। साढ़े छ: साल की बेटी शुभ्रा की ओर देखते तो आंखें पनीली हो जातीं। मैं और मेरी पत्नी भूमिका एक कक्ष में आइसोलेट हो गए। वह बहुत समझाने पर रोते हुए उसी कमरे के सामने एक खाट पर सोने के लिए राजी हो गई। किंतु रात में बहुत रोती, मुश्किल से सोती। दिन में तो कुछ सहयोगी उसे देखते, रात का अकेलापन उसके और हमारे लिए कठिन था। एक बच्चा जो कभी मां-पिता के बिना नहीं सोया, उसके लिए यह कठिन था। धीरे-धीरे उसे चीजें समझ में आ रही थीं। हमने भी मन को समझाया और उससे दूरी बनाकर रखी। मैं जब यह लिख रहा हूं, तो आज भी वह अलग सो रही है, क्योंकि हम पूरा वक्त देना चाहते हैं कि संक्रमण की संभावना न बचे। भारतीय जनसंचार संस्थान परिसर में रहता हूं। यहां पेड़-पौधों के बीच साफ हवा से आॅक्सीयजन का स्तपर भी सुधर रहा था। सुबह बाहर आकर गुनगुनी धूप लेना और यह सोचना कि विटामिन डी जा रही है। प्राणायाम, कपाल भाति और कुछ सांसों के व्यायाम भी किए। हालात सुधरे तो किताबें उठाईं और पढ़ना प्रारंभ किया। व्यस्त दिनचर्या के कारण बहुत सारी फिल्में देख नहीं सका था, उन्हें देखा। इससे बाहर की बुरी खबरों से बचने में मदद मिली। हमें अपनी भारतीय जीवन पद्धति, योग, प्राणायाम, प्रकृति से संवाद को अपनाने की जरूरत है। संयम और अनुशासन से हम हर जंग जीत सकते हैं। भारतीय अध्यात्म से प्रभावित जीवनशैली ही सुखद भविष्य दे सकती है। अपनी जड़ों से उखड़ने के परिणाम अच्छे नहीं होते। हम अगर अपनी जमीन पर खड़े रहेंगे तो कोई भी वायरस हमें प्रभावित तो कर सकता है, पराजित नहीं। कोरोना से लड़ते हुए देश की सामाजिक और सामूहिक शक्ति का भी प्रकटीकरण हो रहा है। दर्द की तमाम कहानियों के बीच राहत और मानवीय रिश्तों को जगाने वाली तमाम कहानियां भी हैं। इस देश और मानवता ने कितने दुख देखे होंगे, किंतु जीतता अंतत: मनुष्य ही है। कोरोना संकट भी इतिहास बनेगा और देश फिर उठ खड़ा होगा। अपने सपनों में रंग भरने के लिए। भरोसा कीजिए। web desk

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