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भारत

देश नहीं, अंग्रेजों के साथ रही कांग्रेस

WebdeskJan 22, 2021, 10:32 AM IST

देश नहीं, अंग्रेजों के साथ रही कांग्रेस

यह भारतीय इतिहास का अजीब उपहास तथा विडम्बना है कि मजहब के आधार पर भारत का विभाजन स्वीकार करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, देश के स्वतंत्रता संघर्ष में सर्वाधिक भागीदारी का दम्भपूर्ण दावा करती रही है। यह भी कटु सत्य है कि यही कांग्रेस समूचे ब्रिटिश शासन काल में सर्वाधिक अंग्रेज भक्त बनी रही है। नि:संदेह कांग्रेस के संस्थापक ए.ओ. ह्यूम का 1885 में इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य भारत में अंग्रेजी सत्ता की सुरक्षा, सुदृढ़ता को स्थायित्व प्रदान करना था। यदि कांग्रेस के प्रथम बीस वर्षों के कार्यों तथा इसके प्रत्येक वर्ष के अधिवेशन के अध्यक्ष का भाषण पढ़ें तो किसी में भी अंग्रेजी भक्ति, जी हुजूरी तथा राजभक्ति में जरा भी कमी न दिखलाई देगी। 1905 के पश्चात भी यदि राष्ट्रवादी तथा क्रांतिकारी व्यक्तियों को छोड़ दें तो भी कांग्रेस का इतिहास मुख्यत: अंग्रेजों की चापलूसी, वफादारी से भरपूर रहा है। उदाहरणत: 1912 का बांकीपुर अधिवेशन, जिस वर्ष कांग्रेस के जन्मदाता ए.ओ. ह्यूम की मृत्यु हुई थी पूरा अधिवेशन ही भारतीय नेताओं के उसके प्रति शोक भाषणों, यशोगान तथा उसकी महिमामंडन को समर्पित था। 1914 में प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918 र्इं.) की घोषणा पर जब देश में जबरदस्त राजनीतिक परिवर्तन की अपेक्षा थी, कांग्रेस की भूमिका पूर्व की भांति रही। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने युद्ध में संसार भर में जनतंत्रवाद की सुरक्षा के लिए जर्मनी की हार को आवश्यक बतलाया। कांग्रेस ने तन-मन-धन से ब्रिटिश सरकार के प्रति राजभक्ति के प्रदर्शन का निश्चय किया। यह कहा, यदि हम साम्राज्य के स्वतंत्र नागरिक होने के गौरव के अभिलाषी थे, तो हमें साम्राज्य की रक्षा के लिए लड़ना भी आवश्यक था। भारतीय राजनीति में गांधीजी ब्रिटिश सरकार के बिना शर्त सहयोगी के रूप में आये थे। उन्होंने अपने को ब्रिटिश सरकार का भर्ती करने वाला सार्जेन्ट कहा। कांग्रेस ने जी-जान से ब्रिटिश साम्राज्य की सहायता की। लोकमान्य तिलक तथा एनीबेसेंट का होम रूल आन्दोलन का स्वतंत्रता आंदोलन भी, इसमें खो गया। भ्रष्ट कांग्रेस मंत्रिमंडल यद्यपि 1935 का भारत सरकार का अधिनियम पारित होते ही कांग्रेस के नेताओं ने इसका सर्वाधिक प्रतिरोध तथा कटु आलोचना की। पं. नेहरू ने इसे दासता का घोषणापत्र कहा। इसे भारतीय राजा-महाराजाओं, जमीदारों और प्रतिक्रियावादी तत्वों को खुश करने वाला बताया। परंतु सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह हुई कि गांधीजी ने स्वयं 1934 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन की असफलता से नैराश्य को दूर करने के लिए ब्रिटिश शासन की छत्रछाया में कांग्रेसजनों को चुनाव लड़ने को कहा। एक पत्र में उन्होंने के.एम मुंशी को लिखा, कोई अन्य विकल्प नहीं है सिवाय इस प्रयोग को करने के... मैंने अपना मानसिक विरोध छोड़ दिया है। आज इसका विरोध करना बेवकूफी लगता है। (देखें,कलेक्टेड वर्क्स आॅफ गांधी, भाग 5, पृ. 363) कांग्रेस ने चुनाव लड़ा। उन्हें 11 प्रांतों में 7 में बहुमत मिला। 7 जुलाई 1937 को कांग्रेस मंत्रिमंडलों की स्थापना हुई। गांधीजी को प्रांतों में लगभग दो वर्षों (1937-1939) तक रहे कांग्रेस मंत्रिमंडलों के शासनकाल से घोर निराशा हुई। वे कांग्रेस नेताओं के परस्पर द्वेष, कटुता, ऊपर से नीचे तक व्याप्त भ्रष्टाचार, बोगस सदस्यता, रिश्वत लेने की प्रवृत्ति, अनुशासनहीनता, पदलोलुपता, स्वार्थीप्रवृत्ति तथा हिंसक भावनाओं से बुरी तरह आहत हुए। गांधीजी ने इन मंत्रिमंडलों के घिनौने एवं भ्रष्ट कार्यों का वर्णन तत्कालीन गांधी वांगमय, हरिजन तथा यंग इंडिया के अंकों तथा अपने पत्रों में बार-बार किया है। अत: अब कांग्रेस नेताओं की स्वाधीनता के प्रति उदासीनता तथा राजसत्ता हथियाने की भूख बढ़ती गई। विश्व युद्ध तथा कांग्रेस नेतृत्व: सितम्बर 1939 में द्वितीय महायुद्ध की घोषणा होते ही देश की राजनीति में तीव्र गति से प्रगति हुई। भारत के वायसराय लॉर्ड लिनालिथगो ने भारतीय नेताओं से बिना पूछे भारत के विश्वयुद्ध में भागीदार होने की घोषणा कर दी। दुर्भाग्य से कांग्रेस का प्रमुख नेतृत्व इस दिशा में एकमत न था। निश्चय ही राष्ट्र के इस महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णायक मोड़ पर कांग्रेस का नेतृत्व विभाजित, भ्रमित तथा दिशाहीन था। वर्धा की बैठक (9-17 सितम्बर 1939) में गांधी जी ने मित्र राष्ट्रों के प्रति पूरी सहानुभूति जताई। सामान्यत: वे द्वितीय महायुद्ध के दौरान युद्ध में कोई बाधा न डालना चाहते थे।   तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषचन्द्र बोस का मत स्पष्ट था कि युद्ध साम्राज्यवादी है। अत:  किसी भी पक्ष का साथ न दें, पर परिस्थिति का लाभ उठाकर स्वाधीनता के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध एक जन आन्दोलन किया जाए (देखें, आरपी अय्यर तथा एस.एस. भण्डारी, द कांग्रेस कारवां (1885-1945) देखें त्रिपुरी में सुभाष का भाषण पृ. 68-69) पं. नेहरू ने कहा, ब्रिटिश सरकार अपने महायुद्ध में भाग लेने का उद्देश्य बताये, यदि प्रजातंत्र है तो भारत की भी रुचि इसमें है (डीजी तेंदुलकर, महात्मा भाग पांच, पृ. 202) डॉ. राजेन्द प्रसाद तथा सरदार पटेल ने बिना शर्त सहयोग देने की बात की। 10 अक्तूबर 1939 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने तय किया कि भारत के लिए युद्ध तथा शांति के बारे में स्पष्टीकरण के बिना अपना निर्णय नहीं लेना चाहिए। (वीपी मैनन, द ट्रांसफर आॅफ पावर इन इंडिया पृ 65-66) सरकारी गुप्त दस्तावेजों से भी कांग्रेस नेतृत्व की असमंजसपूर्ण स्थिति की जानकारी मिलती है। वस्तुत: युद्ध में भागीदारी के प्रश्न पर कांग्रेस परस्पर बटी हुई थी। सुभाष बोस, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता अंग्रेजों के विरुद्ध जन आंदोलन चाहते थे। गांधीजी इसके लिए बिल्कुल तैयार न थे। उन्हें लगता था कि देश में ब्रिटिश विरोधी वातावरण नहीं है, कम्युनिस्टों से सहायता के प्रति शंका थी तथा देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता न थी। (देखें गृह विभाग की गुप्त फाइल दिनांक 18 जनवरी 1940) मार्च 1940 के रामगढ़ (बिहार) अधिवेशन में इसी आशय का प्रस्ताव पारित किया गया। उल्लेखनीय है कि इसके पश्चात आगामी 6 वर्षों तक कांग्रेस का कोई अधिवेशन न हुआ। युद्ध की बढ़ती हुई परिस्थिति से ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सहयोग प्राप्त करने के लिए पहल की। वायसराय ने 8 अगस्त 1940 को एक घोषणा की जो अगस्त प्रस्ताव कहलाता है। इसमें युद्ध के पश्चात भारतीयों की एक प्रतिनिधि सभा द्वारा नई संविधान सभा के निर्माण की बात की। पर युद्ध के बाद 30 वर्षों तक भारत की सुरक्षा का भार ब्रिटेन के पास रहने को भी कहा। गांधीजी को अगस्त प्रस्ताव में कांग्रेस तथा सरकार के टकराव की आशंका लगी अत: सितम्बर 1940 में उन्होंने मुम्बई में ऐसी परिस्थिति में उचित निर्णय लेने की स्वीकृति प्राप्त कर ली। व्यक्तिगत सत्याग्रह गांधीजी युद्ध में कोई बाधा न चाहते थे। उन्होंने जन आंदोलन स्वीकार न किया बल्कि व्यक्तिगत सत्याग्रह की घोषणा की तथा इसे आखिरी सत्याग्रह कहा (देखें, गुप्त फाइल 3(33/1940) इसका स्वरूप अत्यधिक सीमित, प्रतीकात्मक और अहिंसात्मक था। यह एक प्रकार से रस्म पूर्ति सत्याग्रह अथवा भारतीय जनमानस को भ्रमित करने का प्रयास था। यह सत्याग्रह 1940-1942 तक लगभग 15 माह चला। इसका उद्देश्य सत्य और अहिंसा में आस्था व्यक्त करना, स्वतंत्र भाषण और युद्ध के विरोध में भारतीयों को बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त करना मात्र था। यह सत्याग्रह गांधीजी द्वारा चलाये अभियानों में सबसे कमजोर तथा सबसे कम प्रभावी था (सुमित सरकार, मॉडर्न इंडिया, पृ. 380) सरकारी गुप्त दस्तावेजों के अनुसार यह कुछ भागों में लड़खड़ा  हा था, दूसरे भाग में मृत्यु के निकट था, पुन: अन्य भागों में मर चुका था। (गृह भारत सरकार, फाइल 5.11.1941) 17 अक्तूबर 1940 से प्रारंभ हुए इस सत्याग्रह में जनवरी 1941 तक कुल 635 व्यक्ति बंदी बनाये गये थे (गृह, फाइल, 3/28/1941) 3 दिसम्बर 1941 को एक सरकारी घोषणा से पं. नेहरू तथा मौलाना आजाद को पहले ही छोड़ दिया गया था। एक प्रेस कांफ्रेंस में मौलाना आजाद से पूछा गया, अगर जापान ने भारत पर हमला कर दिया तो भारतीय क्या करेंगे ? इस पर उनका स्पष्ट उत्तर था, सब भारतीय देश की रक्षा के लिए तलवार हाथ में ले लेंगे। उत्तर स्पष्ट था जो तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की मानसिकता का परिचायक है। युद्ध में भाग लेने के संदर्भ में कांग्रेस में परस्पर विवाद बढ़ता गया। गांधी जी ने नेतृत्व से अलग होने का विचार किया तथा इसकी स्वीकृति वर्धा में 15 जनवरी 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने दे दी। व्यक्तिगत सत्याग्रह की असफलता से सरकार का रुख कड़ा होता गया। सरकार मनमाने ढंग से स्वेच्छाचारी शासक की भांति कार्य करने लगी। परंतु जैसे ही युद्ध बढ़ता गया, सरकार को नरमी का रुख अपनाना पड़ा (देखें, एन. मैंसर व ई.डब्ल्यू,आर लूम्बे, द ट्रांसफर आफ पावर, भाग एक, पृ. 880-881) युद्ध से बिगड़ती अन्तरराष्ट्रीय स्थिति पर अमरीका तथा चीन जैसे मित्र राष्ट्रों ने भी भारत के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाने के लिए दबाव डाला। प्रारंभ में प्रधानमंत्री चर्चिल ने कोई ध्यान न दिया। फरवरी 1942 में सिंगापुर के पतन से खतरा बढ़ गया। आखिर सर स्ट्रेफोर्ड क्रिप्स को 23 मार्च 1942 को भारत भेजा गया। उसने युद्ध के पश्चात औपनिवेशिक स्वराज्य की बात की थी। क्रिप्स 20 दिन बाद वापस चला गया। कोई हल न निकला। क्रिप्स की असफलता से सबसे अधिक प्रसन्न चर्चिल था जो अपनी मेज के चारों ओर नाचने लगा था। सांप भी मर गया, लाठी भी न टूटी। भारत छोड़ो आंदोलन संक्षेप में ब्रिटिश कूटनीति ने महायुद्ध के प्रारंभ से लेकर अब तक कांग्रेस नेताओं के मस्तिष्क को उलझाये रखा। कांग्रेस की निष्क्रियता, परोक्ष रूप से अंग्रेजों के लिए सहायता थी। सरकारी गुप्त दस्तावेजों से कांग्रेस की शिथिलता, ढुलमुल नीति तथा उदासीनता की विस्तृत जानकारी मिलती है। यद्यपि कांग्रेस ने लोक भय से इलाहाबाद में हुई कांग्रेस कार्य समिति में भारत छोड़ो आंदोलन प्रस्ताव पास कर दिया था। परंतु तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर हैलियट ने लॉर्ड लिनलियथगो को 31 मई 1942 को भेजे गये गुप्त संदेश में कांग्रेस बैठक का पूर्ण विवरण भी था जिससे ज्ञात होता है कि पं. नेहरू, राजगोपालाचारी, सरोजनी नायडू, भोला भाई इस आंदोलन के पक्ष में न थे, केवल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, कृपलानी, पटेल गांधीजी के साथ थे। पं. नेहरू व मौलाना आजाद की अपनी रुकावटें थीं। गांधीजी की दोनों से कटुता बढ़ रही थी, परंतु बाद में गांधी जी ने दोनों को मना लिया था। बाद में 8 अगस्त 1942 को योजनापूर्वक नेहरू द्वारा प्रस्ताव प्रस्तुत कराया गया था। राजगोपालाचारी प्रारंभ से ही इस आंदोलन के विरोधी थे (कोपले, राजगोपालाचारी, पृ.111) वे इसे बेकार का हंगामा या हुल्लड़ कहते थे। गोविन्दवल्लभ पंत किसी भी प्रस्ताव के विरोधी थे। सैयद अहमद तथा आसफ अली प्रस्ताव के पक्ष में न थे। द्वितीय महायुद्ध के परिप्रेक्ष्य में भारत के राष्ट्रवादी चिंतकों के लिए गंभीर विचारणीय प्रश्नचिन्ह है कि इस महायुद्ध में अंग्रेजों की भरपूर सहायता में भारतीय कम्युनिस्टों तथा राष्ट्रीय कांग्रेस की भूमिका क्या थी ? इस प्रतिद्वन्द्विता में कौन आगे था ? यह सत्य है कि युद्ध में पासा पलटने पर ब्रिटेन को साम्राज्यवादी युद्ध का पोषक बताने वाले भारतीय कम्युनिस्ट रातोंरात ब्रिटेन को जनयुद्ध का दोषी कहने लगे थे। उनकी प्रत्यक्ष रूप से भूमिका राष्ट्रद्रोहपूर्ण, ब्रिटिश सरकार की चाटुकारिता तथा राष्ट्रीय आंदोलन में छुरा घोंपने वाली थी। उनके कार्य ब्रिटिश एजेंट व ब्रिटिश खुफिया पुलिस के से थे। पर क्या राष्ट्रीय कांग्रेस की जबकि भारत स्वतंत्रता के द्वार पर था, कांग्रेस नेता अपने ओछे हथकण्डों से, राजसत्ता की भूख से विह्वल अंग्रेज भक्ति के गीत किसी न किसी रूप से न गाता रहा। उन्होंने अंग्रेजों की जी हुजूरी में राष्ट्रवादियों तथा क्रांतिकारियों के क्रियाकलापों की पूर्ण उपेक्षा की।

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