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राज्य

बिहार  : संकट में प्राणदाता के प्राण

WebdeskJun 01, 2021, 12:03 PM IST

बिहार  :  संकट में प्राणदाता के प्राण

कोरोना काल में बिहार में अब तक 100 से अधिक डॉक्टरों की मौत हो चुकी है। इनमें कई ख्यातिप्राप्त विशेषज्ञ डॉक्टर भी शामिल हैं। पिछले साल भी 42 डॉक्टरों की मौत हुई थी। सूबे में डॉक्टरों की मौतों का आंकड़ा देशभर में सबसे अधिक है। आईएमए ने डॉक्टरों की मौत का पता लगाने के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की है कोरोना की दूसरी लहर ने बड़ी संख्या में देशभर में डॉक्टरों की जान ली है। कोरोना महामारी से खासकर देश भर में सबसे अधिक डॉक्टरों की मौत बिहार में हुई है। दूसरी लहर में राज्य में अब तक करीब 100 डॉक्टर इस महामारी के शिकार हुए हैं। इनमें राज्य के कुछ प्रसिद्ध और विशेषज्ञ डॉक्टर भी शामिल हैं, जिनमें हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रभात कुमार, यूरोलॉजिस्ट के.के. कंठ, बिहार के स्वास्थ्य निदेशक डॉ. टी.एन. सिंह आदि प्रमुख हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अनुसार, पिछले साल कोरोना की पहली लहर में भी राज्य में 42 डॉक्टरों की मौत हुई थी। इस साल देशभर में लगभग 400 डॉक्टरों की संक्रमण से मौत हो चुकी है। बिहार में डॉक्टरों की कोरोना से मौत बेहद चिंताजनक है। बड़ी संख्या में संक्रमण से डॉक्टरों की मौत यह सोचने को बाध्य करती है कि सब कुछ ठीक नहीं है। बिहार में सबसे अधिक डॉक्टरों की मौत बिहार में 4 जुलाई, 2020 को मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल, गया में कार्यरत डॉ. अश्विनी कुमार की कोरोना से मौत हुई थी। यह सूबे में कोरोना से किसी डॉक्टर की मौत का पहला मामला था। डॉ. अश्विनी कुमार कोरोना मरीजों के इलाज में लगे हुए थे और संक्रमित हो गए थे। इस साल 18 मई को जब पटना के प्रख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रभात कुमार की कोरोना से मौत हुई, तब सबका ध्यान कोरोना से डॉक्टरों की हो रही मौत की ओर गया। डॉक्टरों की मौत का सिलसिला अभी भी नहीं थमा है। पटना में रहने वाले डॉक्टरों पर कोरोना का कहर सबसे अधिक बरपा। अभी तक पटना में करीब 50 और मुजफ्फरपुर में 15 डॉक्टर इस महामारी के शिकार हो चुके हैं। पटना के अलावा, राज्य के दूसरे शहरों में भी लोगों की जान बचाते हुए डॉक्टर स्वयं काल-कवलित हो गए। कुल मिलाकर इस साल दूसरी लहर में बिहार में लगभग 100 डॉक्टरों की मौत हुई है। अधिकांश मौतें 1 मार्च से 19 मई के बीच हुई हैं। आईएमए ने बीते 17 मई को देशभर में कोरोना से डॉक्टरों की होने वाली मौतों का आंकड़ा जारी किया था। इसके अनुसार, कोरोना की दूसरी लहर में उत्तर प्रदेश में 37, दिल्ली में 28, आंध्र प्रदेश में 22, असम, तेलंगाना में 19, महाराष्ट्र व पश्चिम बंगाल में 14-14, तमिलनाडु में 11, ओडिशा में 10, कर्नाटक में 8, मध्यप्रदेश में 5, जम्मू-कश्मीर व छत्तीसगढ़ में 3-3, गुजरात, हरियाणा, उत्तराखंड, केरल व त्रिपुरा में 2-2 तथा गोवा व पुडुचेरी में 1-1 डॉक्टर की जान गई है। देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले बिहार में सर्वाधिक 4.42 प्रतिशत डॉक्टरों की मौत संक्रमण से हुई है, जबकि राष्ट्रीय औसत मात्र 0.5 प्रतिशत है। कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 0.15 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 0.7 प्रतिशत, कर्नाटक में 0.6 प्रतिशत, दिल्ली में 0.3 प्रतिशत और तमिलनाडु में 0.1 प्रतिशत है। अराजकता की चपेट में चिकित्सा व्यवस्था एक तरफ तो राज्य में चिकित्सकों का घोर अभाव है, दूसरी ओर यहां के निजी अस्पतालों की दुर्व्यवस्था भी अक्सर सुर्खियों में रहती है। पटना के न्यू बाईपास और छोटे-छोटे स्थानों पर भी कई निजी नर्सिंग होम तथा मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल का बोर्ड टंगा दिख जाता है, जबकि अंदर के हालात कुछ और होते हैं। दलालों के माध्यम से चलने वाले इन अस्पतालों पर सामान्य जन विश्वास भी नहीं करते। कोरोना की मौजूदा लहर में अनेक अस्पतालों में लूट और धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं। बिहार के सबसे प्रतिष्ठित कहे जाने वाले पारस अस्पताल में तो महिला के साथ छेड़खानी और बाद में उसकी मृत्यु का मामला भी तूल पकड़ चुका है। राजेश्वरी अस्पताल में भी कोरोना संक्रमित मरीज की पत्नी के साथ अभद्र व्यवहार की शिकायत की जा चुकी है। हालांकि ऐसे मामले बाद में रफा-दफा ही हो जाते हैं। परिजनों को नहीं मिल रहा योजना का लाभ पिछले साल केंद्र सरकार ने डॉक्टरों को ‘फ्रंट लाइन वॉरियर’ घोषित किया था। साथ ही, इनके लिए एक योजना भी शुरू की थी। इसके अनुसार, कोरोना संक्रमितों के इलाज के दौरान अगर संक्रमण से किसी डॉक्टर की मौत हो जाती है तो उसके आश्रितों को तत्काल 50 लाख रुपये का भुगतान, एक आश्रित को नौकरी या दिवंगत डॉक्टर के सेवा काल का पूरा वेतन दिया जाता है। लेकिन लाल फीताशाही तथा बीमा कंपनियों के टालमटोल रवैये के कारण यह योजना कारगर नहीं हो पा रही है। राज्य में कोरोना संक्रमण से मरने वाले करीब 140 डॉक्टरों में से मात्र 4 के परिवारों को ही बीमा राशि मिल सकी है। इनमें डॉ. उमेश कुमार सिंह, डॉ. रति रमण झा, डॉ. उमेश्वर प्रसाद वर्मा एवं डॉ. नरेंद्र कुमार सिंह के परिजन शामिल हैं। जान गंवाने वाले शेष डॉक्टरों के परिजन तो अब बीमा की आस में अपना धैर्य खो रहे हैं। आश्रितों की सबसे बड़ी परेशानी है कि वे परिवार और बच्चों की देखभाल कैसे करें। बिहार हेल्थ सर्विसेस एसोसिएशन (भासा) व आॅल इंडिया फेडरेशन आॅफ गवर्नमेंट डॉक्टर एसोसिएशन के महासचिव डॉ. रणजीत कुमार का कहना है कि वह इस मामले को मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के संज्ञान में लाएंगे। प्रदेश में चिकित्सकों की कमी बिहार में चिकित्सकों की काफी कमी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार की आबादी लगभग 10 करोड़ है। 2019 तक यह आंकड़ा 12 करोड़ पार कर गया होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक राज्य में 1 लाख 20 हजार चिकित्सक होने चाहिए, जबकि लगभग 5 हजार एमबीबीएस चिकित्सक ही कार्यरत हैं। इसमें नियमित और संविदा पर कार्यरत चिकित्सक भी शामिल हैं। अगर आयुष चिकित्सकों की संख्या शामिल कर ली जाए तो राज्य में 6,830 चिकित्सक कार्यरत हैं। इनमें भी करीब 1,000 चिकित्सक प्रशासनिक पदों पर तैनात हैं। इसके अलावा, कुछ एनेस्थीसिया, पैथोलॉजी जैसे विभागों में हैं, जिनका मरीजों से सीधा वास्ता नहीं होता। यानी सूबे में प्रति 17,685 व्यक्ति पर एक चिकित्सक है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। राष्ट्रीय आंकड़ा प्रति 11 हजार पर एक चिकित्सक है। राज्य में 40 हजार चिकित्सकों का निबंधन हुआ है। सूबे से सालाना 1,000 डॉक्टर अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं, लेकिन आपराध, खराब शिक्षा व स्वास्थ्य सहित तमाम बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण कोई यहां रहना नहीं चाहता। स्वास्थ्य विभाग संविदा पर डॉक्टरों की बहाली की बात करती है, लेकिन अभी तक कुछ हुआ नहीं है। ल्ल मौत के कारण का पता लगाएगा आईएमए आईएमए के अध्यक्ष डॉ. सहजानंद सिंह कहते हैं कि राज्य में बड़ी संख्या में डॉक्टरों की हो रही मौत का पता लगाने के लिए पांच सदस्यीय टीम गठित की गई है। साथ ही, इन मौतों के पीछे कई कारण बताते हैं। उनके मुताबिक, कोरोना संक्रमितों की देखभाल में एक साल से अधिक समय से जुटे डॉक्टरों को आराम करने का मौका नहीं मिला है। काम का बोझ भी इसकी एक वजह है। डॉ. सिंह का मानना है कि बिहार के लोग भावुक होते हैं और अपनी परवाह किये बगैर लगातार रोगियों की सेवा कार्य में जुटे हुए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी डॉक्टरों से आग्रह किया था कि वे अपने निजी क्लिनिक में संक्रमितों का इलाज करें। डॉक्टर कोरोना मरीजों के संपर्क में रहते हैं, इस कारण उनके संक्रमित होने की संभावना बनी रहती है। उन्होंने राज के अस्पतालों में आॅक्सीजन की आपूर्ति को लेकर भी सवाल उठाया। उनके मुताबिक, पटना में लगभग 200 अस्पताल हैं, लेकिन केवल 90 में ही आॅक्सीजन की आपूर्ति हो रही है। शेष बिना आॅक्सीजन के चल रहे हैं। बिहार सरकार इस मामले में तथ्यों के साथ सामने नहीं आ रही है। इस कारण भी दुविधा बनी हुई है। राज्य सरकार को यह सोचना चाहिए कि दिन-रात संक्रमितों की सेवा में जुटे डॉक्टर भी संक्रमित हो सकते हैं और उन्हें अचानक आॅक्सीजन की जरूरत पड़ सकती है। अगर उन्हें तत्काल आॅक्सीजन नहीं मिला उनकी मौत तय है। इसके अलावा, केंद्र सरकार द्वारा घोषित योजना का फायदा भी डॉक्टरों के परिजनों को नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आईएमए कोरोना काल तक सरकार से कोई मांग नहीं करेगा, लेकिन सरकार से हमारा आग्रह है कि वह मृत चिकित्सकों के परिवार पर उदारता से विचार करे। डॉ. सिंह कहते हैं कि लॉकडाउन का फैसला लेने में देरी के कारण सूबे में कोरोना संक्रमण फैला और अधिक मौतें हुर्इं। अभी तीसरी लहर आने की आशंका भी है, इसलिए सरकार को अभी से सचेत हो जाना चाहिए। गंभीर स्थिति से निपटने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। छोटे बच्चों को आॅक्सीजन या वेंटिलेटर पर कैसे रखा जाता है, इसकी जानकारी अधिकांश स्वास्थ्यकर्मियों को नहीं है। राज्य में 10,000 डॉक्टर लगातार काम करने को तैयार हैं, बशर्ते सरकार उनका सही प्रबंधन करे। डॉक्टरों को मिले शहीद का दर्जा : डॉ. राजन शर्मा आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजन शर्मा ने कोविड महामारी के दौरान जान गंवाने वाले डॉक्टरों को शहीद का दर्जा देने की मांग की है। उन्होंने बताया कि 19 मई, 2021 तक देश भर में 1,076 डॉक्टर कोरोना मरीजों की जान बचाते हुए अपने प्राण न्योछावर कर चुके हैं। यह बहुत बड़ी क्षति है। जिस प्रकार सैनिक देश की सीमा की रक्षा करता है, उसी तरह एक डॉक्टर अपने मरीज की जान बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ता है। जब एक जवान वीरगति को प्राप्त होता है तो उसका पार्थिव शरीर तिरंगे से लिपटा हुआ घर आता है। लेकिन जब मरीज को बचाते हुए हुई किसी डॉक्टर की मौत होती है तो उसकी कहीं गिनती नहीं होती है। जब दोनों ही राष्ट्र सेवा करते हुए बलिदान होते हैं तो फिर अलग-अलग व्यवहार क्यों? डॉक्टर अपनी जान की परवाह किए बिना कोरोना मरीजों का इलाज कर रहे हैं। इसके कारण डॉक्टर और उनके परिवार भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। इसके बावजूद डॉक्टरों की मौत का सही आंकड़ा नहीं उपलब्ध कराना चिंता का विषय है। डॉ. शर्मा ने कहा कि राष्ट्र सेवा में लगे डॉक्टरों को सरकार से जो थोड़ी-बहुत मदद मिलती है, उसमें भी अड़ंगा लगा दिया जाता है। निजी क्षेत्र के डॉक्टरों को तो कुछ मिलता ही नहीं। -संजीव कुमार

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