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महामारी में कहां खो गया हमारा राष्ट्रीय चरित्र

WebdeskMay 03, 2021, 02:33 PM IST

महामारी में कहां खो गया हमारा राष्ट्रीय चरित्र

अब ये सवाल पूछने का समय आ गया है कि क्या हमारा कोई राष्ट्रीय चरित्र है. सरकार क्या कर रही है, उसका गणित हमारे पास है. लेकिन हमें क्या करना चाहिए. क्या कोसने भर से हम कोरोना को हरा पाएंगे कल्पना कीजिए, ये कोरोना आपदा न होती, पाकिस्तान और चीन के साथ भारत का दो मोर्चों पर युद्ध होता तो... आपदा तो तब भी होती. युद्ध काल में जो होता अगर हो तो जरा कल्पना कीजिए. युद्धकाल में पेट्रोल, डीजल की राशनिंग हो जाती है. ऐसी स्थिति में ये देश कैसे प्रतिक्रिया देगा. मेरी गाड़ी में तेल डलवाना मेरा अधिकार है. मेरे पास पैसा है, मैं कितना भी डलवाऊं. मेरे अधिकारों का हनन हो रहा है. कैसी सरकार है, जो हमें तेल नहीं दे सकती. सारे बुद्धिजीवी चिल्लाने लगेंगे, सारे कैमरे पेट्रोल पंपों पर होंगे.. गरीब की कार में पेट्रोल नहीं डल पा रहा है. युद्धकाल में अक्सर ब्रेड की सप्लाई बंद हो जाती है. ये इंस्टेंट फूड मोर्चों के लिए बहुत जरूरी होता है. अगर हो जाए तो.... रवीश कुमार का प्रोग्राम होगा- काली स्क्रीन के बाद. अब ब्रेड भी नहीं. ब्रेड का मतलब बस ब्रेड नहीं है. ब्रेड एक पहचान है. गरीब के पास चाय है और ब्रेड है. इस सरकार ने ब्रेड तक छीन ली. बहुत से लोग सैंडविच के बगैर भूखे मर सकते हैं. कई को प्लेट से ब्रेड पकौड़ा गायब हो जाने का सदमा लग सकता है. इस देश ने 1971 के बाद कोई जंग नहीं लड़ी. इसका मतलब कि तीन पीढ़ी ऐसी हैं, जिसने न तो कोई जंग देखी, न अकाल देखा, न ही कोई राष्ट्रव्यापी आपदा. उसने बस जिंदगी को आसान होते देखा. देखा कि कैसे घर में लगा फोन जेब में आ गया. और फिर वो जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन गया. देखा कि स्कूटर बुकिंग पर मिलने वाले देश में दुनिया भर की लग्जरी कारें सड़कों पर आ गईं. सड़कें चौड़ी होते-होते एक्सप्रेस वे बन गईं. विद्यालय स्कूल, फिर कान्वेंट, फिर स्टेट्स सिंबल हो गए. फर्स्ट डिवीजन से निकलकर प्रतियोगिता 99 फीसद नंबरों तक जा पहुंची. मैदान सूने हो गए और पबजी, जीटीए, माइनक्राफ्ट ने आंखों पर चश्मे चढ़ा दिए. देखा कि छोले-भटूरे के साथ पिज्जा आ गया. समोसे के सामने पैटीज आ खड़ी हुईं. कुछ मीठा हो जाए का मतलब गुलाब जामुन से कसैली सी चॉकलेट बन गई. संयुक्त परिवार एकल परिवार बन गए. जिंदगी मैं और मेरे बच्चे होकर रह गई. नानी के घर गायब हो गए, दादी वृद्धाश्रम में पहुंच गई. और साथ ही तैयार हो गया एक ऐसा समाज जो बस सुविधा भोगी था, जो सिर्फ आत्म केंद्रित था. जिसे रेड लाइट पर सबसे आगे निकल जाना था. जिसे जाम में तीसरी लाइन लगाकर सबसे पहले निकल लेने की जल्दी थी. जिसके जीवन में सबसे अहम काम कथित नामी स्कूल में बच्चे का नर्सरी में दाखिला करा लेना था. जिसके लिए ईएमआई हो या फिर कोई और जरिया, ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं जुटा लेना जिंदगी का मकसद था. रिश्ते सिमटते जा रहे हैं. चाचा है, तो बुआ नहीं. बुआ है, तो मौसी नहीं. गर्मियों की छुट्टियां अब नहीं होतीं. अब आईआईटी, जेईई या नीट होता है. एक ऐसा समाज जिसके ऊपर स्वयं के बारे में सोचने के अलावा कोई भार ही नहीं थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन हमेशा से एक राष्ट्रीय चरित्र के पैरोकार रहे हैं. हमेशा से शाखा में सिखाया जाता है कि स्वयं से पहले राष्ट्र. राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारी. हमें बोझ नहीं संबल बनना है. हमें आपदा में भागना नहीं है, लोगों को बचाना है. हमें किल्लत में खुद नहीं खाना, दूसरों को खिलाना है. हमें सफाई के लिए किसी को फोन नहीं करना. खुद जुट जाना है. हमें ब्लड डोनर नहीं ढूंढने, हमें खुद रक्तदान करना है. संघ के प्रयास अपनी जगह हैं. लेकिन ये काम अकेले संघ का नहीं था. ये काम था हमारे पाठ्यक्रम का. हमारे एजुकेशन सिस्टम का. हमारे अध्यापकों का. हमारे अभिभावकों का. लेकिन पूरा सिस्टम क्या सिखाता रहा. बस एक अंधी दौड़ में किसी तरीके से अच्छे कालेजों में दाखिले, मोटे पैकेज, सरकारी नौकरी. बस इतना ही न. क्या कहीं किसी स्कूल या किसी पाठ्यक्रम में ये सिखाया जाता है कि रक्तदान क्यों जरूरी है. सेना दिवस किस दिन होता है. किस दिन हम शहीद दिवस मनाते हैं. क्या कोई बताता है कि बाढ़ की स्थिति में क्या करें. भूकंप आए तो क्या करना चाहिए. महामारी में हमारा आचरण कैसा होना चाहिए. क्या कोई सिखाता है कि स्वयं से पहले राष्ट्र. जी नहीं. इसका नतीजा क्या है. इसका नतीजा ये है कि भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से पढ़ाई करके, डॉक्टरेट इन मेडिसन हासिल करके एक न्यूरोलॉजिस्ट महामारी के समय में जीवन रक्षक दवाओं की कालाबाजारी शुरू कर देता है. एक अस्पताल का स्टाफ मरीज को पानी का इंजेक्शन लगाता है और फिर उस इंजेक्शन को पचास हजार रुपये में बेच देता है. कौन लोग हैं, यो आक्सीजन की कालाबाजारी कर रहे हैं. कौन हैं वो लोग जिन्होंने आक्सीजन कंस्ट्रेटर की जमाखोरी कर ली. दिल्ली पुलिस ने इनका जखीरा बरामद किया है. ये इस तरह कालाबाजारी का मौका समझकर न रखे गए होते, तो सैंकड़ो जान बचाते. सामान्य सा थर्मामीटर बाजार से गायब है. मिल रहा है, तो दो सौ से तीन सौ रुपये. ये कौन कर रहा है. ये कौन है, जो जीवन रक्षक इंजेक्शन ही नकली तैयार कर ले रहा है. भाप लेने की मशीन जैसी चीजें पांच गुना दामों पर बिक रही हैं. डॉक्सी या अजिथ्रोमाइसिन जैसी जीवनरक्षक दवाएं कौन जमाखोरी कर रहा है और बाजार में इनकी किल्लत पैदा कर रहा है. किसने अपने घरों में आक्सीजन सिलेंडर एहतियातन जमा कर रखे हैं. जबकि ये सिलेंडर किसी की जान बचा सकते थे. बहुत आसन जवाब हो सकता है. सरकार रोके. सरकार को रोकना भी चाहिए. लेकिन क्या ये सिर्फ सरकार का काम है. ये सब कौन कर रहा है. हम लोग ही कर रहे हैं. ये लोग किसी और देश से नहीं आए. ये हमारे समाज का ही हिस्सा हैं. अमेरिका में आबादी हमारे मुकाबले कितनी है और देखिए वहां भारत से दोगुने लोग कोरोना वायरस से मारे जा चुके हैं. लेकिन कोई अफरा-तफरी, लूटपाट जैसी स्थिति नहीं है. जहां जिसे कतार में होना चाहिए, वह कतार में है. सरकार की तमाम विफलताएं हैं. चाहे वह केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें. ये दोषारोपण का खेल बहुत लंबा चल सकता है कि किसे आक्सीजन का इंतजाम करना चाहिए था और किसे बेड का. लेकिन ये आपदा काल है. महामारी काल. हमें खुद से ये सवाल नहीं करना चाहिए कि हम कितने जिम्मेदार हैं. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इस बारे में बहुत बारीकी से प्रकाश डाला है- ''शक्ति केवल सेना या शस्त्रों में नहीं होती, बल्कि सेना का निर्माण जिस समाज से होता है , वह समाज जितना राष्ट्रप्रेमी , नीतिमान और चरित्रवान संपन्न होगा , उतनी मात्रा में वह शक्तिमान होगा। ।” क्या हम नीतिवान और चरित्रवान हैं... क्या हम उस दधीची के वंशज हैं, जिसने अपनी अस्थियां समाज कल्याण के लिए दे दीं. क्या हम सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया, से निकलकर मम् भवंतु सुखिनः, मम संतु निरामया पर नहीं आ गए हैं. सरकार क्या कर रही है, उसका गणित हमारे पास है. लेकिन हमें क्या करना चाहिए. सेवा भारती के स्वयंसेवक श्मशानों पर इतनी गर्मी में मौजूद हैं, जिससे कोई लाश लावारिस न रह जाए. लेकिन हो क्या रहा है. एक बच्ची अपनी मां की लाश के पास 24 घंटे तक खेलती रही. जब मां की लाश के अंतिम संस्कार के लिए फोन किया गया, तो बच्ची की बुआओं, चाचा, नाना और नानी ने आने से इंकार कर दिया. क्या ये सरकार कर रही है. एक अस्पताल में फर्जी आरटीपीसीआर टेस्ट करके अपने लोगों को लिटाकर बेड फुल कर दिए. जिससे हर बेड के लिए सौदेबाजी हो सके और आंकड़ों में बेड फुल रहें. क्या ये सरकार कर रही है. एंबुलेंस ड्राइवर चार से पांच किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए दस हजार और बीस हजार रुपये मांग रहे हैं. ये भी क्या सरकार कर रही है. एक बुजुर्ग महिला कोरोना से उपचारित होकर घर पहुंची. बहू और पोती ने दरवाजा खोलने से मना कर दिया. नोएडा की घटना है. क्या ये सरकार कर रही है. हमने देखा कि कैसे कोरोना योद्धाओं को घरों से निकालने के लिए लोग उमड़ पड़े. कैसे कोरोना पीड़ित परिवार बहिष्कृत कर दिए गए. कैसे कोरोना पीड़ितों को मोहल्ले से निकालने के लिए लोग जमा हो गए. ये कौन कर रहा है. क्या ये भी सरकार कर रही है. कितने लोग हैं, जिन्होंने ये तय किया हो कि कोरोना पीड़ित किसी परिवार के पास खाना पहुंचाएंगे. किसी गरीब को दवा देंगे. किसी की अंतिम यात्रा में कंधा भले ही न लगा सकें, लेकिन उस लाश को लावारिस नहीं रहने देंगे. उंगलियों पर गिनने लायक लोग. आपदाएं, महामारी हमारे चरित्र की परीक्षा लेती है. हमारी एकता की भी परिक्षा लेती है. हमारे समाजिक मूल्यों को परखती है. देखती है कि हम कितने मानव हैं. कितने संवेदनशील हैं. हमारा हृदय कितने भावों से भरा है. क्या आपको नहीं लगता कि हम इस परीक्षा में हर स्तर पर विफल होते जा रहे हैं. क्या बस यह भाव होना चाहिए कि मैं बचा रहूं. क्या हम सब ये नहीं सोच सकते कि सब बचे. एकता से हम इस बीमारी से लड़े. जो लोग ठीक हो गए हैं, प्लाजमा दें. जो लोग साधन संपन्न हैं, वे आइसोलेशन या अस्पतालों में पड़े मरीजों को पौष्टिक भोजन पहुंचाएं. कालाबाजारी का शिकार बनने के बजाय उसकी शिकायत करें, उससे सवाल करें. जमाखोरों की सूचना दें. आइये कुछ तो करें, सरकार को कोसने के अलावा. मृदुल त्यागी

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