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विद्यार्थी जी की शहादत से भी नहीं लिया सबक

WebdeskMay 27, 2021, 02:45 PM IST

विद्यार्थी जी की शहादत से भी नहीं लिया सबक

आंखों पर पर्दा डालकर कबीलाई हिंसक संस्कृति को ही पीड़ित दर्शाने का खेल कई दशकों से चल रहा है। गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत भी इनकी आंख नहीं खोल पाई। परंतु अब सीधे सवालों का वक्त आ चुका है और जनता गलत को गलत कहने की हिम्मत देखना चाहती है। ‘मैं हिन्दू-मुसलमान झगड़े की मूल वजह चुनाव को समझता हूं। चुने जाने के बाद आदमी देश और जनता के काम का नहीं रहता।’ क्या आप विश्वास करेंगे कि ये महान पंक्तियां लिखने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी जी अंत में दंगों के दौरान मजहबी भीड़ द्वारा मार दिए गए। अपना सारा जीवन सांप्रदायिकता और मजहबी कट्टरता के खिलाफ आवाज उठाने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी अंत में 25 मार्च 1931 को कानपुर में दंगों के दौरान मजहबी भीड़ के हाथों मार दिए गए। जनता के बीच में रहने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी एक कौम के उन्मादी और हिंसक आचरण को पहचान नहीं पाए और भीड़ को समझाने की कोशिश में उन्हीं के हाथों कत्ल कर दिए गए। ऐसी स्थिति को पाने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी अकेले नहीं हैं। हम नहीं सुधरेंगे का चरित्र मशहूर आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव बताते हैं कि कैसे मजहबी भीड़ ने उनके पिता के सामने उनके दादा की हत्या कर दी थी और इससे उनके पिता पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने अपने बच्चों के नाम मुसलमानी रख दिए। खुद योगेंद्र यादव के बचपन का नाम सलीम था। तो मजहबी भीड़ के हाथों अपनी दादा की मौत देख चुके सलीम ने अपने सारा जीवन सांप्रदायिकता के नाम पर हिन्दुत्व का विरोध किया और जिसका परिणाम ये रहा कि मुसलमानों को देश से निकाला जा रहा है, ये झूठ बोल-बोलकर योगेंद्र यादव और उनकी टोली ने दिल्ली में दंगे जैसी स्थिति बना दी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के गुजरात पहुंचने के बाद गुजरात से शुरू हुए दंगे आगरा से होते हुए दिल्ली में भयावह हो गए। फरवरी में दिल्ली में हुए दंगों से पहले करीब चार-पांच महीने दिल्ली किसी न किसी बात पर जलती रही लेकिन इससे योगेंद्र यादव और उनकी टोली की दुकान बंद नहीं हुई। जब उनकी लगाई वैचारिक आग से पूरी दिल्ली जलने लगी तो योगेंद्र यादव और उनके साथी, भाजपा नेता कपिल मिश्रा पर ठीकरा फोड़ कर चलते बने। नए साल में नया आंदोलन लेकर वे एक बार फिर लौटे और पिछले साल दिल्ली को सांप्रदायिकता की आग में जलाने वाले आंदोलन के बाद इस साल किसान आंदोलन एक लड़की के सामूहिक रेप के आरोपों से कलंकित हुआ। लेकिन क्या इससे योगेंद्र यादव को मिला धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट निरस्त हुआ? नहीं, क्योंकि उन्हें हिन्दुत्व का गाली देने का अभय प्राप्त है। इसी क्रम में तीसरा नाम है कश्मीरी पंडित पत्रकार राहुल पंडिता का। राहुल पंडिता ने कश्मीरी पंडितों के पलायन पर विधु विनोद चोपड़ा के साथ मिलकर एक ऐसी फिल्म शिकारा बनाई कि उसे देखकर कश्मीरी पंडित खून के आंसू रोए। अपनी पूरी फिल्म में राहुल पंडिता और विधु विनोद चोपड़ा मजहबी आतंकवाद और 1990 की ठंड में कश्मीर में हिन्दुओं के साथ जो हुआ, उसके लिए मजहबी सोच को बचाने और पलायन के जिम्मेदार लोगों को भी विक्टिम दिखाने के प्रयास में लगे रहे। सीधे सवालों से बचने को आड़ ऐसे अनगिनत उदाहरण है जब आपको लगता है कि इस खुली मजहबी हिंसा और हिन्दू नरसंहार को लेकर सीधे सवाल होने चाहिए तो कभी सावरकर, जगमोहन, कपिल मिश्रा की आड़ लेकर उन्हें बचाने का प्रयास होता है। कभी इसे हिन्दू जमींदारों के खिलाफ गरीब किसान की लड़ाई बताई जाता है। कभी कोई एक अपवाद दिखाकर ‘सारे धर्म ये ही सिखाते हैं’ का तर्क देकर बच निकलने का रास्ता दे दिया जाता है। वास्तविकता ये है कि आज से 100 वर्ष पूर्व तुर्की के खलीफा के समर्थन में भारत के मालाबार में हिन्दू नरसंहार हो रहा था। इसके 30 साल बाद अलग इस्लामिक राष्ट्र के नाम पर पश्चिमी भारत हिन्दू और सिखों से बलपूर्वक खाली कराया जा रहा था उसके दस बीस साल में ऑपरेशन सर्चलाइट के नाम पूर्वी भारत में 20 लाख हिन्दू मारे जा रहे थे और उसके 10 साल बाद पंजाब और कश्मीर में हिन्दू अपनी जान बचाकर पलायन कर रहे थे। पिछले 100 साल में चारों दिशाओं में नरसंहार देख चुका हिन्दू समाज कब इस सुप्तावस्था से बाहर निकल कर विचार करेगा कि हिन्दू मुस्लिम एकता का अर्थ हीनतापूर्ण आचरण करना या उसे बढ़ावा देना नहीं है। मजहबी उन्माद पर आंखें बंद चर्च पर झूठे हमले की खबर को भी अंतरराष्ट्रीय खबर बना देने वाले, भारत को लिंचिंस्तान घोषित कर देने वाले लोग इस मजहबी उन्माद पर बिल्कुल आंखें मूंदे रहते है। राजनीतिक पार्टियां तो वोट बैंक के दबाव में गोधरा स्टेशन पर खड़ी साबरमती ट्रेन में आग अंदर से लगी थी से लेकर बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था, तक का राजनीतिक स्टंट खेलती ही हैं लेकिन सेक्युलरिज्म और बोलने के चैंपियन पिछले वर्ष श्रीलंका में ईस्टर बम धमाके, स्वीडन और नार्वे में हिंसा, फ्रांस में टीचर की गर्दन काटना, भारत सीएए विरोधी दंगे और इस वर्ष इजरायल में चल रहे संघर्ष पर सिर्फ ग्रीन कार्ड देने का काम करते रहते हैं। क्यों आज पूरे विश्व में एक ही समुदाय हर बार हिंसा के लिए जिम्मेदार होता है। आज पूरा विश्व इस मजहबी सोच और सड़क पर हिंसा करके न्याय मांगने और पीड़ित दिखने के सिंड्रोम से तंग आ चुका है लेकिन ये लेफ्ट, प्रगतिशील और सेकुलरिज्म के नाम पर मिलने वाली ताकत इस कबीलाई हिंसक संस्कृति को हर बार बच निकलने का अवसर दे देती है। उनकी जवाबदेही तय हो या उनसे इस हिंसक आचरण का ठीक से जवाब मांगा जाए, इससे पहले ये लोग उनके सामने ऐसे लोग ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं और उन्हें ही पीड़ित साबित करने में लग जाते हैं। गलत को गलत कहने की हिम्मत हिन्दुत्व, जिसे पिछले 100 वर्षों में भारत लेफ्ट कांग्रेस ने सांप्रदायिकता का पर्याय बना दिया है, उसी का प्रभाव है कि जिस भारत में 100 साल पहले तुर्की के खलीफा के समर्थन में खिलाफत आंदोलन चल रहा था और हिन्दू आर्थिक सहायता से हथियार खरीद कर हिन्दू नरसंहार किया जा रहा था, उस भारत में आज इतनी चेतना और समझ आ गई है कि भारत में एक बड़ा वर्ग मुखर तौर पर अभी इस समय इजरायल जैसे मित्र राष्ट्र का समर्थन कर रहा है और जो फिलिस्तीन का समर्थन कर भी रहे हैं, उनमें वो हिम्मत नहीं है कि आज भारत में खिलाफत जैसा मूर्खतापूर्ण आंदोलन चला सकें क्योंकि जिन्हें इस देश में आज सांप्रदायिक होने का तमगा प्राप्त है, वो अब पूछेंगे कि अरब के लिए भारत में आंदोलन क्यों? जो पूछने की हिम्मत 100 वर्ष पूर्व किसी में नहीं थी। जब तक हिन्दू समाज इस मजहबी ब्लैकमेलिंग, कट्टरता, सड़क पर न्याय मांगने की सनक के खिलाफ खुलकर नहीं लिखेंगे-बोलेंगे और जवाबदेही तय करने के लिए बाध्य नहीं करेंगे भारत में चल रही है ये मजहबी दादागिरी खत्म नहीं होगी इसलिए आज भारत को चाहिए आदर्शवादी और सपनों की दुनिया से निकल कर धरातल में सच्चाई को देखते हुए आज में जीना सीखे ताकि गलत को गलत कह सके। झूठ और प्रोपेगेंडा से को कटघरे में खड़ा कर सके। मजहबी और कट्टरपंथी सोच पर सवाल कर सके और सबसे बढ़कर आदर्शवादिता में आकर वो गलती न करे जो गणेश शंकर विद्यार्थी ने 25 मार्च को की थी। वरना आप कितनी भी बड़े सेक्युलर क्यों न हो अंत में उसी स्थिति को प्राप्त करोगे जैसे इस महान पत्रकार ने प्राप्त की। -अविनाश

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