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राज्य

वेंटिलेटर नहीं, कैप्टन सरकार की नीयत खराब

WebdeskMay 15, 2021, 02:41 PM IST

वेंटिलेटर नहीं, कैप्टन सरकार की नीयत खराब

दिल्ली में 'किसान आंदोलन' से लौटे 'किसान' पंजाब के गांवों तक में कोरोना का संक्रमण फैला रहे हैं। उधर राज्य की कांग्रेस सरकार इसे अनदेखा करते हुए महीनों पहले केन्द्र से भेजे गए वेंटिलेटरों को आज जरूरत पड़ने पर 'खराब' बता रही है राजनीति करके अगर कोरोना जैसी वैश्विक आपदा से जीता जा सकता तो आज पंजाब इस महामारी से मुक्त होता। भीषण मानवीय आपदा के समय की जा रही राजनीति अपना घातक असर भी दिखा रही है, क्योंकि इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त यानी 13 मई को राज्य में 184 संक्रमितों ने दम तोड़ दिया, जबकि 429 की हालत गम्भीर बनी हुई है। संक्रमण के 8494 नए मामले सामने आए हैं। अब तक राज्य में 11,297 संक्रमितों की मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि राज्य में मृत्यु दर 2.4 प्रतिशत है, जो देश में सर्वाधिक है। लेकिन राज्य सरकार को शायद नागरिकों के स्वास्थ्य से ज्यादा चिंता अपनी कांग्रेसी राजनीति चमकाने की है। ताजा घटनाक्रम में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह की सरकार ने वैंटीलेटर के मुद्दे पर केन्द्र को घेरने का घृणित प्रयास किया है। राज्य सरकार का झूठा दावा है कि केन्द्र द्वारा दिए गए वैंटीलेटरों में से अधिकतर खराब हैं। दूसरी ओर दिल्ली की सीमा के साथ-साथ पंजाब के कई हिस्सों में चल रहा 'किसान आन्दोलन' कोरोना प्रसारक बनकर सामने आया है। परन्तु राज्य सरकार राजनीति के चलते अभी भी इस खतरे की अनदेखी करती दिख रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री कोविड केयर फंड से राज्य के तीन मेडिकल कालेजों में फरीदकोट को 113, अमृतसर को 109 और पटियाला को 98 वैंटीलेटरों की आपूर्ति की थी। आज राज्य सरकार कहती है कि इन वेटीलेटरों में फरीदकोट में 23, अमृतसर में 12 और पटियाला में 48 ही काम कर रहे हैं। पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय में इस विषय में दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान चाहे अभी तक पंजाब के महाधिवक्ता अतुल नन्दा ने इन वैंटीलेटरों के मिलने की तारीख की जानकारी नहीं दी है, परन्तु पायनियर की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल जुलाई महीने के अन्त में केन्द्र ने ये वैंटीलेटर राज्य को भेजे थे। इसके अतिरिक्त नन्दा ने अदालत के समक्ष ऑक्सीजन को लेकर भी केन्द्र को घेरने का प्रयास किया। केन्द्र सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता सत्यपाल जैन ने न्यायालय को बताया कि केन्द्र ने पंजाब का आक्सीजन कोटा 227 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 247 मीट्रिक टन कर दिया है। जहां तक पंजाब सरकार ने वेंटिलेटरों के 'खराब' होने की बात कही है तो उसे भी जल्द से जल्द ठीक कर दिया जाएगा और साथ ही पंजाब में वैक्सीन और रेमडेसिविर वैक्सीन की भी जल्द पर्याप्त सप्लाई कर दी जाएगी। अब सवाल पैदा होता है कि राज्य में जब वैंटीलेटरों की आपूर्ति को लगभग दस महीनों से अधिक का समय बीत चुका है तो इनको लेकर अभी तक कैप्टन सरकार क्या करती रही? इनकी प्राप्ति के समय इनकी जांच किस अधिकारी ने की और उसकी रिपोर्ट क्या रही? अगर वैंटीलेटर खराब थे तो इसकी समय रहते जानकारी केन्द्र सरकार को क्यों नहीं भेजी गई और समय रहते इन्हें ठीक क्यों नहीं करवाया गया? गत 6 मई को कोटकपूरा के विधायक कुलतार सिंह सन्धवा ने इसकी फोटो राज्य सरकार के सचिव को भेजी और जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में छपी तो राज्य सरकार की तन्द्रा टूटी। दूसरी ओर पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना के मरीजों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी है।इसका बड़ा कारण दिल्ली की सीमा के साथ-साथ राज्य के कई हिस्सों में चल रहे 'किसान आन्दोलन' को बताया जा रहा है। धरनों में न तो शारीरिक दूरी रखी जा रही है, न ही मास्क आदि का इस्तेमाल किया जा रहा है। यही नहीं, बीमार होने पर किसान जांच भी नहीं करवा रहे हैं। लौटकर उनके संपर्क में आने वाले लोग भी संक्रमित हो रहे हैं। पंजाब में हुई किसान महापंचायतों व धरने-प्रदर्शनों में शामिल किसानों की वजह से भी संक्रमण गांवों तक पहुंचा है। गांव के लोग यह खुलकर नहीं बताते कि जो कोरोना से मरे हैं या जो संक्रमित हैं उनमें कितने ऐसे किसान हैं जो धरनों में शामिल हुए थे। तरनतारन में लगभग 900 किसान दिल्ली धरने से लौटे हैं। इनमें से अब तक सात की कोरोना से मौत हो चुकी है। इनमें भिखीविंड, माणकपुरा व नारला में दो-दो, जबकि नौशहरा पन्नूआ में एक किसान शामिल है। तरनतारन में माणकपुर गांव में 20 से अधिक लोग कोरोनाग्रस्त पाए गए हैं। इनमें सात टीकरी बार्डर पर धरना देकर लौटे हैं, जो अन्य संक्रमित हैं उनमें भी ज्यादातर उन लोगों के सम्पर्क में रहे हैं, जो दिल्ली धरने से लौटे हैं। इसी तरह श्री मुक्तसर साहिब के गांव आलमवाला में 40 कोरोना संक्रमित हैं। इनमें दस ऐसे हैं, जो दिल्ली धरने में शामिल हुए थे। अन्य 30 लोग गांव के ही हैं जो इनकी जान-पहचान के हैं। यह सम्भव है कि इनके संपर्क में ही आने से उन्हें भी कोरोना हुआ हो। गांव में जब इस बारे में लोगों को कुरेदा जाता है तो वे कन्नी काटते हैं। कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां के काफी संख्या में किसान दिल्ली से लौटे हैं और वहां संक्रमितों की संख्या काफी है। जो संक्रमित पाए गए हैं वे इन किसानों के संपर्क में रहे हैं। भिखीविंड में करीब 150 किसान दिल्ली से लौटे हैं, यहां 22 संक्रमित पाए गए हैं। कुल्ला गांव के 165 किसान दिल्ली से आए हैं, यहां 14 संक्रमित हैं। दो अन्य गांवों, नारला व नारली से 50, एकलगड्डा से 140 और नौशहरा पन्नूआ से 80 किसान दिल्ली आन्दोलन में शामिल हो चुके हैं। यहां के आठ गांवों में 117 लोग संक्रमित हैं। सहायक सिविल सर्जन डा. कंवलजीत सिंह बताते हैं कि इन गांवों में कंटेनमेंट जोन बनाए गए हैं। लगता यही है कि बाहर से आने वालों से ही संक्रमण फैला है। बरनाला के धनौला गांव में अब तक 31 लोगों की मौत हो चुकी है। यहां 104 सक्रिय मामले हैं, लेकिन लोग बताने से इनकार करते हैं कि इनमें से कितने दिल्ली धरने से लौटे हैं। वैसे गांव से कुल 1,100 लोग धरने में गए थे। संगरूर के लोंगोवाल, मूनक व मोगा के महेश्वरी, दौलतपुरा व डरौली में भी ऐसी ही स्थिति है। बरनाला के सिविल सर्जन डा. हरिंदरजीत सिंह गर्ग का कहना है कि धरने-प्रदर्शनों में शारीरिक दूरी इत्यादि न रखने जैसी लापरवाही ही संक्रमण फैलने का कारण बन रही है। यहां के तपा व महलकलां से 250 किसान दिल्ली व स्थानीय धरनों में शामिल हो चुके हैं। दोनों गांवों में 156 सक्रिय मामले हैं और 35 की जान जा चुकी है। मानसा के नंगलकलां गांव में 50 मामले आ चुके हैं। इसे भी सील कर दिया गया है। तरनतारन में लगभग 900 किसान दिल्ली धरने से लौटे हैं। इनमें से अब तक सात की कोरोना से मौत हो चुकी है। इनमें भिखीविंड, माणकपुरा व नारला में दो-दो, जबकि नौशहरा पन्नूआ में एक किसान शामिल है। तरनतारन में माणकपुर गांव में 20 से अधिक लोग कोरोनाग्रस्त पाए गए हैं। इनमें सात टीकरी बार्डर पर धरना देकर लौटे हैं, जो अन्य संक्रमित हैं उनमें भी ज्यादातर उन लोगों के सम्पर्क में रहे हैं, जो दिल्ली धरने से लौटे हैं। राज्य स्वास्थ्य विभाग लगातार कह रहा है कि पंजाब के ग्रामीण इलाकों में संक्रमण की गति बढ़ गई है। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बड़ी लापरवाही दिखा रहे हैं। बठिंडा जिले के गांव नथेहा में भी ऐसी लापरवाही के कारण संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया है। यहां 15 दिनों में 11 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से आठ परिवारों ने जांच नहीं करवाई है। जिन तीन परिवारों ने जांच करवाई, उनके सदस्य संक्रमित पाए गए हैं। इतना होने के बावजूद, राजनीतिक स्वार्थों के चलते राज्य में किसान संगठनों की मनमानी की अनदेखी की जा रही है। राज्य सरकार ने राज्य में शनिवार व रविवार को पूर्ण लॉकडाउन लगा रखा है, परन्तु किसान यूनियनों के सदस्य झुण्डों में निकलते हैं, बाजारों में जबरन दुकानें खुलवाने को। इनका कहना है कि सरकारें लॉकडाउन के नाम पर लोगों से अन्याय कर रही है और वे दुकानें खुलवाकर व्यापारी भाइयों का साथ देना चाहते हैं। दिखावे के तौर पर मुख्यमंत्री इन किसानों से सख्ती से निपटने की बात कहते हैं। लॉकडाउन के दौरान किसानों के धरने-प्रदर्शन यह बताने के लिए काफी हैं कि सेकुलरों और भारत विरोधी तत्वों के इशारे पर राजनीति चमकाने और केन्द्र सरकार को बदनाम करने के लिए ये किसान आमजन की जिंदगियों से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं। पंजाब में किसान के नाम पर ऐसी हरकतों के विरुद्ध समाज का एक तबका मुखर होने लगा है। राकेश सैन

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