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भारत

सामाजिक न्याय की स्थायी विरासत

WebdeskApr 15, 2021, 01:35 PM IST

सामाजिक न्याय की स्थायी विरासत

रतन लाल कटारिया बाबासाहेब ने राष्ट्र निर्माण में जो राह दिखाई थी, केंद्र सरकार आज उसी पर चलकर भारत को पुनः विश्व गुरु पद पर प्रतिष्ठापित करने का कार्य कर रही है। बाबासाहेब का मानना था, “मैं चाहता हूं कि लोग सर्वप्रथम भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहें। भारतीय के अलावा कुछ भी नहीं।” बुद्ध, कबीर, महात्मा फुले जैसी महान विभूतियों के विचारों को आत्मसात कर सामाजिक क्रांति के उद्घोषक व पोषक बोधिसत्व भारत रत्न श्रद्धेय बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर का जन्म युग और काल की धाराओं को मोड़ने के लिए ही हुआ था। बाबासाहेब के बहुआयामी व्यक्तित्व को समझने के लिए किसी विद्वान् को भी वर्षों लग सकते हैं। मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूं क्योंकि उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू इतने गहरे हैं, जिसकी थाह पाना कठिन है। 14 अप्रैल, 2021 को पूरे विश्व ने बाबासाहेब की 130वीं जयंती के अवसर पर उन्हें अपनी भावनाओं के नैवेद्य अर्पित कर उनके संघर्षमय जीवन से प्रेरणा ली। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2017-18 में निर्मित डॉ० आम्बेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र व बाबासाहेब की महापरिनिर्वाण भूमि 26, अलीपुर रोड, नई दिल्ली पर डॉ० आम्बेडकर नेशनल मेमोरियल का उद्घाटन किया था। प्रधानमंत्री जी के निर्देशों का अनुसरण कर आज ये केंद्र सोशियो-इकॉनामिक ट्रासफोर्मेशन के केंद्र हैं, जिनमें सामाजिक और आर्थिक अध्ययन के क्षेत्र में अनुसंधान किया जा रहा है। साथ ही ये एक विशेषज्ञ थिंक टैंक के रूप में भी काम करेगा, जिसमे समावेशी विकास और सामाजिक-आर्थिक मामलों पर ध्यान दिया जाएगा। वास्तव में केंद्र सरकार का उद्देश्य इन केंद्रों के माध्यम से नई पीढ़ी को बाबासाहेब के विज़न, विचार और दर्शन को समझाना है। वर्तमान पीढ़ी इस बात से अनभिज्ञ है कि बाबासाहेब अपने समकालिक लोगों में सर्वाधिक शिक्षित व्यक्ति थे और शिक्षा उनके दीर्घकालीन संघर्ष तथा कठोर परिश्रम का परिणाम था। उस महामानव ने समाज में समय के साथ आयी अमानवीय कुरीतियों जैसे—छूआछूत, विभेद, तिरस्कार आदि को स्वयं भोगा था। परन्तु धैर्य की मूर्ति बाबासाहेब ने कभी भी हिंसा का सहारा नहीं लिया, अपितु समाज को जोड़ने के लिए एवं वंचित वर्ग को समाज में उसकी प्रतिष्ठा दिलवाने के लिए अपने जीवन को तिल-तिल जला दिया । वे दलित, शोषित, वंचित समाज को सशक्त, आत्मनिर्भर एवं सम्मानित जीवन देने के कार्य में पूरा जीवन प्रतिबद्ध रहे। बाबासाहेब का मानना था कि सामाजिक समरसता का निर्माण करने से ही सामाजिक समानता हो सकती है। उन्होंने 24 नवम्बर, 1947 को दिल्ली में कहा था, “हम सब भारतीय परस्पर सगे भाई हैं– ऐसी भावना अपेक्षित है। इसे ही बंधु भाव कहा जाता है। उसी का आभाव है। जातियां आपसी द्वेष और ईर्ष्या बढ़ाती हैं। अतः यदि राष्ट्र का अस्तित्व होगा तो इस अवरोध को दूर करना होगा, क्योकि राष्ट्र का अस्तित्व होगा वहीं बंधु भाव पनपेगा। बंधुभाव ही नहीं रहेगा तो समता, स्वाधीनता सब अस्तित्वहीन हो जाएंगे।” बाबासाहेब ने राष्ट्र निर्माण में जो राह दिखाई थी, उसी पर चलकर आज हमारी सरकार भारत को पुनः विश्व गुरु पद पर प्रतिष्ठापित करने का कार्य कर रही है। बाबा साहेब का मानना था, “मैं चाहता हूं कि लोग सर्वप्रथम भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहें। भारतीय के अलावा कुछ भी नहीं।” भाषायी आधार पर राज्यों के गठन का विरोध, हिंदी की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापना, संस्कृत भाषा की शिक्षा और गुणवत्ता, अनुच्छेद—370 का विरोध, मतपरिवर्तन पर उनके विचार, धर्म की उपयोगिता का विचार, श्रमनीति, सुधार, शहरीकरण का महत्व, समान नागरिक संहिता एवं हिन्दू कोड बिल, श्रीमद् भगवद्गीता को प्रदत्त महत्व, महिलाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता, राष्ट्रीय प्रतिबद्धता, आर्थिक योजनाएं, जल और विद्युत नीति में भूमिका आदि अनेक ऐसे विषय हैं, जिनसे उनकी राष्ट्रीय दृष्टि का बोध होता है। संविधान निर्माता के विषय में डॉ० राजेंद्र बाबू 26 नवम्बर, 1949 को सविंधान सभा में कहते हैं, “स्वतंत्र भारत के संविधान शिल्पी डॉ० आम्बेडकर ने अपनी बुद्धि, प्रतिभा और योग्यता की हर कीमत चुका कर देश को एक नया संविधान भेंट कर दिया। संसार में ऐसी मानसिक ऊंचाई और शास्वत प्रतिभा के धनी कर्मठ महापुरुष कभी-कभी ही अवतरित होते हैं।” एक ओर वर्षों के अपमान तो दूसरी ओर करुणा, प्रेम, समता और अहिंसा से ओत-प्रोत भारतीय संस्कृति के अविभाज्य अंग बौद्ध मत का अंगीकार कर बाबासाहेब ने देश के लिये अपने समर्पण का उत्तम उदाहरण दिया। मेरा ऐसा मानना है कि वर्तमान पीढ़ी को बाबासाहेब के इस प्रसंग से सीखना चाहिए की राष्ट्र हित के लिए व्यक्तिगत आघातों को भी भूलना पड़ता है। बाबासाहेब की जयंती पर मेरा युवा पीढ़ी को विशेष सन्देश है कि उनके आदर्शों का पालन केवल विशेष अवसर पर ही न करें, अपितु प्रत्येक क्षण उस राष्ट्रभक्त, मानवतावादी, धर्मप्राण और सात्विक वृति के महापुरुष के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात करें। (लेखक केंद्रीय सामाजिक न्याय अधिकारिता एवं जल शक्ति राज्य मंत्री हैं)

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