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सावरकर मशाल तो ज्वाला भगत सिंह

WebdeskFeb 26, 2021, 09:02 AM IST

सावरकर मशाल तो ज्वाला भगत सिंह

जिन करतार सिंह सराभा को भगतसिंह अपना गुरु मानते थे उन साराभा में उत्कट देशभक्ति की लौ जलाई थी वीर सावरकर ने। भगत सिंह ने कई लेखों में सावरकर को ‘वीर’ कहकर संबोधित किया था और उनको अनूठी विभूति बताया था वीर सावरकर के विरोधियों द्वारा बार-बार अमर हुतात्मा भगतसिंह की शहादत की दुहाई देकर वीर सावरकर की ‘माफीवीर’ कहकर भर्त्सना की जाती है। वास्तव में सरदार भगतसिंह गांधी, गांधीवाद तथा उनकी कांग्रेस से कोसों दूर थे, वे वीर सावरकर के विचारों, व्यक्तित्व एवं कृत्यों से प्रभावित थे। यहां हम इसी पर कुछ चर्चा करेंगे। जन्म से क्रांतिकारी चाफेकर बंधुओं के बलिदान के पश्चात 14 वर्षीय विनायक मन ही मन सोचने लगा, ‘चाफेकर तो चले गये, अब उनके कार्य का क्या होगा ?’ उसी दौरान उसने अनेक समाचार पत्र पढ़े। लगभग सभी ने चाफेकर के साहस, देशप्रेम को किसी ने किसी कारण से गलत ठहराया था। यह सब पढ़कर विनायक के चिंतनशील मन में विचार आया कि अगर देश के लिए हौतात्म्य पाने जैसे महान कार्य की सार्वजनिक रूप से इतनी आलोचना होती रहेगी, तो चाफेकर जैसा देशकार्य करने को कौन तैयार होगा? अगर लोग बस आवेदन, विनतियों को ही देश का काम समझेंगे तो यह गलत होगा। चाफेकर का कार्य किसी को तो संभालना होगा। लेकिन कौन? इसी से उसके मन में विचार आया ‘कोई और क्यों, मैं क्यों नहीं?’ और बस, मात्र 14 साल की आयु में विनायक ने सशस्त्र क्रांतिकार्य की प्रतिज्ञा ली, जो भारत के स्वाधीन होने तक निभायी। क्रांतिकारियों के पुरोधा इतिहास का परिशीलन करने के पश्चात सावरकर ने पाया कि केवल भावना से ओत-प्रोत होकर, एकाध अंग्रेज को मारकर स्वतंत्रता प्राप्ति का कठिन कार्य संभव नहीं होगा, अपितु संगठन बनाना पड़ेगा। श्रीकृष्ण, शिवाजी, रामदास, मैजिनी, गैरिबाल्डी आदि विभूतियों ने जिस प्रकार युक्ति व शक्ति दोनों का प्रयोग किया, वैसा ही कुछ करना होगा। साथ ही क्रांति की यह ज्वाला सेना से लेकर सामान्य व्यक्ति तक, पूरे भारत में धधकानी होगी। अंग्रेज का शत्रु यानी हमारा मित्र, फिर वह चाहे कोई हो, उसकी सहायता लेनी होगी। इन सभी का तथा अन्य संबंधित चीजों के संपूर्ण विवरण का तत्वज्ञान सशस्त्र क्रांतिकार्य को प्रदान करना होगा। इन्हीं उद्देश्यों को लेकर 1900 में उन्होंने अभिनव भारत संगठन की नींव रखी तथा सशस्त्र क्रांतिकार्य को दर्शन प्रदान करने हेतु ‘जोसेफ मैजिनी का चरित्र व कार्य’ एवं ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’, ये दो ग्रंथ लिखे। सावरकर ने ये ग्रंथ इतिहास कथन हेतु नहीं, अपितु सशस्त्र क्रांति में मार्गदर्शन हेतु एक समान सूत्र लेकर लिखे थे। अभिनव भारत संगठन तथा ये तीनों ग्रंथ उनके प्रभावी व्यक्तित्व का ही अविष्कार थे। सावरकर के ही प्रभाव में आकर 1906-07 में मदनलाल ढींगरा, लाला हरदयाल, अय्यर, वीरेंद्र चट्टोपाध्याय, सेनापति बापट, भाई परमानंद सरीखे प्रतिभाशाली युवा सशस्त्र क्रांति में सम्मिलित हुए। इस संदर्भ में उन दिनों लंदन में सावरकर के सहयोगी रहे एम. पी. टी. आचार्य लिखते हैं-‘‘उनका व्यक्तिगत तेज ऐसा था कि उनसे सिर्फ हाथ मिलाने भर से वी.वी. अय्यर और लाला हरदयाल जैसे जिद्दी व्यक्ति न सिर्फ रूपांतरित हुए बल्कि पूरी प्रखरता से सामने आए।’’ (मराठा, 27 मई,1938) सावरकर से सशस्त्र क्रांति की दीक्षा प्राप्त ये सभी युवा सशस्त्र क्रांति की अलख जगाते विश्व के कोने-कोने में पहुंचे व अपने कार्य से नये-नये देशभक्त तैयार करते गये। इन्हीं में से दो सशस्त्र क्रांतिकारी लाला हरदयाल व भाई परमानंद अमेरिका पहुंचे। वहां बाबा सोहन सिंह भकना व उनके साथी कनाडा व अमेरिका में बसे भारतीय युवाओं का एक बड़ा संगठन बना रहे थे। लेकिन संगठन का उद्देश्य क्या हो, आगे क्या व कैसे करना चाहिए, इस संदर्भ में दिशा खोजने हेतु उन्होंने लाला हरदयाल को बुलावा भेजा। लालाजी, भाई परमानंद को लेकर वहां पहुंचे और वहां के भारतीय युवाओं में भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अलख जगायी। उसी से प्रेरित होकर बाबा सोहन सिंह तथा उनके सहयोगियों ने गदर आंदोलन को जन्म दिया। गदर नामक पत्रिका के माध्यम से सावरकर का साहित्य व चरित्र छपवाकर युवाओं में देशप्रेम की चेतना जगायी। हुतात्मा विष्णु गणेश पिंगले के निर्देशानुसार सावरकर की ‘1857 का स्वतंत्रता संग्राम’ पुस्तक ‘गदर’ में क्रमश: छपने लगी। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी जान पड़ता है कि बाबा सोहनसिंह तथा अन्य क्रांतिकारी बाद में वामपंथी विचारधारा से जुड़ गये और इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी जड़ तक को भुला दिया। साथ ही, आगे चलकर उन्होंने गदर आंदोलन में लाला हरदयाल के वास्तविक योगदान को भी नकारा, ऐसे में वे लाला हरदयाल के प्रेरणास्रोत सावरकर को भला क्यों याद रखते ? उनकी इस कृतघ्नता की उन्हीं के साथी गदरी बाबा पृथ्वीसिंह आजाद ने अपनी आत्मकथा ‘क्रांति के पथिक’ में इन शब्दों में भर्त्सना की-‘‘बाबा सोहनसिंह भकना ने भी अपने लेखों, भाषणों व चर्चाओं के द्वारा लाला हरदयाल का अपमान करने का ही प्रयास किया है। बाबा सोहनसिंह का व्यक्तित्व ऋषितुल्य है, इसलिए उनके जैसे लोगों को किसी से द्वेष करना शोभा नहीं देता।’’(क्रांति पथ का पथिक, पृ. 63) अस्तु! लाला हरदयाल से प्रेरित अनेक युवा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित हुए, उन्हीं युवाओं में से एक थे करतार सिंह सराभा। उस समय मात्र 16 साल के रहे करतार सिंह सराभा ‘गदर’ के संपादन विभाग में शामिल हो गये। उस जमाने के युवा लाला हरदयाल के बयानों व व्यक्तित्व से किस कदर प्रभावित थे, इसका वर्णन करते हुए बाबा पृथ्वीसिंह आजाद लिखते हैं, ‘‘हर शिक्षित भारतीय, विशेषकर पंजाबी युवा लालाजी के तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित हो चुके थे।’’ (क्रांति पथ का पथिक, पृ.63) वीर सावरकर से दीक्षित लाला हरदयाल व भाई परमानंद की देशभक्ति से उपजे करतार सिंह सराभा आगे चलकर गदर के एक शीर्ष नेता बने। भगतसिंह के गुरु करतार सिंह सराभा प्रथम विश्व युद्ध का फायदा उठाकर भारत में, विशेषकर पंजाब में सेना व जनता में विद्र्रोह उत्पन्न करने हेतु करतार सिंह भारत पहुंचे। भारत आते ही वे क्रांतियुद्ध के लिए कुशल नेता ढूंढने लगे। तब उन्हें याद आई रासबिहारी बसु की। रासबिहारी स्वयं सावरकर से प्रभावित थे। हिंदुस्तान पत्र के 27 जनवरी, 1946 अंक में प्रकाशित समाचार के अनुसार रासबिहारी ने सावरकर का अभिवादन करते हुए कहा था, ‘सावरकर, आकाशवाणी से आपको प्रणाम करते समय मुझे मेरे वरिष्ठ साथी को प्रणाम करने का आनंद मिल रहा है। आपको वंदन करना यानी साक्षात् त्यागमूर्ति का वंदन करने जैसा है। आपका दिखाया मार्ग ही स्वातंत्र्य प्राप्ति का सच्चा मार्ग है।’ करतार सिंह सराभा गदर में संपादन विभाग में होने के कारण सावरकर साहित्य से अवगत थे और जिनके नेतृत्व में वे काम कर रहे थे, वे रासबिहारी बसु सावरकर को अपना मार्गदर्शक मानते थे। (टू ग्रेट इंडियन रिवोल्यूशनरीज-उमा मुखर्जी, पृ. 157) उनके दूसरे मार्गदर्शक साथी भाई परमानंद सावरकर के शिष्य थे। बाद में उनके साथ फांसी के फंदे पर झूलने वाले विष्णु गणेश पिंगले सावरकर-परंपरा से ही थे। इस प्रकार सभी ओर से सावरकर से जुडेÞ करतार सिंह जैसे देशभक्त का सावरकर के प्रभाव से बच पाना असंभव था। एक दृष्टि से देखें तो करतार सिंह भी सावरकर की प्रतिभा की ही उपज थे। लेकिन क्रांतिकार्य में बरती जाने वाली गोपनीयता व बहुत छोटी आयु में हुतात्मा बनने के कारण करतार सिंह शायद अपने व वीर सावरकर के संबंधों को चित्रित न कर पाये हों, यह भी संभव है। करतार सिंह के बलिदान से भगतसिंह काफी प्रभावित थे। 1928 के आरंभिक मास में प्रकाशित ‘शहीद करतार सिंह सराभा’ लेख में भगतसिंह करतार सिंह के बारे में लिखते हैं, ‘‘भारतवर्ष में बहुत कम ऐसे इंसान पैदा हुए हैं, जिन्हें सही अर्थों में विद्रोही कहा जा सकता है। इन गिने-चुने नेताओं में करतार सिंह का नाम सबसे ऊपर है।’’(भगत सिंह, संपूर्ण दस्तावेज 7-138) यह लेख दिखाता है कि भगतसिंह करतार सिंह सराभा से बहुत प्रभावित थे। फिर भी यहां पर यह स्पष्ट करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्रस्तुत दस्तावेज के संपादक आलेख के शीर्ष में ही टिप्पणी करते हैं, ‘‘शहीद करतार सिंह सराभा को भगतसिंह अपना प्रेरणास्रोत मानते थे। वह उनका चित्र अपने पास रखते थे, और कहते थे, ये मेरे गुरु, साथी व भाई हैं।’’(भगतसिंह, संपूर्ण दस्तावेज 7-138) अब देखिए, वीर सावरकर से लाला हरदयाल, भाई परमानंद, रासबिहारी, पिंगले से करतार सिंह और करतार सिंह से सरदार भगतसिंह तक, यह कड़ी स्पष्ट रूप से देखने मिलती है। सावरकर जी के जिस अद्भुत प्रभाव की बात एम.पी.टी. आचार्य करते हैं, उसे ध्यान में रखते हुए सावरकर के प्रभाव से बच पाना भगतसिंह जैसे युवा के संबंध में बिल्कुल असंभव था। भगतसिंह के साथी सावरकर-प्रभाव में सरदार भगतसिंह के साथी महाराष्ट्र में जन्मे राजगुरु बचपन से ही सावरकर कथा सुनते आये थे। आगे चलकर उनकी मुलाकात वीर सावरकर के बड़े भाई क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर से हुई। उन्होंने ही राजगुरु को क्रांतिकार्य की दीक्षा दी। (राजगुरु: द इन्विजीबल रिवोल्युशनरी-अनिल वर्मा, पृ.94) बाबाराव सावरकर व चंद्र्रशेखर आजाद के संबंध सर्वविदित हैं। आजाद के बलिदान से दो दिन पहले ही उनकी बाबाराव से अंतिम मुलाकात हुई थी। (क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर-द. न. गोखले, पृ.108) यशपाल तो अपनी आत्मकथा में सावरकर बंधुओं के प्रति अपनी श्रद्धा का वर्णन करते दिखाई देते हैं। वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि किसी भी महापुरुष को देखकर उसके पैर छूने की इच्छा उन्हें कभी नहीं हुई... लेकिन बाबाराव सावरकर को देखकर ऐसी इच्छा हुई और उन्होंने झुककर उनके पैर छुए। (सिंहावलोकन, पृ. 110) भगतसिंह सावरकर-प्रभाव में सरदार भगतसिंह के लगभग सभी वामपंथी जीवनीकार सावरकर के प्रभाव को नकारते हुए भगतसिंह को लेनिन की छाया में खड़ा करते हैं। लेकिन अगर भगतसिंह के उपलब्ध साहित्य का अवगाहन करें तो पता चलता है, उन्होंने चित्रगुप्त द्वारा लिखी सावरकर की जीवनी ‘लाइफ आॅफ बेरिस्टर सावरकर’ पढ़ी थी और उससे वे काफी प्रभावित थे। (भगतसिंह के दस्तावेज, पृ.171) सावरकर के ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’, ‘हिंदू पदपादशाही’ जैसे ग्रंथ तो उन्होंने पढेÞ ही थे, साथ ही वे सावरकर का ‘श्रद्धानंद’ नियमित पढ़ते थे। (तत्रैव 243) अगर सावरकर से हाथ मिलाते ही लाला हरदयाल जैसों के सावरकर के कायल हो जाने के बारे में सोचें तो समझ आता है, सावरकर चरित्र व साहित्य पढ़ने के पश्चात सावरकर प्रभाव से बच पाना कितना कठिन रहा होगा। और तो और और अगर पाठक सरदार भगतसिंह जैसा प्रतिभाशाली व संवेदनशील देशभक्त युवक था, तब तो ऐसा बिल्कुल भी संभव नहीं था। सावरकर परंपरा के वाहक भगत सिंह सरदार भगत सिंह सावरकर साहित्य के मात्र पाठक नहीं थे, अपितु वाहक भी थे। पाठक होना सामान्य बात है। पाठक होने का अर्थ यह नहीं है कि हम उन विचारों से जुड़ गये। उसका अर्थ मात्र इतना होता है कि हम उन विचारों से अवगत हैं, हम उन विचारों को जानते हैं। लेकिन वाहक होने का अर्थ है उस परंपरा से जुड़ना, उसका प्रचार करना। इस दृष्टि से देखा जाये तो भगतसिंह वीर सावरकर के विचारों के वाहक, प्रचारक भी रहे। उन्होंने सावरकर की उस समय दुर्लभ पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ का प्रकाशन भी किया था। यह बात तो सब जानते हंै, लेकिन यह बात कम लोग ही जानते हैं कि श्रद्धानंद में प्रकाशित लेखों का प्रभाव भगतसिंह पर बहुत था। सावरकर के एक लेख ‘अत्याचार शब्दाचा अर्थ’ को भगतसिंह ने ‘आतंक के असली अर्थ’ नाम से ज्यों का त्यों प्रकाशित किया था, जो आज भी उनके संपूर्ण दस्तावेज में उपलब्ध है। (12-243) श्रद्धानंद में सावरकर ने जिस प्रकार काकोरी प्रकरण पर लेख लिखे थे वैसे ही भगतसिंह ने भी किरती में लिखे थे। इतना ही नहीं, जिस प्रकार सावरकरजी ने मई 1928 को ‘वीरमाता क्षीरोदवासिनी देवी’

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