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‘सिंधु नेत्र’ के दायरे में शत्रु

WebdeskMar 12, 2021, 12:00 AM IST

‘सिंधु नेत्र’ के दायरे में शत्रु

इसरो ने 28 फरवरी को 5 भारतीय उपग्रह सहित अमेरिका के 13 और पहली बार ब्राजील के एक उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया। इसमें ‘सिंधु नेत्र’उपग्रह भी शामिल है, जिसके प्रक्षेपण से भारत की निगरानी क्षमता बढ़ गई है। यही नहीं, न्यू इंडिया स्पेस लिमिटेड ने पहली बार 14 विदेशी उपग्रहों का व्यावसायिक प्रक्षेपण किया इसरो ने एक बड़ी सफलता हासिल करते हुए देश की निगरानी क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित ‘सिंधु नेत्र’ उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से वर्ष 2021 के पहले अभियान में इसरो ने पीएसएलवी-सी51 के माध्यम से एक साथ 19 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया, जिनमें अमेरिका के 13, ब्राजील का अमेजोनिया-1 और भारत के पांच उपग्रह शामिल हैं। इसरो ने कहा कि प्रक्षेपण के करीब 17 मिनट बाद 44.4 मीटर लंबे पीएसएलवी-सी51 ने अमेजोनिया-1 को उसकी कक्षा में सफलतापूर्वक प्रविष्ट करा दिया। उसके बाद करीब एक घंटा 38 मिनट की उड़ान के दौरान वह सभी अन्य 18 उपग्रहों को उनकी कक्षा में प्रविष्ट कराता गया। ‘सिंधु नेत्र’ उपग्रह हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय युद्धपोतों व व्यावसायिक जहाजों की पहचान करने में सक्षम है। इस उपग्रह ने ध्वनि प्रणाली के साथ संचार शुरू भी कर दिया है। ‘सिंधु नेत्र’ अपनी तरह का पहला उपग्रह है, जो चीन और पाकिस्तान के साथ लगती सीमाओं पर होने वाली छोटी-बड़ी गतिविधियों पर निगाह रखेगा। खासतौर से इसके माध्यम से भारतीय सीमा के आसपास लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीनी सेना की गतिविधियों पर निगाह रखीजा सकेगी। यह उपग्रह दक्षिण चीन सागर से लेकर अदन की खाड़ी तथा अफ्रीकी तट की निगरानी में भी सक्षम है। ‘सिंधु नेत्र’ उपग्रह को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के युवा वैज्ञानिकों ने विकसित किया है, जबकि चार अन्य उपग्रहों में एक सतीश धवन उपग्रह (एसडी-सैट) और तीन ‘यूनिटीसैट’ हैं। एसडी-सैट चेन्नई स्थित स्पेस किड्ज इंडिया (एसकेआई) द्वारा विकसित एक छोटा उपग्रह है, जबकि ‘यूनिटीसैट’ देश के तीन इंजीनियरिंग एवं तकनीकी शैक्षणिक संस्थानों का संयुक्त उपग्रह है। इन्हें जेप्पियार इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी, श्रीपेरंबदूर (जेआईटीसैट), जी.एच. रायसोनी कॉलेज आॅफ इंजीनियरिंग, नागपुर (जीएचआरसीईसैट) और श्री शक्ति इंस्टीट्यूट आॅफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, कोयंबतूर (श्री शक्ति सैट) ने मिलकर बनाया है। इसरो के अनुसार ‘यूनिटीसैट’ का उद्देश्य रेडियो रिले सेवाएं प्रदान करना है, जबकि एसडीसैट का कार्य विकिरण स्तर/अंतरिक्ष मौसम का अध्ययन और लंबी दूरी की संचार प्रौद्योगिकियों को प्रदर्शित करना है। ‘सिंधु नेत्र’ के सफल प्रक्षेपण से देश की सीमाओं पर घुसपैठ की कोशिश लगभग नामुमकिन हो जाएगी। इसमें लगे खास सेंसर से सीमा पार आतंकियों के जमावड़े की सूचना भी पहले ही मिल जाएगी। साथ ही, सीमा पार की गतिविधियों का विश्लेषण करना भी आसान हो जाएगा। यह उपग्रह किसी भी मौसम में बेहद साफ तस्वीरें ले सकेगा। इससे रात में भी तस्वीरें ली जा सकती हैं। बादलों की मौजूदगी में भी यह दुश्मन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखेगा। यही नहीं, इससे आपदा राहत कार्यों में भी भरपूर मदद मिलेगी। इसकी मदद से भारतीय सीमाओं की निगरानी और उनकी सुरक्षा को अभेद्य बनाने में आसानी होगी। इसरो ने पहली बार ब्राजील के किसी उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा है। 637 किलो वजनी अमेजोनिया-1 उपग्रह अमेजन क्षेत्र में वनों की कटाई की निगरानी और कृषि विश्लेषण के लिए उपभोक्ताओं को रिमोट सेंसिंग डाटा मुहैया कराएगा। 28 फरवरी को अंतरिक्ष में भेजे गए अन्य 18 उपग्रहों में से तीन ‘यूनिटीसैट’ भारतीय अकादमिक संस्थानों के हैं, जबकि ब्राजील के एक और अमेरिका के 13 उपग्रहों का प्रक्षेपण इसरो की व्यावसायिक शाखा न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) द्वारा किया गया है। प्रक्षेपण के समय ब्राजील का प्रतिनिधिमंडल और इसरो के प्रमुख के. सिवन भी मौजूद थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उप राष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने इस सफलता के लिए इसरो को बधाई दी। श्रीहरिकोटा में मौजूद ब्राजील के विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री मार्कोस पोंटीस ने कहा कि यह भारत और ब्राजील की साझेदारी की तरफ पहला कदम है, जो आगे और मजबूत होगी। अंतरिक्ष कारोबार के क्षेत्र में लंबी छलांग इसरो अब तक 342 विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण कर चुका है। इसरो के सबसे भरोसेमंद पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी ) का यह 53वां अभियान था। साथ ही, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से यह 78वां लॉन्च व्हीकल मिशन था। कई देशों के उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत इस तरह के व्यावसायिक प्रक्षेपण करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है। वास्तव में विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण ‘भारत की अंतरिक्ष क्षमता की वैश्विक अभिपुष्टि’ है। यह सफलता कई मायनों में बहुत खास है, क्योंकि एक समय था जब भारत अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था। आज वह न केवल उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रहा है, बल्कि विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण से अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा भी अर्जित कर रहा है। इसरो बेहद कम लागत पर उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रहा है, जिससे दूसरे देश लगातार भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत के विदेशों से 30 से 40 प्रतिशत कम होने के कारण भारत अंतरिक्ष बाजार में दुनिया का महत्वपूर्ण देश बन कर उभरा है। इसरो रच चुका इतिहास चंद्र और मंगल अभियान के बाद एक साथ 100 से अधिक उपग्रहों का प्रक्षेपण कर इसरो पहले ही इतिहास रच चुका है। वह अभी तक 100 से अधिक अंतरिक्ष अभियान पूरे कर चुका है। 19 अप्रैल, 1975 को स्वदेश निर्मित उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ के प्रक्षेपण के साथ अंतरिक्ष सफर की शुरआत करने वाले इसरो की यह सफलता भारत के अंतरिक्ष में बढ़ते वर्चस्व की तरफ इशारा करती है। इससे दूरसंवेदी उपग्रहों के निर्माण व संचालन में वाणिज्यिक रूप से भी फायदा हो रहा है। भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में कम संसाधनों और कम बजट में बेहतरीन प्रर्दशन किया है। भविष्य में अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढेÞगी, क्योकि यह अरबों डॉलर का बाजार है। भारत के पास कुछ बढ़त पहले से है, लेकिन इसमें और प्रगति करके बड़े पैमाने पर इसके वाणिज्यिक उपयोग की संभावना है। कुछ साल पहले तक फ्रांस की एरियन स्पेस कंपनी की मदद से भारत अपने उपग्रह छोड़ता था, लेकिन आज वह ग्राहक के बजाए साझीदार की भूमिका में पहुंच गया है। भारत इसी तरह अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे यान अंतरिक्ष यात्रियों को चांद, मंगल या अन्य ग्रहों की सैर करा सकेंगे। भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। गरीबी दूर करने और भारत को विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने का सपना साकार करने में इसरो महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। देश के लिए विशेष अभियान: सिवन देश के लिए इसे एक विशेष अभियान बताते हुए इसरो प्रमुख के. सिवन ने कहा कि एजेंसी ने उपग्रहों को बनाने में विश्वविद्यालयों का मार्गदर्शन किया। इससे उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों को भविष्य में अपना उपग्रह बनाने के लिए बल मिलेगा। उन्होंने कहा कि इस अभियान में भारत और इसरो, ब्राजील द्वारा एकीकृत पहले उपग्रह को प्रक्षेपित कर बेहद गर्व महसूस कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि सभी उपग्रह बहुत अच्छी हालत में हैं। मैं ब्राजील की टीम को बधाई देता हूं। एनएसआईएल द्वारा पहला पूरी तरह से व्यावसायिक प्रक्षेपण यह न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) द्वारा पहला पूरी तरह से व्यावसायिक प्रक्षेपण था। इसरो के व्यावसायिक प्रक्षेपण के काम को देखने के लिए 2019 में विज्ञान विभाग के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी के तौर पर एनएसआईएल का गठन किया गया था। एनएसआईएल इस अभियान को अमेरिका की स्पेसफ्लाइट इंक के साथ वाणिज्यिक अनुबंध के तहत पूरा कर रही है। अमेजोनिया-1 के साथ जिन अन्य 18 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया है, उनमें से चार का निर्माण इसरो के इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड आॅथराईजेशन सेंटर और 14 का विकास एनएसआईएल के वाणिज्यिक अनुबंध के तहत किया गया है। अंतरिक्ष क्षेत्र में नए युग की शुरुआत: पीएम मोदी इसरो की सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर अभियान से जुड़े वैज्ञानिकों को बधाई दी। उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘एनएसआईएल (न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड) और इसरो को पीएसएलवी-सी51/अमेजोनिया-1 मिशन के पहले समर्पित व्यावसायिक प्रक्षेपण की सफलता पर बधाई। यह देश के अंतरिक्ष क्षेत्र के विकास में नए युग की शुरुआत है।’’ प्रधानमंत्री ने ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो को भी बधाई दी और अमेजोनिया-1 के प्रक्षेपण को 'ऐतिहासिक क्षण' बताया। श्रीमद्भगवद् गीता को भी अंतरिक्ष में भेजा एसडीसैट उपग्रह के अग्रिम हिस्से पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर उकेरी गई है और इससे डिजिटल श्रीमद्भगवद् गीता को भी अंतरिक्ष में भेजा गया है। स्पेस किड्ज इंडिया ने कहा, ‘‘उपग्रह में सुरक्षित डिजिटल कार्ड प्रारूप में गीता को रखा गया है। प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान और अंतरिक्ष क्षेत्र के निजीकरण के प्रति एकजुटता और सम्मान दर्शाने के लिए उपग्रह के ऊपरी हिस्से पर उनकी तस्वीर बनाई गई है।’’ डीआरडीओ के अनुसार, ‘सिंधु नेत्र’ उपग्रहों की शृंखला की पहली कड़ी है, जो चीन के साथ लद्दाख क्षेत्र और पाकिस्तान से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में भारती की निगरानी क्षमता को बढ़ाने में मदद करेगा। यह उपग्रह 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के सभी भारतीय क्षेत्रों के पास चीनी सेना की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखेगा। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को लगता है कि इस तरह के चार और उपग्रहों की आवश्यकता है जो दुश्मन की हर चाल पर नजर रखने में सहायक हो सकते हैं। दुनिया में बदलते युद्ध के पारंपरिक तौर-तरीके और ‘मॉडर्न वार’ को देखते हुए चीन एवं अमेरिका की तर्ज पर तीनों सेनाओं को एक करने का फैसला लिया गया है। इसके लिए कुल पांच कमांड बनाने की योजना है, जिनमें तीन की भूमिका अंतरिक्ष से लेकर साइबर स्पेस और जमीनी युद्धों में महत्वपूर्ण होगी। इसी क्रम में ‘डिफेंस स्पेस एजेंसी’ (डीएसए) की स्थापना के साथ-साथ सरकार ने अंतरिक्ष सामग्रियों की क्षमता देखने के लिए ‘डिफेंस स्पेस रिसर्च आॅर्गनाइजेशन’ का भी गठन किया है। निकट भविष्य में रक्षा बलों की अंतरिक्ष शाखा को मजबूत किया जाना है। डीएसए का गठन भारतीय सशस्त्र बलों की तीनों सेनाओं को मिलाकर किया गया है, जिसका मुख्यालय बेंगलुरु में है। इस एजेंसी को भारत के अंतरिक्ष युद्ध और सैटेलाइट इंटेलिजेंस परिसंपत्तियों के संचालन का काम सौंपा गया है। इस एजेंसी को भविष्य में पूर्ण आकार की त्रि-सेवा सैन्य कमान में परिवर्तित किये जाने की उम्मीद है। इस कमांड का नेतृत्व सैन्य बलों के प्रमुख सीडीएस के हाथों में होगा। कुल मिलाकर पीएसएलवी-सी51 द्वारा एक साथ 19 उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण से एक बार फिर दुनिया में इसरो ने अपना वर्चस्व स्थापित किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत का सीमा निगरानी तंत्र भी अभेद्य हो गया है। (लेखक मेवाड़ विश्वविद्यालय में निदेशक और टेक्निकल टुडे पत्रिका के संपादक हैं)

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