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‘स्व’ को पहचानने की यात्रा

WebdeskMar 23, 2021, 03:46 PM IST

‘स्व’ को पहचानने की यात्रा

इतिहास अपने को दोहराता है, बस इस दोहराने की प्रक्रिया में काल का प्रभाव उस इतिहास को अपने रूप में परिवर्तित कर लेता है। 1930 की जिस ऐतिहासिक घटना ने ‘कभी न डूबने वाले ब्रिटिश सूरज’ के अस्त होने का मार्ग प्रशस्त किया था, आज उसी घटना की स्वैच्छिक पुनरावृत्ति से भारत का सूर्य संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करने के लिए उदीयमान है। दाण्डी यात्रा वही ऐतिहासिक घटना है। तत्कालीन भारत और वर्तमान भारत को दाण्डी यात्रा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो एक महत्वपूर्ण बात तब और अब तक के भारत को जिस बिंदु पर जोड़ती है, वह है भारत की ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘स्व’ की सनातन संस्कृति। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार द्वारा नमक पर लगाए गए काले कानून के विरुद्ध आवाज उठाई और 12 मार्च, 1930 को सत्याग्रह का श्रीगणेश किया। महात्मा ने अमदाबाद के साबरमती आश्रम से सत्याग्रहियों के साथ यात्रा प्रारंभ की और 25 दिन की यात्रा के बाद नवसारी जिले के दाण्डी गांव पहुंचकर 6 अपै्रल, 1930 को सांकेतिक रूप से नमक बनाकर अंग्रेजी कानून को तोड़ा। वे सत्याग्रहियों के साथ जेल गए एक साल बाद 1931 में गांधी-इरविन समझौते के साथ यह आंदोलन सफल हुआ। इस आंदोलन का परिणाम दूरगामी हुआ और गांधी जी इस दाण्डी यात्रा से भारतीय जनमानस को यह बात समझाने में सफल रहे कि अगर हम सामूहिक रूप से किसी भी समस्या का प्रतिकार करें तो सफलता निश्चित है, यहीं से भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन का सूत्रपात हुआ और अंग्रेजों के विरुद्ध व्यापक जनसंघर्ष प्रारंभ हुआ। महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के पश्चात् सरदार पटेल ने इसके विरोध में लोगों से जेल भरने का आह्वान किया और खेड़ा में भाषण दिया जहां उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। रविवार की छुट्टी होने के बावजूद अदालती कार्यवाही करके सरदार को जेल भेज दिया गया। उसके बाद हजारों लोगों ने अपनी गिरफ्तारी दीं। यह गांधी जी द्वारा ली गई उस प्रतिज्ञा का परिणाम था, जिसमें उन्होंने कहा था,‘‘मेरा जन्म ब्रिटिश साम्राज्य का नाश करने के लिए ही हुआ है। मैं स्वराज्य लिए बिना आश्रम में पैर नहीं रखूंगा।’’ दाण्डी यात्रा में शाश्वत भारत की परंपरा भी है, स्वाधीनता संग्राम की परछाई भी है और आजाद भारत की गौरवान्वित करने वाली प्रगति भी है। इतिहास साक्षी है कि किसी राष्ट्र का गौरव तभी जाग्रत रहता है जब वह अपने स्वाभिमान और बलिदान की परंपराओं को अगली पीढ़ी को भी सिखाता है, संस्कारित करता है और उन्हें इसके लिए निरंतर प्रेरित करता है। -नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री दाण्डी यात्रा की सफलता का श्रेय सरदार पटेल को देते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, ‘‘यह मेरा सरदार है। अगर यह नहीं होता तो शायद यह आंदोलन इतना सफल नहीं होता।’’ यह यात्रा केवल इसी समाधान तक नहीं रुकी, बल्कि उसमें एक ऐसी चेतना का सूत्रपात हुआ जिसने भारतवासियों में आत्मनिर्भरता की भावना को पुन: जाग्रत किया। इस यात्रा ने जहां भारतीय जनमानस को ब्रिटिश दासता से लड़ने और आत्मनिर्भरता के लिए पे्ररित किया, वहीं दुनिया को भी सीख दी। बेब मिलर, मार्टिन लूथर किंग जैसे नेता भी इस आंदोलन से प्रेरित हुए। इस आंदोलन ने देशभर में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हर क्षेत्र में असहयोग को जन्म दिया। इन दिनों पूरा देश स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने पर अमृत महोत्सव मनाने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में भारत की नवीन पीढ़ी को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाने का यह शुभ अवसर हम सबके सामने है। दाण्डी यात्रा जैसे आंदोलन केवल इतिहास की घटना मात्र नही हैं, बल्कि भारतीय चेतना के जीवित दस्तावेज हैं, जिन्हें जितना ही बांचा जाएगा देश की भावी पीढ़ियां उतना ही जाग्रत और सजग रहेंगी। वर्तमान सरकार ने इसका बीड़ा उठाया है, यह देश के लिए सुखद संयोग है। महात्मा गांधी की दाण्डी यात्रा से लेकर वर्तमान की प्रतीकात्मक दाण्डी यात्रा तक के सफर को यदि देखा जाए तो भारतीयों के संघर्ष से लेकर उनके उत्तरोत्तर विकास की यात्रा की एक गौरवपूर्ण कहानी हम सबके सामने उपस्थित होती है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव का प्रारंभ दाण्डी यात्रा के दिन 12 मार्च को किया। इस अवसर पर उन्होंने इसकी एक विस्तृत रूपरेखा देश के सामने रखी और प्रमुखता से दाण्डी यात्रा और इसके हेतु को समझाते हुए कहा, ‘‘गांधी जी की इस यात्रा में भारत के स्वभाव का भी आचरण था। हमारे यहां नमक को कीमत से नहीं आंका गया। हमारे यहां नमक का मतलब है ईमानदारी, विश्वास, वफादारी। नमक श्रम और समानता का प्रतीक है।’’ उन्होंने यह भी कहा, ‘‘इसमें शाश्वत भारत की परंपरा भी है, स्वाधीनता संग्राम की परछाई भी है और आजाद भारत की गौरवान्वित करने वाली प्रगति भी है। इतिहास साक्षी है कि किसी राष्ट्र का गौरव तभी जाग्रत रहता है जब वह अपने स्वाभिमान और बलिदान की परंपराओं को अगली पीढ़ी को भी सिखाता है, संस्कारित करता है और उन्हें इसके लिए निरंतर प्रेरित करता है। किसी राष्ट्र का भविष्य तभी उज्जवल होता है जब वह अपने अतीत के अनुभवों और विरासत के गर्भ से पल-पल जुड़ा रहता है।’’ यह वक्तव्य भारत के उस मानस का चित्रण है, जो सनातन है और समय-समय पर इस मानस पर जो धूल पड़ जाती है उसे साफ करने का यत्न भी है। वस्तुत: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ‘स्व’ का जागरण है, जिसमें सदियों की दासता से संघर्ष करते हुए प्रत्येक भारतीय जाग्रत हुआ था। यह भारत की परंपरा में रहा है कि जब भी हम संघर्ष के काल में होते हैं तो किसी न किसी महापुरुष का जन्म होता है और वह हमारे ‘स्व’ को जाग्रत करता है और हम पुन: खडेÞ हो जाते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि जब संघर्ष का समय हो तभी ‘स्व’ का जागरण होना चाहिए, ‘स्व’ का जागरण किसी भी राष्ट्र का वह आवश्यक तत्व है जिसके बिना वह राष्ट्र कमजोर हो जाता है। स्वतंत्रता किन महान संघर्षों का परिणाम रही, इसे जाने बिना उसके मूल्य को समझना असंभव होता है। हमारी वह पीढ़ी जिसने उस संघर्ष को नहीं देखा, वह उसके मूल्य को कैसे समझे? इसके लिए आवश्यक है कि वह उन घटनाओं, महापुरुषों के जीवन-संघर्ष और आंदोलनकारियों के बलिदानों से परिचित हो और यह जाने कि वह जिस आजाद हवा में सांस ले रही है, उसके लिए अनगिनत सपूतों ने अपनी जान दी है। यह राष्ट्र के चरित्र निर्माण की यात्रा है और यह कालातीत है जिसकी आवश्यकता संघर्ष और शांतिकाल, दोनों में समान महत्व रखती है। किसी भी राष्ट्र की उन्नति का यह आवश्यक तत्व है। (लेखक सत्यवती महाविद्यालय,दिल्ली में सहायक प्राध्यापक हैं)

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