अपनी बात-देश से ज्यादा किसकी चिंता?
   दिनांक 07-मार्च-2016

भारत में जनप्रतिनिधियों के बारे में एक प्रचलित राय है-"नेताओं को नौकरशाह चलाते हैं।" योग्य असरदार नेताओं की कमी से जुड़ी यह धारणा पी. चिदंबरम ने तोड़ दी है। यह बात और है कि अब वे सवालों के घेरे में हैं कि योग्यता दिखाते हुए वह संभवत देशहित की सीमा भी लांघ गए।
केंद्र सरकार में गृह और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके इस दिग्गज कांग्रेसी नेता के मामले में पार्टी की दिक्कत यह है कि वह पलानी अप्पन चिदंबरम साहब द्वारा मंत्रिपद संभालते हुए दिखाई गई अतिरिक्त समझदारी को "धूर्तता" और "देश के साथ छल" के आरोपों से नहीं बचा पा रही है। महीना नहीं बीता जब पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने एक भारतीय टीवी चैनल के साथ बातचीत में खुले तौर पर माना था कि लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी प्रशिक्षण देती है। अब नई बात खुली है। इस देश के पूर्व गृह मंत्री भारतीय जांच एजेंसी का मूल हलफनामा बदलते हुए लश्कर की उसी आतंकी पर मासूमियत का लिहाफ डालते दिख रहे थे जो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री को निशाना बनाने के लिए अपने आतंकी दोस्तों के साथ निकली थी।
यह मासूम-सी दिखती इशरत के लिए अकारण उपजा प्रेम था या नरेंद्र मोदी के लिए राजनैतिक कारणों से पैदा हुई घृणा? तत्कलीन गृह मंत्री ने किसके कहने पर वह काम किया जिस  पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं?
लश्कर का मुखपत्र कहा जाने वाला "गजवा टाइम्स" पहले इशरत को "शहीद " बताते हुए सलाम करता है। बाद में करतूत के तार छिपाने के लिए वेबसाइट से खबर हटाकर मामले पर पर्दा डालने की कोशिश करता है।
गृह मंत्रालय का हलफनामा पहले इशरत के लश्कर संबंधों की पुष्टि करता है। बाद में अज्ञात कारणों से गृह मंत्री के कहने पर उसे बदलवा दिया जाता है और इस तरह "आतंकी सूत्रों" की बात पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है?
यह सिर्फ संयोग है या साजिश!! तब की सरकार और लश्कर के रुख में ऐसी समानता कैसे हो सकती है? किसका हित सध रहा है? देशहित कहां है?
राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध लगाने वालों के प्रति गृह मंत्री रहते हुए "संवेदनशीलता" दिखाने वाले चिदंबरम पर दूसरा आरोप वित्त मंत्री रहते हुए अपने बेटे कार्ति की कंपनियों को "परोक्ष" लाभ पहुंचाने का है।
2006 में वित्त मंत्री रहते हुए एअरसेल के स्वामित्व हस्तांतरण का मामला उनके सामने था। उनके मंत्रालय ने एक ओर भारी-भरकम सौदे को मंजूरी दी, दूसरी तरफ कार्ति की कंपनियों ने मोटे निवेश, विदेशों में कंपनियों और संपत्ति के अधिग्रहण की झड़ी लगा दी। एअरसेल-मेक्सिस सौदे के बाद चिदंबरम परिवार की इस कारोबारी तेजी से जुड़ी जानकारियां अब सवार्ेच्च न्यायालय के पास हैं।
पार्टी के शक्ति केंद्र के करीबी रहे चिदंबरम वकील हैं। ताकत उनके पास पहले रही है, तर्क अब भी हैं। लेकिन ताकत छीजने के बाद भारत के पुराने राजनीतिक खिलाड़ी का जो चेहरा उघड़ा है, उसे किसी किस्म के तकार्ें से नहीं ढका जा सकता।
कार्ति की कंपनियों की संदिग्ध कहानियां मलेशिया और सिंगापुर सहित 14 देशों में बिखरी पड़ी हैं। लश्कर के मुखपत्र गजवा टाइम्स से भारतीय-अमेरिकी जांच एजेंसियों की पड़ताल और हेडली के बयानों में आतंकी इशरत का नाम उजागर है।
सत्ता से करीबी, जटिल सूत्रों का उपयोग और बेतहाशा समृद्धि, पीढि़यों से तमिलनाडु के इस चेट्टियार (साहूकार) परिवार की पहचान रही है। नई पहचान क्या होगी? अंग्रेजों से लेकर कांग्रेस तक सत्ता व्यवस्था की इस करीबी की परतें कितनी उघड़ेंगी और कहानी कहां तक जाएगी, कहा नहीं जा सकता।
देश को छलने वाली राजनीतिक शत्रुता और पुत्र मोह में नैतिकता को ताक पर रख देने के आरोप गहरे हैं। क्या चिदंबरम अपनी साख को इस गहराई से उठाकर फिर स्थापित कर सकेंगे?