जयंती विशेष: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में ऐनी बेसेंट के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता
स्रोत:    दिनांक 01-अक्तूबर-2018
-पूनम नेगी                          

बात तब की है जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत थी। महामना पं. मदनमोहन मालवीय काशी में एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे, परंतु नियमानुसार इसके लिए एक कॉलेज का होना अनिवार्य था। मालवीय जी ने एक अंग्रेज महिला के समक्ष उनके द्वारा स्थापित सेन्ट्रल हिंदू कॉलेज की विश्वविद्यालय से संबद्धता का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने तत्काल प्रस्ताव स्वीकार करते हुए विनम्रता से कहा, ''यह विद्यालय आपका ही है पंडित जी! मेरे पास जो कुछ भी है वह इस देश के ही लिए है।'' 14 दिसंबर, 1921 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा 'डॉक्टर ऑफ लेटर्स' की उपाधि से विभूषित विदेशी भूमि पर जन्मी यह भारतीय मनीषा थी एनी बेसेंट।
राष्ट्रीय पुनर्जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत को अपनी कर्मस्थली बनाने वाली इस उदारचेता महिला ने भरपूर साहित्य सृजन किया, विशेष रूप से आध्यात्मिक साहित्य। भारतीय जीवन मूल्यों व वैदिक साहित्य, खासतौर पर उपनिषदों का अनुशीलन उनका प्रिय विषय था। उन्होंने भारत के ऋषि प्रणीत वैदिक धर्म का गंभीर अध्ययन किया तथा हिन्दू धर्म की तत्कालीन विकृतियों व रूढि़यों को दूर करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने 'गीता' का अंग्रेजी में अनुवाद किया। और लगभग 200 पुस्तकें लिखीं एवं कई पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। एनी स्वभावत: धार्मिक प्रवृत्ति की चिंतनशील व जिज्ञासु महिला थीं। विदेशी भूमि पर जन्म लेने के बावजूद वे भारतीय दर्शन व संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गयी थीं। उनके राजनीतिक विचारों की आधारशिला थी भारत के आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्य। उनका विचार था कि अच्छाई के मार्ग का निर्धारण अध्यात्म के बिना संभव ही नहीं है। किसी भी राष्ट्र का सर्वांगीण विकास एवं निर्माण तभी संभव है, जब उस देश में विभिन्न मत-पंथों, मान्यताओं एवं संस्कृतियों में आपस में एकता व सद्भाव स्थापित हो। एनी को कुशल संस्थापिका, लेखिका एवं उच्चकोटि की वक्ता के रूप में भी जाना जाता है। महात्मा गांधी ने उन्हें 'वसंत देवी' की उपाधि से विभूषित किया।
एनी बेसेंट सच्ची कर्मयोगी थीं। उन्होंने 1908 में अडयार (चेन्नई) में वसंत प्रेस का शुभारंभ किया। 1918 में 'इंडियन भारत स्कॉउट' की नींव रखी। उन्होंने भारत में नारी की शिक्षा एवं विकास पर भी काफी काम किया। भारत को स्वतंत्र कराने के प्रति उनकी चिन्ता व सक्रियता को उनके भारत प्रेम का परिचायक माना जा सकता है। 1914 में उन्होंने दो पत्रिकाओं 'न्यू इंडिया' दैनिक तथा 'द कॉमन व्हील' साप्ताहिक का प्रकाशन कराया। उल्लेखनीय है कि इन पत्रिकाओं में ब्रिटिश शासन के विरोध में लिखने के कारण उन्हें 20 हजार रुपये का बड़ा जुर्माना भरना पड़ा था।
भारत के लिए अपना जीवन समर्पित कर देने वाली एनी का जन्म एक अक्तूूबर, 1847 को लंदन के प्रतिष्ठित वुड परिवार में हुआ था। पिता एक कुशल चिकित्सक एवं कई भाषाओं के ज्ञाता थे। मगर एनी जब पांच वर्ष की थीं तभी असमय भाग्य विपरीत हो गया। पिता के आकस्मिक स्वर्गवास से उनका समूचा परिवार बिखर गया। घोर आर्थिक संकट आ जाने से उनका पालन-पोषण अभावों में हुआ। कहा जाता है कि एनी बेसेंट के भीतर की अद्भुत प्रतिभा बचपन से ही झलकने लगी थी। इससे प्रभावित होकर लंदन की सुविख्यात महिला शिक्षाविद् सुश्री मेरियट ने उसकी शिक्षा-दीक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। सुश्री मेरियट के संरक्षण में उन्होंने 16 वर्ष तक यूरोप व जर्मन आदि विभिन्न देशों में भ्रमण व विद्यार्जन किया। इस दौरान उन्होंने लैटिन एवं फ्रेंच आदि भाषाओं का गहन अध्ययन किया। 22 वर्ष की उम्र में उनका विवाह एक पादरी रेवेरेंड फ्रैंक बेसेंट से हुआ। दो बच्चे भी हुए, किन्तु स्वभाव से विचारशील प्रवृत्ति की होने के कारण उनका पति से तालमेल न बैठ सका। उन्होंने आपसी सहमति से शांतिपूर्ण तरीके से पति से संबंध विच्छेद कर सम्पूर्ण मानवता से नाता जोड़ लिया। ब्रिटिश कानून के कारण उनके दोनों बच्चे उनके पति के पास ही रहे।
 
आगे चलकर एनी को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। उन्होंने स्वतंत्र लेखन कर जीविकोपार्जन किया। उसी दौरान वे ख्यातिलब्ध ब्रिटिश पत्रकार विलियम स्टीड के संपर्क में आयीं और उनके सहयोग से कुछ समय तक लेखन के साथ पूरी कुशलता से प्रकाशन का कार्य किया। इसके कुछ समय बाद उन्होंने इंग्लैंड की सबसे शक्तिशाली महिला ट्रेड यूनियन में बतौर सचिव काम किया और अपना अधिकांश समय मजदूरों, अकाल पीडि़तों तथा अभावग्रस्तों को सुविधाएं दिलाने में बिताया। 1882 में तब उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया जब वे थियोसाफिकल सोसाईटी की संस्थापिका मैडम ब्लावत्सकी के संपर्क में आयीं।
1889 में खुद को पूरी तौर पर थियोसाफिस्ट घोषित करने के उपरान्त 16 नवंबर, 1893 को वे एक सुनियोजित लक्ष्य के साथ भारत आयीं और सांस्कृतिक नगरी काशी को अपनी कार्यस्थली बनाया। सर्वप्रथम उन्होंने काशी के तत्कालीन नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह से भेंट की और उनकी कृपा से कमच्छा में काशी नरेश सभाभवन के निकट की भूमि पर 1898 में सेंट्रल हिन्दू कॉलेज स्थापित किया जो बाद में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का आधार बना। भारतीय संस्कृति के प्रति उनका अनुराग व समर्पण वाकई अद्भुत था। उन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष भारत के सर्वांगीण विकास में लगाये। उन्होंने समूचे देश में बाल विवाह, जातीय व्यवस्था, विधवा विवाह जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने की अलख जगायी।
68 वर्ष की उम्र में उन्होंने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया और आते ही होम रूल नामक आंदोलन का शुभारंभ किया। इस आंदोलन को भारत के स्वाधीनता संग्राम एवं देश की राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाला आंदोलन माना जाता है जिसने ब्रिटिश सरकार की नीति में बड़ा परिवर्तन ला दिया। एनी बेसेंट ने समूचे देश का भ्रमण कर जगह-जगह लोगों को स्वराज्य का अर्थ एवं उपयोगिता को समझाया। एनी बेसेंट की देशव्यापी स्वीकार्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1917 में जब उन्हें व उनके दो सहयोगियों के साथ नजरबंद कर दिया गया तो उन्हें रिहा करने की मांग पर समूचा देश आंदोलित हो उठा। जगह-जगह जुलूस निकाले गये। अन्तत: ब्रिटिश शासन को उन्हें मुक्त करना ही पड़ा। 1917 में कलकत्ता में हुई कांग्रेस की सभा में उन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया मगर 1919 तक सक्रिय राजनीति में रहने के बाद वे राजनीतिक जीवन से अलग हो गयीं।
तत्पश्चात उनके जीवन का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य था विश्व के महान दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति को अपने संरक्षण में लेकर उनकी शिक्षा-दीक्षा व ज्ञानार्जन का दायित्व वहन करना। जिस तरह सुश्री मेरियट ने एनी बेसेंट के बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा का दायित्व खुद पर लिया था, उसी तरह 1909 में एनी ने पांच वर्ष की आयु में जे.कृष्णमूर्ति को गोद लेकर उनके शिक्षण व व्यक्तित्व विकास की जिम्मेदारी का बहुत ही खूबसूरती से निर्वाह किया। अडयार (चेन्नई) में एनी बेसेंट द्वारा स्थापित थियोसाफिकल सोसायटी का अन्तरराष्ट्रीय मुख्यालय आज भी उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार कर रहा है।
एनी बेसेंट सच्चे अर्थों में ऐसी भारत की आध्यात्मिक विभूति हैं जिन्होंने विदेशी भूमि पर जन्म लेने के बावजूद अपना समूचा जीवन भारतीय जीवनमूल्यों के लिए ही जिया। 20 सितंबर 1933 को अडयार में अपना शरीर छोड़ने वाली एनी बेसेंट का अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार भारतीय पद्धति से हुआ। दाह संस्कार के पश्चात उनका अस्थि कलश काशी लाया गया तथा दशाश्वमेध घाट पर उसका विसर्जन हुआ।