श्रीराम का नैमिष पथ !
स्रोत:    दिनांक 10-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                                      -पूनम नेगी
 
 हनुमानगढ़ी नैमिषारण्य तीर्थ का एक सिद्ध स्थल
भारतीय संस्कृति को अरण्य (वन) संस्कृति यूं ही नहीं कहा गया है। हमारा समूचा ज्ञान-विज्ञान इन्हीं अरण्यों में विकसित हुआ है। इन्हीं अरण्यों में सृजित वेद-उपनिषद्, महाभारत, रामायण व पुराणों से लेकर रामचरितमानस जैसी मानवता की पथ प्रदर्शक कृतियां सदियों से हमारी वैदिक मनीषा की अद्भुत मेधा का यशोगान करती आ रही हैं। अपने अंचल में असंख्य रोचक और प्रेरक कथा-गाथाएं समेटे ये अरण्य न सिर्फ हमारी संस्कृति का मूल स्रोत रहे हैं अपितु हमारी गौरवशाली मानवीय सभ्यता के विकास के मूक साक्षी भी हैं। एक समय था जब हमारी समूची जीवनधारा इसी वन्य संस्कृति पर टिकी थी। वैदिक युग में वन हमारी सभ्यता और संस्कारों के जीवंत केन्द्र तथा चेतना की यज्ञशाला भी थे। राष्ट्र के संस्कृति पुरुष श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास काल का सौंदर्य इन्हीं वन प्रांतों में विकसित हुआ था। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में अवस्थित 'नैमिषारण्य' ऐसा ही एक पुरायुगीन अरण्य तीर्थ है, जिससे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन की अनेक स्मृतियां बेहद गहराई से जुड़ी हैं। इस सतयुगीन अरण्य तीर्थ को धरती का केन्द्र माना जाता है। आश्विन नवरात्र के पावन अवसर पर आइए पुनरावलोकन करें श्रीराम के नैमिष पथ, नैमिषारण्य की पौराणिक और आध्यात्मिक महत्ता का।
श्रीमद् देवीभागवत, विष्णु, शिव, वराह, कूर्म, स्कंद आदि पुराणों, वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और महाभारत जैसे धार्मिक साहित्य के साथ ही अवध अंचल के जाने-माने हिन्दी साहित्यकार अमृतलाल नागर के लोकप्रिय उपन्यास 'एकदा नैमिषारण्य' तथा डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित की सुप्रसिद्ध कृति 'अवध की संस्कृति' में नैमिषारण्य के महात्म्य एवं श्रीराम से जुड़े प्रसंगों व संबंधित स्थलों का संुदर विवरण मिलता है। सतयुग में स्वायंभुव मनु ने अपनी पत्नी शतरूपा के साथ यहां पर 23,000 वर्ष तक तपस्या कर भगवान विष्णु को प्रसन्न कर उन्हें पुत्र के रूप में प्राप्त करने का वरदान प्राप्त किया था। इसी के बाद जगत पालक श्री हरि त्रेतायुग में श्रीराम के रूप में अवतरित थे। पुराणों में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के विद्या काल से लेकर राज्य शासन के बाद तक पांच बार आने का उल्लेख मिलता है। इसी कारण इस स्थान को 'राम धाम' के नाम से भी जाना जाता है।
'वाल्मीकि रामायण' में कहा गया है कि यह वही पुण्य भूमि है जहां आदिगंगा 'गोमती' के पावन तट पर प्रभु श्रीराम ने आर्यावर्त की दिग्विजय के उपरान्त 'अश्वमेध यज्ञ' का आयोजन किया था। वैदिक साहित्य में सदानीरा गोमती को श्रीराम के कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ की पुत्री माना गया है। आदिगंगा गोमती को यहां धेनुमती भी कहा जाता है। रामकथा के आदि प्रणेता ऋषि वाल्मीकि कृत रामायण में श्रीराम के नैमिष की पवित्र धरा पर किये गये अश्वमेध यज्ञ का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण है। वह कथा हम सभी को सुविदित है। नैमिषारण्य में मौजूद अश्वमेध यज्ञशाला आज भी श्रीराम के त्रेतायुगीन देव संस्कृति अभियान की साक्षी है। श्रीराम ने पवित्र गोमा के तट पर विकसित इस पावन तीर्थ भूमि पर सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के साथ बाजपेय, अग्निष्टोम, विश्वजित, गोमेघादि आदि यज्ञों को सांगोपांग विधियों से सम्पन्न किया था।
महर्षि वाल्मीकि श्रीराम के अश्वमेध यज्ञों का वर्णन करते हुए कहते हैं,
''यज्ञवाटश्च सुमहान गोमत्या नैमिषेवने। अनुभूय महायज्ञं नैमिषे रघुनन्दन।।''
यज्ञों की यह परम्परा नैमिषारण्य में आज भी देखी जा सकती है। यह वही भूमि है, जहां लव-कुश ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ कर न सिर्फ श्रीराम की चतुरंगिणी सेना को युद्ध की चुनौती दी थी, वरन् श्रीराम को अपने गुरु वाल्मीकि द्वारा रचित राम कथा भी सुनायी थी। यहीं पर उन्होंने महावीर हनुमान को पेड़ से बांध दिया था। उन स्थलों के चिह्न आज भी यहां विद्यमान हैं। कहा जाता है कि अश्वमेध यज्ञ के समय जब माता सीता को पुन: परीक्षा देने को कहा गया तो लोकपवाद दूर करने के लिए धरती पुत्री सीता इसी पवित्र भूमि पर अपनी मां की गोद में समा गई थीं। वह स्थान जानकी कुण्ड के नाम से विद्यमान है। नैमिष के गोमती नदी के तट पर वह दशाश्वमेध घाट आज भी मौजूद है, जहां पर गुरु वशिष्ठ के कहने पर श्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था और सीता के नहीं होने पर उनकी स्वर्ण प्रतिमा वामांग में रखी थी। बताते चलें कि इसी तीर्थ के उसी यज्ञ सत्र में वाल्मीकि ने लव-कुश के साथ पधारकर पिता-पुत्रों का आपस में मिलन करवाया था। इसी तरह हनुमानगढ़ी भी इस पुरातन तीर्थ का एक सिद्ध स्थल है। इस मंदिर में भगवान राम को कंधे पर उठाए वीर बजरंगबली की 21 हाथ ऊंची दक्षिणाभिमुख मूर्ति सुशोभित है। जिस समय लंका में राम और रावण के बीच युद्ध हो रहा था, उसी समय रावण का भाई अहिरावण छल से राम-लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें पाताल लोक ले गया। तब वीर हनुमान ने पाताल में जाकर उसका वध किया। वे राम-लक्ष्मण को कंधों पर बैठा कर नैमिषारण्य में ही पाताल लोक से बाहर आए थे। हनुमानगढ़ी में भगवान का यही रूप शोभायमान है।
 
 वैदिक काल में नैमिषारण्य प्रमुख शिक्षा के केंद्र के रूप में विख्यात था। यह ऋषि-मुनियों के तप एवं ज्ञानार्जन का प्रमुख केंद्र भी था
त्रेतायुग के उपरांत द्वापर युग में लोमश ऋषि की प्रेरणा से वनवास काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने भी अपने भाइयों और द्रौपदी सहित तीर्थ के उद्देश्य से इस स्थान पर निवास किया था, जिसकी साक्षी हनुमानगढ़ी के निकट की पाण्डव गुफा है। रुद्रावर्त तीर्थ भी इस तीर्थ का एक अलग आकर्षण है। गोमती नदी के तट पर एक प्राचीन शिव मन्दिर के भग्नावशेष आज भी देखे जा सकते हैं। मन्दिर के समीप तट पर बेल पत्रों एवं फलों को पंचाक्षरी मंत्र 'ॐ नम: शिवाय' का उच्चारण करते हुए जल में अर्पित करने से वे बिना प्लवन किये जल में समाहित हो जाते हैं तथा उन्हीं फलों में से कुछ फल प्रसाद रूप में बाहर आ जाते हैं। हत्याहरण तीर्थ यूं तो भौगोलिक रूप से सीतापुर की बजाय हरदोई जिले में आता है किंतु पौराणिक मान्यता के दृष्टिगत इसकी गिनती नैमिष क्षेत्र के प्रमुख तीर्थों में की जाती है। कहते हैं कि वृत्तासुर वध के उपरांत देवराज इन्द्र ने ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए नैमिषारण्य के इस स्थल पर एक पैर के अंगूठे के सहारे खड़े होकर सूर्याभिमुख कठिन तप किया था। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नैमिष के एक सरोवर की ओर इंगित करते हुए कहा कि इसमें स्नान करने पर तुम ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे। तब महादेव की आज्ञा पाकर इन्द्र ने उस सरोवर में स्नान किया और ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हुए। कालान्तर में त्रेतायुग में लंकापति रावण का संहार करने के पश्चात भगवान राम ने भी ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त होने के लिए इस सरोवर में स्नान किया था। आज भी लोग जीव हत्या दोष से मुक्ति पाने के लिए यहां स्नान करने आते हैं।
ललिता देवी मंदिर के प्रधान पुजारी एवं कालीपीठ के संस्थापक जगदंबा प्रसाद बताते हैं कि सनातनधर्मियों में नैमिष क्षेत्र की चौरासी कोस की परिक्रमा की भारी मान्यता है। इसके अन्तर्गत चक्रतीर्थ, ललितादेवी शक्तिपीठ, हत्याहरण, रुद्रावर्त और मिश्रिख क्षेत्र आते हैं। पौराणिक आख्यानक के अनुसार महर्षि दधीचि के अस्थिदान में आए सभी देवों एवं तीर्थगणों ने चक्र गिरे स्थान से चौरासी कोस की परिधि में अपना विश्राम स्थल बनाया था। सर्वप्रथम भगवान श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के समय यह चौरासी कोस परिक्रमा यज्ञ की सफलता हेतु की गई थी। पुजारी जी के अनुसार आज कलियुग की विषम परिस्थितियों में हर किसी के लिए 84 कोस की परिक्रमा संभव नहीं है। इसलिए श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पंच कोसीय परिक्रमा का विकल्प बना दिया गया है। इस पंच कोसीय परिक्रमा के दौरान श्रद्धालुओं को नैमिष के लक्ष्मीनारायण मन्दिर, जानकी कुंड, कुमनेश्वर, कुकुर्री, मानसरोवर, कोटीश्वर महादेव, कैलाशन, हत्याहरण, नर्मदेश्वर, दस कन्या, जगन्नाथ, गंगासागर, कपिल मुनि, नागालय, नीलगंगा, शृंगीऋषि, द्रोणाचार्य पर्वत, चंदन तालाब, मधुवसनक, व्यास गद्दी, मनु शतरूपा तपस्थली, ब्रह्मवर्त, दशाश्वमेध घाट, हनुमानगढ़ी, यज्ञ वराह कूप, हंस-हंसिनी, देव-देवेश्वर, रुद्रावर्त आदि तीर्थ स्थलों का दर्शन करने का सौभाग्य मिलता है।
 
वैदिक काल में यह तपस्थली एक प्रमुख शिक्षा-केन्द्र के रूप में विख्यात थी। इस सतयुगीन तीर्थ को 88,000 संतों की तपोभूमि माना जाता है। महर्षि वेदव्यास ने यहीं महाभारत की रचना की थी। शुकदेव जी ने यहीं पर राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाई थी। यह भी माना जाता है कि वेदव्यास ने घर-घर में सुनी जाने वाली सत्यनारायण कथा की रचना भी यहीं की थी। यजुर्वेद के सृजक महर्षि वैशम्पायन ने नैमिषारण्य में ही वेदव्यास के साथ वटवृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की थी। इसी वटवृक्ष के नीचे बनी है-व्यास गद्दी। यहीं बैठकर व्यासजी ने चारों वेदों का वर्गीकरण का कार्य संपादित किया था। वाष्कल ने ऋग्वेद, जैमिनि ने सामवेद, वैशम्पायन ने यजुर्वेद और आर्स्णी ने अथर्ववेद का संपादन किया। महर्षि व्यास ने शास्त्रों को छह भागों में विभक्त कर अठारह पुराणों में बांटने का काम इसी नैमिषारण्य के वटवृक्ष के नीचे बैठकर किया था। ये 18 पुराण इस प्रकार हैं- ब्रह्म विष्णु, पद्म, ब्रह्म, शिव, भागवत, नारद, मार्कंडेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गुरुड़, ब्रह्मांड और भविष्य पुराण।
प्राचीन काल में यह तीर्थ ऋषि-मुनियों के तप-ज्ञानार्जन का प्रमुख केन्द्र था। द्वापर में श्रीकृष्ण के भाई बलराम ने भी यहां यज्ञ किया था। प्राचीनकाल में इस सुरम्य स्थल का वृहद् भू-भाग वनाच्छादित था। भक्त कवि सूरदास और आदि शंकराचार्य ने भी इस पवित्र भूमि में आकर साधना की थी। शान्त और मनोरम वातावरण के कारण आज भी यह स्थान वैदिक साहित्य के अध्ययन, मनन और ज्ञानार्जन हेतु एक आदर्श स्थान है। महर्षि पुलस्त्य ने इसे श्राद्ध तीर्थ भी कहा है। यहां पर सम्पन्न पिण्ड श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है। पुराणों में इसे धर्मारण्यं कहकर भी सम्बोधित किया गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण कहता है, ''इदं त्रैलोक्य विख्यातं, तीर्थ नैमिषमुत्तमम्। महादेव प्रियकरं, महापातकनाशनम्।।'' इसी तरह श्रीदेवीभागवत में नैमिषारण्य स्थित चक्रतीर्थ एवं पुष्कर को सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कहा गया है। जनविश्वास है कि बदरीनाथ और केदारनाथ धाम की यात्रा नैमिषारण्य की यात्रा के उपरान्त ही पूर्ण होती है। स्कंद पुराण कहता है- प्रथमं नैमिषं पुण्यं, चक्रतीर्थं च पुष्करम्। अन्येषां चैव तीर्थानां संख्या नास्ति महीतले।। इसी तरह लोकमंगल के अमर गायक गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी कालजयी कृति रामचरितमानस में इस तीर्थ का महिमागान करते हुए लिखा है-
''तीरथ वर नैमिष विख्याता।
अति पुनीत साधक सिधि दाता।।''
दिव्य तीर्थ का अनूठा तत्व दर्शन
इस दिव्य तीर्थ के नामकरण के पीछे कई रोचक पौराणिक कथाएं हैं। एक कथा कहती है कि गौरमुख नामक एक महा तपस्वी ऋषि ने महा हाहाकारी नाम के एक दैत्य को यहां एक निमिष (पलकों के झपकने की अवधि) में इसी अरण्य में जलाकर राख कर दिया था। तब से इस अरण्य को नैमिषारण्य कहा जाने लगा। एक अन्य कथा प्रचलित है कि महाभारत के युद्ध के बाद शौनक आदि ऋषिगण दुखी होकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे और कहा कि वे उन्हें साधना के लिए कोई ऐसा स्थान बताएं जो कलियुग के प्रभाव से मुक्त हो ताकि उनकी मानसिक पीड़ा का शमन हो सके। तब ब्रह्माजी ने उन्हें एक चक्र देकर कहा कि इसे चलाते चले जाओ। जिस स्थल पर इस चक्र की नेमि (बाहरी परिधि) गिरे, वहीं पर आश्रम स्थापित कर अपना प्रयोजन सिद्ध करो।
जनश्रुति के अनुसार उस चक्र की नेमि नैमिषारण्य के चक्र तीर्थ में गिरी और भूमि में प्रवेश कर गई। तब यहीं पर ऋषि शौनक के नेतृत्व में 88,000 ऋषियों की एक सभा को महर्षि सूत ने भगवत कथा सुनाई। कहा जाता है कि यह ज्ञानसत्र 1000 वर्ष तक चला। तभी से यह स्थल चक्रतीर्थ तथा नैमिषारण्य के नाम से समूचे आर्यावर्त में विख्यात हो गया। वैदिक चिंतन के अनुसार नैमिषारण्य विशिष्ट भूमि है। जिसका सृजन विशेष रूप से विशेष लक्ष्य के लिए हुआ। नैमिष नाम 'निमिषा' का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है नेत्र की आभा। एक अन्य अर्थ में यह समय की एक इकाई 'पल' का भी बोधक है, जो बताता है कि हमारा जीवन भी निमिष भर का ही है। इसलिए इसके हर पल का सदुपयोग करना चाहिए। अस्तु जब तक संसार में वेद रहेंगे, रामचरितमानस रहेगा, पुराण रहेंगे, शास्त्र रहेंगे महाभारत की कथा रहेगी, नैमिषारण्य का गौरव जीवित रहेगा।