कश्मीर को हिन्दुस्थान से कोई अलग नहीं कर सकता, चाहे कोई कितनी ही ताकत लगा ले
स्रोत:    दिनांक 12-अक्तूबर-2018
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्य पाल मलिक कहते हैं, यहां अलगाववादी और अतिवादी तत्व हैं जो नहीं चाहते कि राज्य में शांति का वातावरण हो और कश्मीर के लोगों का विकास हो। भारत सरकार और संसद का स्पष्ट मत है कि जम्मू—कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और दुनिया की कोई भी ताकत इसे अलग नहीं कर सकती। श्रीनगर स्थित राजभवन में पाञ्चजन्य संवाददाता ने उनसे विस्तृत बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश:-
 जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल  मलिक
• सूबा संवेदनशील है पर वर्तमान परिस्थितियां और भी ज्यादा संवेदनशील हैं। इस चुनौती को आप कैसे देखते हैं?
देखिए, राज्य की परिस्थितियों को जो अच्छे से समझ लेगा, वह निश्चित ही इनसे निपट लेगा। और वैसे भी मैं यहां की असली बीमारी को भलीभांति जानता हूं। इसे जानने के लिए मुझे खुफिया जानकारी की जरूरत नहीं थी। मैंने पदभार ग्रहण करने के बाद यहां के नौजवानों से सीधा संपर्क किया। मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैं अपना फोन खुद उठाता हूं और जो समय मांगता है, उसे समय देता हूं। इससे जो फीडबैक आया उससे काफी हद तक यहां की समस्या को समझने में मदद मिली। इसलिए मैं निश्चिंत होकर कहता हूं कि मैं इससे निपट लूंगा। दूसरी बात, मेरी मानसिकता यहां कोई राजनीति करना नहीं बल्कि राज्य के वातावरण को खुशनुमा बनाने की है और लोगों को यह एहसास दिलाने की है कि दिल्ली दुश्मन नहीं है। राज्यपाल भवन आपका है और आपकी हर समस्या का समाधान करने का प्रयास किया जाता है। मेरे इन्हीं प्रयासों का असर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब जनता की ओर से अच्छा संदेश आया। इस सबको देखकर लगता है, हमारे प्रयास सफल हो रहे हैं।
• हालांकि आप राजनीति से ऊपर हैं। लेकिन एक प्रशासक के नाते सूबे की उलझी हुई राजनीति को जब देखते हैं तो कैसा पाते हैं?
सूबे की राजनीति एक दिन में नहीं उलझी। वर्षों की उलझन है ये और इसे उलझाने वाली राजनीतिक पार्टियां ही हैं। मैं किसी दल का नाम नहीं लूंगा लेकिन एक दल का यहां की व्यवस्था को उलझाने में बहुत बड़ा योगदान है। खासकर कश्मीर की जनता को निष्पक्ष चुनाव नहीं दिए गए, और उस दल को ये वहम हो गया कि उनकी तो सरकार बनेगी नहीं कभी, दिल्ली से थोपी जाएगी, उनके जीते हुए लोगों को हरा दिया जाएगा, उनकी बनी हुई सरकारों को बर्खास्त कर दिया जाएगा। इससे कश्मीर के लोगों के मन में बड़ी गलत भावना पैदा हुई। इसके बाद भी बहुत गलतियां हुई हैं। इसलिए मैं किसी एक को दोषी नहीं ठहराना चाहता, लेकिन अब भी गलतियों को ठीक किया जा सकता है। हमारे प्रधानमंत्री का कश्मीर के प्रति बड़ा ही दोस्ताना रवैया है। आपको याद होगा, जब कश्मीर में बाढ़ आई तो कितनी शिद्दत के साथ उन्होंने यहां के लोगों की हर स्तर पर मदद की। सेना के जवानों ने भी पूरे जोश के साथ अपनी जान पर खेलकर यहां के लोगों को बचाया और इसका परिणाम भी दिखा। यहां की आवाम सेना की जयजयकार कर रही थी। इसके बाद प्रधानमंत्री जी ने दीवाली यहीं मनाई, 80 हजार करोड़ रु. का पैकेज राज्य के विकास कार्य के लिए दिया और यह बताते हुए मुझे खुशी होती है कि मेरे अब तक के कार्यकाल में हमारे विभाग ने कश्मीर के लिए जो भी मांगा, मुझे तय समय पर मिला। इससे साबित होता है कि प्रधानमंत्री जी कश्मीर के विकास कार्यों को लेकर कितने सजग हैं।
• निकाय और पंचायत चुनाव में हुई देरी को आप कैसे देखते हैं? साथ ही आतंकियों द्वारा मतदाता से लेकर उम्मीदवारों में खौफ पैदा किया जा रहा है। ऐसे में आपकी ओर से उन्हें क्या संदेश है ?
यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जो नहीं चाहते कि राज्य में शांति का वातावरण हो और कश्मीर कश्मीर के लोगों का विकास हो। चुनाव में देरी के लिए जो जिम्मेदार हैं, उन्हें सब जानते हैं लेकिन हमने जो तय किया, वह हो रहा है। हम दमदारी के साथ चुनाव करा रहे हैं। हमने हर उम्मीदवार का दस लाख रु. का बीमा कराया है। उन्हें सुरक्षा दी है। जहां जरूरी समझा, वहां बुलेटपू्रफ गाडि़यां भी दी हैं। जो सुरक्षित स्थानों पर रहना चाहते हैं, उनके ठहरने का भी इंतजाम किया है। दूसरी बात, जो धमकी या खौफ पैदा कर कर रहे हैं, हम उनसे बड़ी सख्ती के साथ निपटेंगे और कोई हिंसा नहीं होने देंगे।
• अनुच्छेद 35 (ए) को केंद्रित करते हुए राज्य के दो बड़े दल-एनसी और पीडीपी ने यह कहकर चुनाव बहिष्कार की घोषणा की थी कि जब तक केन्द्र का इस पर रुख साफ नहीं होता, हम चुनावों में भाग नहीं लेंगे। ये दल जनता के बीच जाने से डर रहे हैं या विकास में रोड़ा अटकाकर आवाम को भ्रमित कर रहे हैं?
देखिए, यह एक बहाना है। 35 (ए) पर जैसी स्थिति तब थी वैसी अब है, लेकिन ये कुछ समय पहले करगिल में चुनाव लड़े। इसलिए यह सिर्फ एक पैंतरा है, विधानसभा चुनाव को नजर में रखकर। एक और बात, इन चुनावों में इनके ही अपने कुछ लोग बगावत करके छद्म तरीके से लड़ रहे हैं। फिर भी मैं इनसे एक बात कहूंगा कि आप चुनाव नहीं लड़ना चाहते तो ये आप जानें, लेकिन मतदाताओं को उनके वोट के अधिकार से मत डगमगाइये।
• एक प्रशासक के तौर पर जम्मू-कश्मीर की जनता एवं अलगाववादी ताकतों को आपका क्या संदेश है?
मेरा अलगाववादी ताकतों को स्पष्ट संदेश है कि वे चाहे जो भी कर लें, सफल नहीं होने वाले। 'लिट्टे' जैसी संस्था जिसको 20 मुल्कों से मदद मिलती थी, जिसमें इनसे कई गुना ज्यादा भरोसेमंद कैडर था, जिसकी तादाद इनसे ज्यादा थी, लेकिन आज उसका हश्र क्या है? देखिए, आज की दुनिया में कश्मीर को हिन्दुस्थान से कोई अलग नहीं कर सकता, चाहे कोई कितनी ही ताकत लगा ले। इन्हें समझना चाहिए कि यह सबका कश्मीर है। इसलिए यहां पर्यटन बढ़ाओ, व्यवसाय और उद्योग-धंधे लाओ, नए-नए काम शुरू करो। और वे क्यों नहीं अपने युवाओं को आईएएस-आईपीएस बनाकर उन्हें देश के विभिन्न राज्यों में भेजते, ताकि वे भी और घाटी के लोग सारे देश में गर्व से सिर ऊंचा करके अपनी उपलब्धियां बताएं? लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे। इसलिए मेरा उनको स्पष्ट संदेश है कि वे गलत रास्ते पर हैं और बहकाए गए हैं। यह भी सच है कि वे जानते हैं कि यह गलत रास्ता है लेकिन स्वार्थ के चलते वे पूरी आवाम को भ्रमित करते हैं। इसलिए ऐसे लोग जितनी जल्दी हो सके, सही रास्ते पर आएं नहीं तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय है।
• जम्मू-कश्मीर की आवाम मुख्यधारा के साथ जुड़े, इसके लिए आपने कोई योजना बनाई?
बिल्कुल, इसके लिए विभिन्न स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। यहां दल समस्या नहीं हैं, क्योंकि उनका क्षेत्र सीमित है। हुर्रियत की भी सीमित भूमिका है। लेकिन कश्मीर के यही सारे लोग कश्मीर के प्रतिनिधि नहीं हैं। कश्मीर में 13 से 20 साल के 45 फीसदी युवा हैं, यही असली कश्मीर है। लेकिन यह वर्ग हताशा से भरा है। यह इन सभी दलों से निराश है। इसको न पाकिस्तान में यकीन है, न हुर्रियत में और न ही अन्य किसी व्यवस्था में। ऐसे में उसका यकीन जीतना है, उसे ये बताना है कि ये सारा मुल्क उनका है। वे आईएएस-आईपीएस होकर देश में कहीं भी जाकर सेवा दे सकते हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि वे भ्रमित हंै और उनके पास करने को कुछ भी नहीं है। शायद श्रीनगर शहर में एकाध ठीकठाक कॉफी शॉप के अलावा कोई दूसरी दुकान नहीं है, सिनेमा हॉल नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि वे क्या करें, जबकि यहां का युवा बहुत खेल प्रेमी है। क्रिकेट का उसे बहुत शौक है। इसलिए हम जम्मू और श्रीनगर में अन्तरराष्ट्रीय स्टेडियम दे रहे हैं और ये दो महीने में तैयार हो जाएगा। फुटबॉल का भी अन्तरराष्ट्रीय स्टेडियम दे रहे है, जिसमें सिर्फ कुछ काम बाकी रह गया। मेरा मानना है कि यहां के युवाओं में प्रतिभा की कमी नहीं है, बस उन्हें मौका चाहिए और मौका मिलते ही वे बुलंदियों को छुएंगे। लेकिन दुख की बात है कि पहले के समय में इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, इसलिए हताश होकर उन्होंने अपनी ऊर्जा कहीं और लगाई।
• आपने भी महसूस किया कि घाटी में मनोरंजन के साधनों का अभाव है, जो बहुत सी समस्याओं को जन्म दे रहा है। क्या इसके लिए आपकी ओर से कुछ प्रयास किए जा रहे हैं?
मैंने इस ओर ध्यान दिया है। अब प्रधानमंत्री कोष से हर जिले में एक ऑडिटोरियम बन रहा है। मैंने यहां के प्रशासन को कहा है कि वह प्रत्येक गांव में एक जगह चिह्नित करे और युवाओं को खेलने के लिए सौंपे। क्योंकि जब बच्चे स्कूल से आकर 2-3 घंटे खेलेंगे तो फिर उनके जेहन में और कोई खुराफात नहीं आएगी।
• राज्य में महिलाओं और दलितों की स्थिति ठीक नहीं है और यह स्थिति लंबे समय से चली आ रही है। इनकी स्थिति में सुधार हो, इसके लिए क्या कार्य हो रहा है?
मेरा पूरा प्रयास है कि हर क्षेत्र में महिलाएं आगे आएं और वे आ भी रही हैं। आपको बताऊं, यहां की महिलाओं में बहुत हुनर है। पश्मीना ऊन को कातना बड़ा मुश्किल काम होता है लेकिन यहां की महिलाएं बड़ी सहजता से उसे कातती और बुनती हैं। इनकी जो समस्याएं हैं, उनकी ओर भी मेरा ध्यान गया है और हम उन्हें सुलझाने का प्रयास करेंगे। दूसरी बात, दलितों की स्थिति के बारे में अधिकारियों को रिपोर्ट देने के लिए कहा है।
• राज्य के लद्दाख और जम्मू संभाग विकास के मामलों में उपेक्षित दिखाई देते हैं, जबकि घाटी केंद्रित विकास दिखाई देता है। इस असंतुलन को कैसे ठीक करेंगे?
मैंने बैंकों से 8 हजार करोड़ रुपए ऋण लिया है। इस पैसे से जहां भी काम अधूरे हैं-सड़क, स्कूल, बिजली से जुड़े सभी काम, उनको छह महीने में ठीक कर देंगे। दूसरी बात, अब जो भी प्रोजेक्ट राज्य में आ रहे हैं, जैसे-अगर एक एम्स और आईआईटी घाटी में आ रहा है तो एक एम्स और आईआईटी जम्मू में भी होगा। हमने 40 नए कॉलेज खोलने की घोषणा की है। सबसे पहले लद्दाख में कॉलेज खोलेंगे और वह भी लड़कियों का। मैं राज्य के लोगों को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि जो असंतुलन है, उसे हम अपने कार्य नियोजन के जरिए ठीक करेंगे और राज्य के किसी भी हिस्से को किसी भी शिकायत का मौका नहीं देंगे।
• जम्मू में रोहिंग्या घुसपैठियों की बसाहट बराबर बढ़ रही है। भविष्य में इनसे सुरक्षा को उत्पन्न खतरों को आप कैसे देखते हैं और घुसपैठिये राज्य की सीमा से बाहर हों, इसके लिए आप क्या करने वाले हैं?
यह अफसोस की बात है कि पिछली सरकारों के रहते ये आए। कैसे इनको बसने दिया गया? बसते समय रोकना आसान होता है लेकिन बस जाने के बाद यह कार्य कठिन हो जाता है। मैं इस मामले में इतना ही कहूंगा कि बहुत जल्द ही इस मामले में गृह मंत्री से मेरी बात होने वाली है। वैसे मूलत: यह काम केन्द्रीय गृह मंत्रालय के माध्यम से ही होगा।
जम्मू का जनसांख्यिक स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अवैध बस्तियां इस बात का संकेत हैं कि आने वाले चुनावों में अतिवादी इस हिन्दू बहुल क्षेत्र की राजनीतिक ताकत को तोड़ना चाहते हैं। आप इस पर क्या कहेंगे?
जनसांख्यिक परिवर्तन न हो, इसके लिए सच में सोचना होगा। दूसरी बात, जो बाहरी हैं, उनको हम चिह्नित करेंगे और जिस गलत मंशा को लेकर वे कार्य करना चाहते हैं, उस पर लगाम लगाएंगे।
• जम्मू-कश्मीर को लेकर देश में एक धारणा है कि पूरा राज्य आतंक से ग्रस्त है, जबकि हकीकत कुछ और है। आंकड़ों के आधार पर घाटी के कितने जिले आप आतंक से ग्रस्त पाते हैं?
देखिए, मुझे घाटी में दो महीने का लगभग समय हो गया है। इस बीच 3-4 हत्याएं हुई हैं, जबकि 25 से ज्यादा आतंकी मारे गए हैं वह भी एक सीमित क्षेत्र में। तो अंदाजा लगा सकते हैं कि राज्य के अन्य क्षेत्र में सब ठीक है। आपको बताना चाहूंगा कि जम्मू के अन्तर्गत जो मुस्लिम बहुसंख्यक जिले-राजौरी और पुंछ आते हैं, वहां के मुस्लिम हुर्रियत के आह्वान पर बंद नहीं करते। वहां भाईचारे का वातावरण है। लेकिन ये अलगाववादी हर दम इसी कोशिश में रहते हैं कि यहां भी माहौल बिगड़े। जैसे वे यहां के गुर्जरों और बक्करवालों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की फिराक में रहते हैं, जबकि यह वर्ग पूरी तरह से देशभक्त है।
•2012 में राज्य से जुड़ा एक आंकड़ा आया था कि करीब 200 से अधिक मंदिरों को कट्टपंथियों ने तोड़ा, उन पर मजार-मस्जिदें बनाईं या कब्जा करके दुकान-मकान आदि बना लिए। लेकिन इतने के बाद भी उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके अलावा 400 से ज्यादा मंदिर उपेक्षित पड़े हुए हैं। क्या आप इन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराकर उनका पुराना स्वरूप वापस देंगे?
मेरा इस विषय पर सिर्फ इतना ही कहना है कि हिन्दू संस्थाओं को चाहिए, वे ऐसे मंदिरों को चिह्नित करें और किसी त्योहार या पुण्य तिथि पर इन मंदिरों में आने का कार्यक्रम घोषित करें। जैसे अमरनाथ यात्रा पर आते हैं। मैं उनको पूरी मदद दूंगा और विश्वास दिलाता हूं कि पूरी राज्य की व्यवस्था उनके साथ है। लेकिन यह तभी होगा जब खुद यह लोग अपने धार्मिक स्थानों को महत्व देंगे।
• सूबे में शियाओं की स्थिति खराब है। जानकारी के अनुसार डल में उनका एक भी शिकारा नहीं है। यह जानबूझकर की गई प्रशासनिक अनदेखी है या फिर एक वर्ग के प्रति उदासीनता? कैसे सुधारेंगे इस स्थिति को?
आपने डल झील में एक भी शिया का शिकारा न होने की जो बात बताई तो मैं उस क्षेत्र के जनप्रतिनिधि को बोलूंगा कि आप शिकारे के लिए लोगों को तैयार करिए, हम ऋण दिलवाएंगे और उनका शिकारा चलवाएंगे। इसके अलावा कुछ चीजें को छोड़ दें तो शियाओं के यहां अच्छे-अच्छे कारोबार हैं। मेरा यहां के बहुत शिया परिवारों से अच्छा परिचय है। डल के दूसरी ओर बहुत से शिया बसते हैं और वे छोटे-छोटे काम करने वाले लोग हैं। उनको हटाने की बात थी। लेकिन मैंने कहा कि जब तक इनके रहने की दूसरी उचित व्यवस्था नहीं हो जाती, ये यही रहेंगे। हम अब दो किलोमीटर दूर फ्लैट बना रहे हैं, जिनमें ये परिवार जाएंगे। इससे वे परिवार भी बहुत खुश हैं। यहां का शिया समाज पूरी तरीके से भारतमय है। इसके अलावा प्रशासनिक उदासीनता की जो बात है तो सच यह है कि यहां के नेताओं और अफसरों के घर देखिए, 15 कमरों से कम का कोई मकान देखने को नहीं मिलेगा। तो समझ सकते हैं यहां कितनी बड़ी लूट हुई है। मेरा मानना है कि जितना रुपया कश्मीर को दिल्ली से मिला, अगर वह पूरा लग गया होता तो कश्मीर सोने का हो जाता है। इस भ्रष्टाचार के खिलाफ ही यहां के नवयुवकों में हताशा है। तीसरी बात, नौकरियों में जो चुनाव होता है, वह भी सही नहीं होता। जो रसूखदार हैं, उनके बच्चे चुने जाते हैं और जो अच्छे हैं वे पीछे रह जाते हैं। मैंने तय किया कि मेरे रहते राज्य में जो भी भर्ती होगी पूरी तरह से पारदर्शी होगी और कोई भी गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।