वामपंथी आवरण में यौन शोषण, कई वामपंथी #मीटू के आरोपी
स्रोत:    दिनांक 12-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                            -आशीष कुमार 'अंशु'
इन दिनों #मी टू अभियान चल रहा है। इसके जरिए कुछ महिलाएं अपने शोषण या मानसिक/शारीरिक अपमान के पुराने मामलों को दुनिया के साथ साझा कर रही हैं। कुछ लोग उनका समर्थन कर रहे हैं, तो कोई यह कहकर विरोध कर रहा है कि बरसों बाद क्यों ये बातें बाहर की जा रही हैं? लेकिन इसमें प्रमुखता से यह बात देखने को मिल रही है कि वामपंथ से जुड़े लोगों पर ऐसे आरोप कम लग रहे हैं, जबकि उनका इतिहास ऐसे कारनामों से भरा पड़ा है
'मेरे पास वापस आ जाओ रहने के लिए, नहीं तो तुम्हारी निजी तस्वीरों को परिवार वालों तक भिजवा दूंगा।''
यह किसी सी ग्रेड फिल्म का संवाद लगता है, लेकिन यह सब कथित प्रगतिशील आंदोलनकर्मी कुमार सुंदरम ने उस युवती से कहा जिसके साथ वह तीन साल तक रिश्ते में रहा। बाद के दिनों में सुंदरम के व्यवहार से तंग आकर युवती इस रिश्ते से बाहर निकलना चाहती थी। इसलिए सुंदरम ने उससे ये बातें कहीं। वह वामपंथ की बदनाम वेबसाइट 'इंडिया रेसिस्ट' के लिए अपनी महिला मित्र के साथ काम करता था। महिला मित्र ने लिखा, ''सुंदरम इसलिए मेरे संदेश और तस्वीरों को घर वालों तक पहुंचाने के नाम पर मुझे डरा रहा है, क्योंकि परिवार से मेरा सम्मान जुड़ा है और वह मुझे अपनी संपत्ति समझता है। यह सामंती सोच है।''
तमाम प्रगतिशील नारीवादी पुरुष इसी सामंती सोच से लड़ने की कसमें खाते नहीं अघाते और खुद इस सोच से कभी मुक्त भी नहीं हो पाते हैं। सुंदरम ने जरूर इन सारे आरोपों को बेबुनियाद बताया था। जैसा कि हर आरोपी बताता है। चूंकि यह कथित प्रगतिशील समुदाय से जुड़ा हुआ मामला था इसलिए इसमें न्याय से अधिक सभी पक्षों का जोर निबटारे पर था। यह निबटारा कबीलाई अंदाज में होता है, जिसमें पीडि़ता के हिस्से आमतौर पर समझौता ही आता है। सुंदरम के मामले को भी कुछ उसी अंदाज में निबटाया गया। इसी का परिणाम था कि 5 अप्रैल, 2017 को 'द क्विंट' पर 'इंडिया रेसिस्ट्स्स : सस्पेन्ड्स सुंदरम आफ्टर हरासमेन्ट एलीगेशन्स' शीर्षक से लगी खबर इस स्पष्टीकरण के साथ हटा दी गई कि शिकायतकर्ता की निजता का सम्मान करते हुए इसे हटाया जा रहा है।
यह अकेला मामला नहीं है। इसकी एक लंबी श्रृंखला है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार 2013-14 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में यौन उत्पीड़न के 25 मामले दर्ज हुए। जेएनयू से जुड़े मामलों में यदि आरोपी वामपंथी होते हैं तो उन्हें बचाने का हर संभव प्रयास किया जाता है। जेएनयू के एक वामपंथी प्रोफेसर बांग्लादेशी शोध छात्रा के मामले में यौन अपराधी पाए गए, लेकिन विश्वविद्यालय ने उन्हें बचा लिया। एक दूसरा मामला मई, 2018 में सामने आया, जिसमें आरोपी प्रोफेसर गैर-वामपंथी था। उनके नाम को मीडिया से लेकर हर तरफ खूब उछाला गया।
इन दो घटनाओं के माध्यम से छद्म वामपंथ की नारीवादी व्याख्या में न्याय के एक पक्षीय संघर्ष की कलई साफ तौर पर खुलती है। शायद यही कारण है कि #मी टू अभियान को समर्थन देने के लिए ये लोग अब तक मोमबत्ती लेकर सड़कों पर नहीं उतरे।
अब जरा #मी टू अभियान की शुरुआत को देखें। इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई है। यह 2006 में एक हैशटैग से प्रारंभ हुआ। अमेरिका की सामाजिक कार्यकर्ता तराना बुर्के ने हैशटैग मीटू से इसकी शुरुआत की। बुर्के इस हैशटैग के साथ यौन हिंसा और यौन अपराध जैसे विषयों पर समाज को जागरूक करने का प्रयास कर रही थीं। 2017 में जब इस हैशटैग के साथ अमेरिकी गायिका और अभिनेत्री आयशा जायनों मिलानो लिखने लगीं तो यह लोकप्रिय हुआ। मिलानो ने ट्विटर पर लोगों को अपने साथ हुई यौन हिंसा पर बातचीत के लिए प्रोत्साहित किया। इसी का परिणाम था कि कई अमेरिकी सामने आए। यह हैशटैग चल पड़ा। बीते एक साल में दुनियाभर में महिलाएं इस हैशटैग के साथ कार्यस्थल पर होने वाले यौन अपराधों पर लिख रही हैं। और इसी का परिणाम है कि बीते कुछ दिनों में भारतीय पत्रकारिता, फिल्म, साहित्य आदि से जुड़े कई बड़े नामों के चेहरे पर पड़ा भलमानुस का आवरण तार-तार हुआ है।
'द क्विंट' के मेघनाथ बोस, हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रशांत झा जैसे पत्रकार जहां हैशटैग #मीटू के आरोपी हैं, वहीं कवि शमीर रूबेन पर यौन अपराध का आरोप है। दो महिलाओं ने अलगाववादियों के पक्ष में दिखने वाले फहाद शाह पर भी यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। वे 'द कश्मीरवाला' के नाम से एक वेबसाइट चलाते हैं। रमा द्विवेदी पेशे से पत्रकार हैं। उन्होंने लिखा है, ''मैं लंबे समय तक चुप रही लेकिन समय आ गया है जब मैं अपनी कहानी कहूं। शाह ने, जो मेरा पुराना साथी था, पिछले साल एक समारोह में मेरा और मेरी एक मित्र का उत्पीड़न किया।'' रमा के अनुसार शाह ने पार्टी में कई बार रमा को गलत तरीके से छुआ। रोकने के बावजूद उसने कहा, 'तुम मुझे इस तरह नहीं रोक सकती।' यह कहते हुए उसने खुद को मेरे ऊपर धकेल दिया। इतना ही नहीं, वह मेरी दोस्त अकांक्षा नारायण को साथ ले गया और खुद को वाशरूम में बंद कर लिया। पार्टी में मौजूद उसके दोस्त और एक कश्मीरी फोटोग्राफर शाहिद तांत्रे ने यह सब देखकर एक शब्द तक नहीं बोला, बल्कि शाहिद तो अगले दिन मामले को फहाद शाह के पक्ष में खड़े होकर सुलझाने आया था। शाहिद ने रमा से कहा चलो, भूल जाओ सब और उसकी दोस्त को एफआईआर न करने की सलाह दी। वास्तव में फहाद शाह और शाहिद तंत्री जैसे पत्रकार और फोटोग्राफर की शक्ल में छिपे भेडि़यों से सावधान रहने की जरूरत है। फहाद और शाहिद ने यह रपट लिखे जाने तक ट्विटर पर इन आरोपों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा।
वामपंथी वेबसाइट 'द वायर' के संस्थापकों में से एक और संस्थापक संपादक सिद्धार्थ भाटिया पर डीएनए में काम करने के दिनों की साथी रीमा सान्याल और भारती शुक्ला ने आरोप लगाए हैं। पर सिद्धार्थ भाटिया की तरफ से जवाब आया है कि वे इन दो पत्रकारों को नहीं जानते।
अनुराग कश्यप ने किसी भी जांच समिति के फैसले के आने से पहले एक वामपंथी कमेडियन वरुण ग्रोवर को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। यानी वामपंथी अपने साथी को बचाने के लिए बेशर्मी की हद तक गिर सकते हैं। वैसे वरुण ने अपने निर्दोष होने पर विश्वास जताया है।
लोग दावा कर रहे हैं कि #मी टू अभियान के माध्यम से भारत में जिन चेहरों का नकाब उतरा है, उनमें से अधिकांश वामपंथी हैं। बहरहाल, यह भी सच है कि पत्रकारिता क्षेत्र एक पक्ष की बात सुनकर निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। इसलिए हम हरेक आरोप के साथ दूसरा पक्ष भी जानने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह की करतूतों को अगले अंक में भी सामने लाने की कोशिश की जाएगी।