राफेल का सौदा बिल्कुल खरा, बोफोर्स जैसी दलाली नहीं
स्रोत:    दिनांक 15-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                             -प्रशांत बाजपेई  
राफेल को लेकर जो सवाल उठाए जा रहे हैं, जो आरोप—प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं, कुछ लोग इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ले गए लेकिन वहां उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इसके बावजूद राफेल पर रार थम नहीं रही है। राफेल के सभी पक्षों और तथ्यों के साथ देखने पर लगता है कि यह सौदा बिल्कुल पारदर्शी है। इसमें बोफोर्स जैसी दलाली नहीं है
आप पुरानी बंदूक बिना गोलियों के खरीदें या नई ऑटोमैटिक राइफल कारतूसों के साथ खरीदें, दोनों में जो फर्क होगा, वही फर्क राफेल के पुराने और नए सौदे में है। लेकिन पहले कोई 'सौदा' हुआ भी था क्या? कांग्रेस अध्यक्ष राहुल हर दिन राफेल पर कुछ न कुछ बोल रहे हैं, क्यों? राफेल की कीमत और तकनीक में क्या अंतर आ गया है? सवाल कई हैं। शुरुआत राहुल गांधी से, क्योंकि वही इस बयानबाजी का नेतृत्व कर रहे हैं।
रपटीली राह पर 'राजकुमार'
चुनाव सिर पर हैं। कांग्रेस और विपक्ष किसी तगड़े मुद्दे की तलाश में हैं। राहुल गांधी राफेल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 'बोफर्स' बनाना चाहते हैं, लेकिन रंग जम नहीं पा रहा। राफेल की हुड़दंगबाजी पर उन्हें फ्रांस सरकार, वायुसेना और सर्वोच्च न्यायालय तीनों झटका दे चुके हैं, पर राहुल मान नहीं रहे। वे भारत के प्रधानमंत्री के लिए स्तरहीन शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कहीं, शब्दों की मर्यादा की सीमाएं लांघते वे उसी रपटीली राह पर तो नहीं बढ़ रहे, जब कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष के संबोधन 'मौत के सौदागर' ने गुजरात में कांग्रेस की बची-खुची दुकान भी समेट दी थी?
मोदी की छवि बेदाग है और राफेल मामला बेदम है। राहुल आम लोगों की तकनीकी जानकारी के (स्वाभाविक) अभाव का लाभ उठाना चाहते हैं। वैसे रक्षा घोटाला शब्द ही ऐसा है कि सनसनी पैदा करता है, लेकिन राफेल और बोफर्स सौदे में गहरा फर्क है। बोफर्स घोटाला भारत सरकार और एक हथियार निर्माता कंपनी के बीच का मामला था। स्वीडन के नेशनल ऑडिटर ने बयान दिया था कि स्विट्जरलैंड के बदनाम बैंकों में संदिग्ध भारतीय खातों में कमीशन की राशि जमा करवाई गई है। इस घोटाले में प्रमुख नाम था इटली के व्यापारी ओटावियो क्वात्रोक्कि का, जिसका तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निवास पर काफी आना-जाना था। कहते हैं कि प्रधानमंत्री आवास के सुरक्षाकर्मी भी उसकी धौंस से बचे नहीं थे। बोफर्स मामले में, सोनिया गांधी के करीबी क्वात्रोक्कि के दो ब्रिटिश बैंक खाते, जिनमें क्रमश: 1 और 3 मिलियन डॉलर जमा थे, ब्रिटिश सरकार द्वारा सील कर दिए गए थे। जिन्हें बाद में कांग्रेस सरकार आने पर पुन: खुलवा दिया गया था। दरअसल, मनमोहन सरकार ने ब्रिटिश सरकार को लिखा था कि क्वात्रोक्कि के खिलाफ सबूत 'पर्याप्त' नहीं हैं इसलिए खातों को बहाल कर दिया जाए। आश्चर्य की बात यह है कि दूसरी तरफ सीबीआई इस मामले की 'जांच' भी कर रही थी। क्वात्रोक्कि के खातों को दोबारा बहाल किए जाने के बाद सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दिया कि वह अभी भी उसके प्रत्यर्पण का प्रयास कर रही है। सीबीआई की याचना पर इंटरपोल ने क्वात्रोक्कि के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी किया और उसे अर्जेंटीना में गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन भारत सरकार उसके खिलाफ भारत की अदालत का आदेश 'प्रस्तुत नहीं करवा सकी', और अर्जेंटीना ने क्वात्रोक्कि को रिहा कर दिया। 12 जुलाई, 2013 को फ्रांस के मिलान में क्वात्रोच्चि की हृदयाघात से मौत हो गई।
तो यह था बोफर्स घोटाला, जिसमें संदिग्ध खाते भी थे, पैसे का लेनदेन भी हुआ था, इंटरपोल, सीबीआई, अदालत सब सक्रिय थे और जिस मामले का 'निबटारा' कांग्रेस सरकार के दौरान हो गया। एक और खास बात यह थी कि बोफर्स मामले को, जोरशोर से, राजीव गांधी के समय रक्षा मंत्री रहे स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उठाया था। पर राफेल पर इल्जाम लगाने वाले राहुल गांधी हैं जिनकी पार्टी की घुलेंगे सरकार पर बोफर्स, कोयला घोटाला, 2जी समेत दर्जनों आरोप लगे हैं, जिनमें से कई की जांच चल रही है। स्वयं राहुल गांधी और सोनिया गांधी नेशनल हेराल्ड घोटाले में उलझे हुए हैं, और जमानत पर हैं। कुछ दागदार विपक्षी नेता भी कभी-कभी उनके राग में सुर मिला देते हैं। ऐसे में जनता की नजर में उनकी बातों की विश्वसनीयता कितनी रह जाती है, यह कहने की आवश्यकता नहीं है।
बेदम आरोपों की झड़ी
दूसरी तरफ, राफेल सौदा दो सरकारों के बीच हुआ रक्षा सौदा है। स्वाभाविक रूप से एक सरकार दूसरी सरकार को रिश्वत नहीं देती। बोफर्स के उलट यहां न कोई विश्वसनीय आरोपकर्ता है, न कोई प्रमाण, न कोई संदिग्ध खाता, न किसी लेनदेन की जानकारी। पर राहुल हमेशा की तरह बेझिझक-बेलौस हैं। उन्होंने लोकसभा में खड़े होकर बयान दे डाला कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से बताया है कि फ्रांस की तरफ से राफेल सौदे को गुप्त रखने की कोई शर्त नहीं जोड़ी गई है। इसके तुरंत बाद फ्रांस सरकार की तरफ से बयान आया कि राहुल गांधी से फ्रांस के राष्ट्रपति ने ऐसा कुछ नहीं कहा और फ्रांस ने राफेल सौदे को गुप्त रखने की शर्त शुरू से रखी है, तब भी जब संप्रग की सरकार थी। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष इससे न तो शर्मिंदा हुए और न हतोत्साहित। उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री मोदी को गंभीरता से नहीं लेते और यूं ही बोलते रहेंगे|। राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री अचानक फ्रांस चले गए और राफेल सौदे पर हस्ताक्षर कर दिए रक्षामंत्री को बिना बताए। सच यह है कि बात 2015 से चल रही थी, जिसमें रक्षा मंत्रालय और वायुसेना शामिल थी। 2016 में जब मोदी फ्रांस गए तब इस सौदे पर दस्तखत हुए।
फिर राहुल गांधी ने कहा कि रक्षा मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव राजीव वर्मा ने राफेल सौदे पर आपत्ति उठाई थी, और सौदे के विरोध में वे छुट्टी पर चले गए। राजीव वर्मा ने मीडिया में आकर इस बात का खंडन किया। उन्होंने बताया कि वे काफी पहले से तय, एक छोटी अवधि का कोर्स करने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए थे। राजीव वर्मा ने ही राफेल सौदे को तय करने वाला कैबिनेट नोट लिखा था। कांग्रेस ने कहा कि वर्मा ने सितंबर में इस डील के खिलाफ नोट लिखा और तुरंत छुट्टी पर चले गए। कार्यालय के दस्तावेज के अनुसार वर्मा ने जुलाई में आवेदन लगा दिया था कि उन्हें सितंबर में इस अध्ययन अवकाश पर जाना है। जाहिर है, राजीव वर्मा ने कांग्रेस के सभी आरोपों को पूरी तरह नकार दिया। कांग्रेस खुलेआम झूठी अफवाह फैलाती पकड़ी गई।
राहुल गांधी ने एक ट्वीट किया जिसका अर्थ था कि नए राफेल सौदे में कोई नई तकनीक नहीं जोड़ी गई है। मोदी सरकार ने भारत के रक्षा उपक्रम एच.ए.एल. (हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लि.) को डसाल्ट के साथ साझेदारी नहीं करने दी और फ्रांस पर दबाव बनाया कि वह अंबानी की रिलायंस रक्षा उत्पादक कंपनी के साथ साझेदारी करे।
दूध का दूध
जब वायुसेना से इस बाबत सवाल पूछे गए तो उसने सिलसिलेवार उत्तर दिए। वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ ने राफेल सौदे का समर्थन करते हुए इसे बहुत अच्छा सौदा बताया। राफेल को लेकर कांग्रेस समेत विपक्ष के चंद नेताओं द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को झुठलाते हुए उन्होंने कहा कि इस सौदे से भारत की शक्ति बहुत बढ़ जाएगी। चीन और पाकिस्तान से एक साथ युद्ध होने की स्थिति में भी यह भारत को बढ़त दिलाएगी। विमान की कीमत पर उन्होंने कहा कि सौदा सस्ती कीमत पर हुआ है और जहां तक राफेल बनाने वाली कंपनी डसाल्ट द्वारा रिलायंस को चुनने का मामला है, तो यह उन्हीं (कंपनी) का फैसला है, जिससे सरकार या सेना का कोई लेना-देना नहीं है। बयान में उन्होंने यह भी इशारा किया कि विमान हथियारों के साथ मिलने से सौदे की कुल लागत बढ़ी है। यानी कि विमान तो पहले से सस्ता मिला है लेकिन इस पर लगने वाले विभिन्न तरह के मिसाइल्स के कारण अतिरिक्त व्यय बढ़ा है। विमान का आधारभूत मूल्य (बेस प्राइज) पहले से कम है। वर्तमान कीमत में इन विमानों का रखरखाव भी शामिल है जिसे डसाल्ट कंपनी वहन करेगी। उन्हीं के शब्दों में, ''हमें विमान के साथ बहुत अच्छी पैकेज डील मिली है। बहुत अच्छे सेंसर, इलेक्ट्रोनिक उपकरण इसमें लगे हैं। विमान जल्दी मिलेगा। रखरखाव की शर्त भी पहले से बेहतर है और हमें ज्यादा वारंटी मिली है।''
 
एच.ए.एल. के साथ डसाल्ट ने समझौता क्यों नहीं किया? इस पर खुलासा करते हुए वायुसेना प्रमुख ने कहा, ''जहां तक विमानों के निर्माण की बात है, एच.ए.एल. थोड़ा पीछे है। सुखोई विमानों पर एच.ए.एल. तीन साल पीछे है। जगुआर विमान निर्माण अपनी तय समय सीमा से छह साल पीछे है। हलके लड़ाकू विमान निर्माण में भी वह पांच साल पीछे है। मिराज 2000 विमान को अपग्रेड करने में एच.ए.एल. दो साल पीछे चल रहा है। एक और विमान में वह पांच साल पीछे चल रहा है।
आश्चर्य नहीं कि एच.ए.एल. के इस प्रदर्शन् को देखते हुए डसाल्ट उसके साथ साझेदारी करने को तैयार नहीं थी। मोदी सरकार के आने के एक साल पहले, 2013 में इस आशय की खबरें विदेशी अखबारों में छप चुकी हैं (देखें मेल ऑनलाइन, 9 अप्रैल, 2013, (हाल्स पुअर ट्रैक रिकॉर्ड कास्ट्स शैडो ऑन फ्रेंच फाइटर जेट डील)। एच.ए.एल. द्वारा बनाया गया तेजस विमान भी दशकों के इंतजार के बाद आया। आया तो पता चला कि इस देसी विमान में 80 प्रतिशत पुर्जे विदेशी हैं। तेजस निर्माण की वर्तमान दर भी 8 विमान प्रतिवर्ष है, जो कि बहुत कम है। न्यूनतम आवश्यकता 18 विमान प्रतिवर्ष की है।
दूसरी बात जो वायुसेना प्रमुख ने कही कि राफेल निर्माण के लिए एच.ए.एल. द्वारा ऊंची कीमतें दी गई थीं, जिस पर डसाल्ट राजी नहीं हुई। तब मामला अटक गया था। धनोआ के शब्दों में, ''सरकार ने सशक्त निर्णय लेते हुए सौदे को आगे बढ़ाया और हमें (वायुसेना को) हाई-टेक क्षमता वाले 36 राफेल विमान दिए गए।'' एच.ए.एल. के साथ दूसरी समस्या यह आ रही थी कि डसाल्ट एच.ए.एल. द्वारा (भारत में) बनाए जाने वाले विमानों की जिम्मेदारी (गारंटी) लेने को तैयार नहीं थी। वायुसेना उपप्रमुख नांबियार ने भी मीडिया को बताया कि वायुसेना को यूपीए की तुलना में कहीं बेहतर राफेल डील मिली है।
हिसाब मांगने वालों का हिसाब
राफेल संबंधी सरकारी दस्तावेजों को देखने पर राहुल के दावों की धज्जियां उड़ती दिखाई देती हैं। राहुल लोकसभा से लेकर रैलियों तक चीख रहे हैं, ''हमारी डील (यूपीए) बेहतर थी।'' सचाई यह है कि उनकी सरकार ने कोई डील की ही नहीं थी। सिर्फ बातचीत चल रही थी तिस पर, कांग्रेस सरकार पुरानी पीढ़ी के विमान खरीदने की बात कर रही थी, जबकि मोदी सरकार ने आधुनिकतम उन्नत विमानों की डील कर ली है, जिन पर हवा से हवा में मार करने वाली पैट्रियट मिसाइल्स भी लग सकती हैं। जबकि इन ज्यादा ताकतवर विमानों का आधार मूल्य (बेस प्राइस) यूपीए सरकार द्वारा तय किए जा रहे आधार मूल्य से काफी कम है।
इतना ही नहीं, इन पर परमाणु हथियार, सोनार (दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को ढूंढने वाली तकनीक), एक से ज्यादा गन आदि लगाए (लोड) जा सकते हैं।
कीमत का गणित
पुरानी पीढ़ी के राफेल की कीमत को लेकर राहुल गांधी खुद काफी भ्रमित दिखाई पड़ रहे हैं। वे कहीं 520 करोड़, कहीं 526 करोड़, कहीं 540 तो कहीं 700 करोड़ बोलते मीडिया में नजर आ रहे हैं। राहुल को यह कीमत समझने में दिक्कत क्यों आ रही है और मोदी सरकार द्वारा तय की गई राफेल (नई पीढ़ी) की कीमत का क्या गणित है। आइए समझते हैं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का राफेल सौदा यदि तय हो जाता तो विमानों की पहली खेप 2017 में मिलती। एक विमान की कीमत 570 करोड़ रुपए होती, जिसमें (मनमोहन सरकार द्वारा की गई सौदेबाजी के अनुसार) 4 प्रतिशत मुद्रास्फीति जुड़ती, जिससे 2017 में एक विमान की कीमत हो जाती 684 करोड़ रुपए। इसमें चक्रवृद्धि ब्याज जुड़ने पर एक राफेल 700 करोड़ रुपए से ज्यादा का मिलता। अब मोदी सरकार ने जो कड़ी सौदेबाजी फ्रांस सरकार के साथ की है उसे देखें। मोदी सरकार ने सौदे में मुद्रास्फीति की दर का हिसाब 1 प्रतिशत रखवाया, क्योंकि फ्रांस में मुद्रास्फीति 1 प्रतिशत की दर से घटती-बढ़ती है। इससे कीमत में भारी अंतर आ गया, और एक विमान 610 करोड़ रु. का पड़ा।
इस कीमत में एक हजार करोड़ रु. बढ़ गए विमान पर लगने वाली उन मिसाइलों, परमाणु बम दागने की क्षमता और सुरक्षा प्रणालियों के, जो इस नए सौदे में शामिल हैं। साथ ही अब राफेल विमानों को भारतीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार ढाला अथवा नई तकनीक से लैस किया जा रहा है, क्योंकि भारत में जहां एक ओर समुद्र और रेगिस्तान है, वहीं दूसरी ओर दुनिया का सबसे ऊंचा और बर्फीला युद्ध क्षेत्र सियाचिन भी है। चीन से युद्ध होने की स्थिति में हमें दुनिया की सबसे विशाल पर्वतमाला हिमालय के ऊपर से उड़ना होगा। यह तकनीक बहुत महंगी है। संप्रग के समझौते में ये सारी बातें शामिल नहीं थीं। उलटे, संप्रग सरकार ने वायुसेना को खाली हाथ रखा। जो नए खुलासे हो रहे हैं, उनसे पता चलता है कि वायुसेना दस साल से भी ज्यादा समय से मिन्नतें कर रही थी कि हालात बहुत खराब हैं, और पाकिस्तान-चीन के गठजोड़ को देखते हुए तुरंत विमानों का सौदा होना चाहिए, लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी फाइलों को दबाए बैठे रहे, लेकिन अपने पार्टी अध्यक्ष के कहने पर वे भी राफेल पर हो रही बयानबाजी में कूद पड़े।
36 क्यों, 126 क्यों नहीं
कांग्रेस ने एक सवाल और उछाला, ''हम तो 126 विमान खरीदने वाले थे, मोदी सरकार ने 36 क्यों खरीदे? यह भी एक घोटाला है।'' इन आंकड़ों का भी एक इतिहास है। 2014 में रक्षा मंत्री एंटनी ने बयान दिया था कि हमारे पास पर्याप्त बजट नहीं है, इसलिए हम फ्रांस से राफेल विमान नहीं खरीद रहे हैं। हम तो जैसे-तैसे तनख्वाह दे रहे हैं। अब वही एंटनी मोदी सरकार से पूछ रहे हैं कि 36 ही क्यों खरीदे? उधर वायुसेना का बयान है कि उसके पास 42 स्कवाड्रन ( एक स्कवाड्रन में 12 से 24 विमान होते हैं) थीं, जो घटते-घटते 31 बची हैं। और 2024 तक मिग की और 10 स्कवाड्रन रिटायर हो जाएंगी। सवाल यह कि वायुसेना को 42 से 31 पर कौन लाया? क्योंकि इतना बड़ा अंतर रातों-रात पैदा नहीं होता। कई दशकों की उपेक्षा से ये हालात पैदा हुए। इस दौरान कांग्रेस या उसके द्वारा समर्थित सरकारें रही हैं। राहत की बात है कि नवीनतम तकनीक के 36 राफेल हथियार समेत मिलने से वायुसेना की ताकत में काफी वृद्धि होने जा रही है।
कानून की धार पर
उधर बार-बार नाम घसीटे जाने से क्षुब्ध रिलायंस कंपनी ने कांग्रेस के नेताओं पर 5 हजार करोड़ रु. का मानहानि का दावा ठोक दिया है। राफेल मुद्दे पर विवाद खड़ा करने के कांग्रेस के अरमानों पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी पानी फेर दिया है। विमान की कीमत और राफेल पर लगने वाले हथियारों की तकनीकी जानकारी सार्वजनिक करने संबंधी याचिका पर न्यायालय ने 10 अक्तूबर को कहा कि उसे विमान की कीमत और तकनीक से जुड़े ब्योरे नहीं चाहिए। न्यायालय तो केवल उस प्रक्रिया की जानकारी चाहता है जिसके तहत यह सौदा किया गया। यानी न्यायालय ने भारत और फ्रांस सरकार के गोपनीयता अनुबंध पर मुहर लगा दी है। इस बीच राहुल पूरी ताकत से राफेल पर अपने सभी आरोपों को दुहरा रहे हैं। राजनीति की मामूली जानकारी रखने वाले व्यक्ति को भी यह पता है कि वे ऐसा करते रहेंगे, मई 2019 तक।