पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के विरोध में मुसलमान
स्रोत:    दिनांक 17-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                          - अम्बा शंकर बाजपेयी
पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने प्रत्येक दुर्गा पूजा समिति को 10-10 हजार रुपए देने की घोषणा की तो मुसलमानों ने उग्र प्रदर्शन किया।  धमकी दे डाली की ममता बनर्जी को सत्ता से उखाड़ फेंकेगे। मुसलमानों के दबाव के चलते दुर्गा पूजा के लिए लगे पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमा के हाथों में से अस्त्र और शस्त्र हटा दिए गए हैं
मुस्लिम संगठनों के दबाव के कारण दुर्गा-पूजा के पंडालों में दुर्गा प्रतिमाओं व अन्य प्रतिमाओं के हाथों से अस्त्र—शस्त्र हटा दिए हैं 
पश्चिम-बंगाल में दुर्गा-पूजा (नवरात्र) बड़ी धूमधाम व भव्य तरीके और धूमधाम से होती है। देश के विभिन्न राज्यों से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग बड़ी संख्या में दुर्गा पूजा के दिनों में यहां आते हैं। जब से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सत्ता में आई है तब से दुर्गा पूजा अपनी पहचान खोती जा रही है। हर बार दुर्गा पूजा के दिनों में कोई न कोई विवाद सामने आता है। दरअसल ममता सरकार की ज्यादातर नीतियां मुसलमानों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुसलमान 27.4% है (2011 डाटा) लेकिन पश्चिम बंगाल के तपन घोष कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी 34 प्रतिशत से ज्यादा है। पश्चिम बंगाल के 8 से ज्यादा जिले मुस्लिम बहुल हैं। वोट बैंक के लिए ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करती हैं।
इस बार ममता बनर्जी ने स्थानीय क्लबों व दुर्गा-पूजा समितियों (28,000 समितियों को) को 28 करोड़ रूपये आवंटित किए प्रत्येक समिति को 10,000 रूपये की आर्थिक मदद देने की घोषणा की तो मुसलमान भड़क गए। उन्होंने ‘टीपू सुल्तान मस्जिद’ के पास उग्र प्रदर्शन ही नहीं किया बल्कि धमकी दे डाली कि ममता बनर्जी को सत्ता से उखाड़ फेंकेगे।
अखिल बंगाल अल्पसंख्यक युवा संघ (आल माइनॉरिटी यूथ फेडरेशन) के बैनर तले 3 अक्तूबर को हुए इस उग्र प्रदर्शन में इस संगठन के महा-सचिव मुहम्मद कमरुजमान ने यहां तक मांग कर दी कि प्रदेश के प्रत्येक मदरसे को 2 लाख रूपये की आर्थिक मदद, मस्जिदों इमामो/मौलवियों को 10,000 रूपये मासिक वेतन/वजीफा, कोलकाता में मुस्लिम पुलिस आयुक्त और पुलिस फ़ोर्स में ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया जाए।
फुरफुरा शरीफ नेता टोहा सिद्धिकी ने तृणमूल कांग्रेस से मांग कि की अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में अल्पसंख्यक समुदाय के उम्मीदवारों को कम से कम 16 सीटें आवंटित की जाएं।
2011 में प्रदेश में ममता बैनर्जी ने पहली बार मस्जिदों के मौलवियों को 2500 रूपये का मासिक वजीफा देने की घोषणा की थी। इसके बाद मुस्लिम संगठनो की मांग लगातार बढ़ती गई। आज उनके हौसले इतने बुलंद हैं की दुर्गा-पूजा पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
मालदा का कलियाचौक ( कलियाचौक में 98% आबादी मुस्लिम है के ब्लाक-2,मोथाबाड़ी) के एक मस्जिद के इमाम असरुल हक़ ने स्थानीय पुलिस स्टेशन को मस्जिद के लेटरहैड पर लिखकर शिकायत दी कि दुर्गा-पूजा के दौरान शोर होने से उनकी भावनाएं आहात होती हैं। मुसलमान पाांच वक्त की नमाज अदा करते हैं, इसलिए जब वह नमाज अदा करें तो उस समय दुर्गा-पूजा समितियों द्वारा लाउड स्पीकर या अन्य किसी माध्यम से कोई आवाज न की जाए। दूसरी तरफ कूचबिहार जिले में ज्यादातर दुर्गा-पूजा के पंडालों में दुर्गा प्रतिमाओं व अन्य प्रतिमाओं के हाथों से अस्त्र—शस्त्र गायब कर दिए गए हैं।
 
 दुर्गा प्रतिमाओं व अन्य प्रतिमाओं के हाथों से अस्त्र—शस्त्र हटा दिए गए 
एक स्थानीय पूजा समिति ‘मैत्री संघ’ ने कहा कि इससे समाज में सामाजिक सदभाव कायम रहेगा जबकि स्थानीय निवासी तपस बर्मन कहते हैं सामाजिक सदभाव की बात करना बेकार की बात है। दरअसल इस बार मुस्लिम संगठनों के दबाव के कारण ऐसा किया जा रहा है। दुर्गा-पूजा शक्ति की पूजा है और शस्त्र पूजा दुर्गापूजा/विजयदशमी का अनिवार्य अंग है।
राज्य सरकार की नीतियों के कारण उनकी संस्कृति पर कुठाराघात किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल हिन्दुओं की स्थिति यह है कि वह अपने रीति रिवाजों के अनुसार अपने त्यौहारों को भी नहीं मना सकते। वहीं मुहर्रम के दौरान मुसलमान खुले तौर पर हाथों में हथियार लेकर सड़क पर जुलूस निकालते हैं।
ममता सरकार में छह मुस्लिम मंत्री है जिसमें से पांच उर्दू भाषी है और एक बंगला भाषी है जबकि प्रदेश में 95 प्रतिशत से भी ज्यादा बंगला भाषी ही लोग हैं। अभी हाल में उत्तरी दिनाजपुर के इस्लामपुर में जो घटना घटी, वास्तविक रूप से वह एक सांस्कृतिक संघर्ष था जहां पर हिन्दू बहुल बांग्ला भाषी लोगों पर उर्दू भाषा व अरबी संस्कृति को जोर जबरदस्ती थोपा गया और उसके बाद वहां खूनी संघर्ष हुआ।
पिछले वर्ष (2017 में) तो दुर्गा-पूजा प्रतिमाओं का विसर्जन तक करने पर ममता सरकार ने रोक लगा दी थी क्योंकि उस दिन ही मुहर्रम था। मामला कोर्ट में पहुंचा, कोलकाता हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि विसर्जन तय समय पर ही होगा। इसके बाद ममता सरकार ने लॉ एंड आॅर्डर का मामला बताते हुए फरमान जारी कर दिया कि जो लोग उस दिन विसर्जन करना चाहते हैं उन्हें स्थानीय पुलिस स्टेशन जाकर इसकी अनुमति लेनी होगी। डर के कारण कोई अनुमति लेने ही नहीं गया। इस कारण अगले दिन ही प्रतिमाओं का विसर्जन हो पाया।
ताजिया निकालने के दौरान सरकार के निर्देशों पर ताजिए के रास्ते में पड़ने वाले सभी पंडालों की सजावट हटा दी गई थी और अधिकांश मंदिरों को तिरपाल से ढक दिया गया था। कोलकाता हाईकोर्ट के निर्णयों को भी नहीं माना गया जबकि न्यायालय ने आदेश दिया था कि विसर्जन उसी दिन होगा।
बहरहाल इस एक समय बंगाल/पश्चिम-बंगाल अपनी कला/संस्कृति भव्यता पूरे दुनिया में प्रसिद्द था लेकिन अब पश्चिम-बंगाल में दुर्गा पूजा कैसे हो? किस प्रकार हो? उनका विसर्जन कैसे हो? और कब हो ? यह मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाली ममता सरकार तय करती है। कथित सेकुलर मीडिया भी इस विषय का खामोश रहता है।