शबरीमला में हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ क्यों ?
स्रोत:    दिनांक 20-अक्तूबर-2018
                                                                                                                    - आशीष कुमार अंशु
मुस्लिम रेहाना फातिमा और क्रिश्चियन कविता क्यों जाना चाहती हैं मंदिर में
केरल में 'किस आॅफ लव' अभियान चलाने वाली रेहाना फातिमा को कम्युनिस्ट सरकार के दिशा निर्देश पर अपनी सुरक्षा में भगवान अयप्पा के दर्शन् कराने ले जाती हुई केरल पुलिस
कविता कोशी, मेरी स्वीटी और रेहाना फातिमा का नाम शबरीमला स्थित अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए चलने वाले अभियान में बढ़—चढ़ कर आया तो मुझे देश के कम्युनिस्ट, चर्च और देवबंद— बरेलवियों के फतवे का इंतजार था। ऐसा नहीं हुआ। मतलब भगवान अयप्पा के लिए इन तीन महिलाओं द्वारा प्रकट किए जा रहे विश्वास और श्रद्धा में कोई झोल है। यह घर वापसी का मामला तो बिल्कुल नहीं है।
अगला सवाल यह कि शबरीमला को विवादित करने वाली कविता कोशी की पहचान मीडिया क्यों नहीं बता रहा कि वह समर्पित कट्टर क्रिश्चियन है और एसएफआई की सक्रिय सदस्य है। या फिर मेरी स्वीटी जीसस से दिव्य शक्ति प्राप्त कर एक बार भगवान अयप्पा के दर्शन करना चाहती है लेकिन उन्हें भगवान अयप्पा के दर्शन की शर्त— चालीस दिन के उपवास को पूरा करने में आपत्ति है। जीसस उन्हें भगवान अयप्पा के दर्शन की प्रेरणा की जगह थोड़ी सदबुद्धि दे देते तो वह हैदराबाद की कम्युनिस्ट पत्रकार कविता जक्कल को समझा पाती कि भगवान अयप्पा में विश्वास रखने वाले उसकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में किसी कम्युनिस्ट पत्रकार को क्या अधिकार कि वह मंदिर के वर्तमान नियमों को धत्ता बताकर प्रवेश की जिद करे।
शबरीमला में भगवान अयप्पा के सबसे बड़े भक्त बने क्रिश्चियन, मुसलमान और कम्युनिस्ट के समूह में जो एक सबसे दिलचस्प चरित्र है, वह है— 'किस ऑफ़ लव' वाली रेहाना फातिमा। जिनका किस ऑफ़ लव का वीडियो उनके पार्टनर मनोज के श्रीधर ने वायरल किया था। रेहाना फातिमा का चर्चा में बने रहने का जुनून ही था जिसने उन्हें तरबूज के साथ एक नग्न तस्वीर खिंचवाने के लिए प्रेरित किया। जिसे एक मित्र के फेसबुक अकाउंट से उन्होंने शेयर किया था। इन दो घटनाओं की वजह से रेहाना फातिमा ने पूरे केरल में पर्याप्त ख्याति अर्जित की। जो ख्याति पाने में कसर बची थी, उसे भगवान अयप्पा पर इस्तेमाल हुआ सेनिटरी नेपकिन फेंकने की योजना बनाकर पूरी कर दी। यह खबर लिखे जाने तक रेहाना फातिमा दुनिया भर में एक चर्चित नाम हो चुकी हैं। अब उनकी मॉडलिंग के उद्देश्य से खिंचवाई गई नग्न—अर्धनग्न तस्वीरें तमाम सोशल साइट्स पर वायरल हो रहीं हैं। अब आप समझ गए होंगे कि शबरीमला में जो हो रहा है, कौन है सबके पीछे और उनका उद्देश्य क्या है?
रेहाना के नाम के साथ जुड़े फातिमा को लेकर जो संकट आने वाले समय में मुसलमान समाज के सामने आने वाला है, उससे बरेली—देवबंद में बैठे इस्लामी उलेमा अब तक वाकिफ नहीं जान पड़ते। जिस तरह की तस्वीरें फातिमा की इन दिनों वायरल हो रहीं हैं। उन्हें जिस तरह तलाशा जा रहा है और उनका नाम डालते ही जिस तरह की तस्वीरें सामने आती है। वह सब इस्लाम की जुबान में हराम ही कहा जाएगा। ऐसे में खादीजा बिन्त की बेटी और मोहम्मद साहब की लाडली का नाम जब कोई गूगल पर डालेगा और सामने रेहाना फातिमा अश्लील तस्वीर सामने होगी तो इस तरह की तस्वीरों से मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों तक क्या संदेश जाएगा? इस पर इस्लामिक विद्वानों को विचार करना चाहिए।
अचानक रेहाना फातिमा इतनी लोकप्रिय क्यों हो गई?
सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमला स्थित भगवान अयप्पा के मंदिर में 10 से 50 साल तक की उन महिलाओं को जाने की अनुमति प्रदान की, जिन्हें पहले मंदिर प्रवेश की अनुमति नहीं थी। इस फैसले के बाद मंदिर खुलने के तीसरे दिन यानि 19 अक्टूबर 2018 को कम्युनिस्ट सरकार के इशारे पर केरल पुलिस ने पूरे दल बल के साथ आन्ध्र प्रदेश की कम्युनिस्ट पत्रकार कविता जक्कल के साथ कॉमरेड रेहाना फातिमा को सुरक्षा के साजो सामान पहनाकर दर्शन कराने ले गई। इतनी सुरक्षा की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि बड़ी संख्या में स्त्री—पुरूष मंदिर के द्वार पर मंदिर के नियमों के खिलाफ किसी भी प्रकार के प्रवेश को निरूद्ध करने के लिए खड़े थे। पुलिस पूरी जोर—आजमाइश के बाद भी कविता और फातिमा को मंदिर में प्रवेश नहीं दिला पाई। श्रद्धालुओं ने 500 मीटर की दूरी पर रास्ता रोके रखा था। पुलिस कार्रवाई की योजना बना रही थी। किसी अनिष्ट की आशंका को देखते हुए मंदिर के मुख्य पुजारी कंडारू राजीवारू ने मंदिर का मुख्य द्वार बंद कर दिया।
दुर्भाग्य की बात है कि वर्तमान केरल की कम्युनिस्ट सरकार को मंदिर में दर्शन कराने के लिए पूरे राज्य से एक ऐसी श्रद्धालू हिन्दू महिला नहीं मिली जो 40 दिन व्रत रखकर भगवान अयप्पा के दर्शन के शर्तों को पूरा करती हुई दर्शन के लिए सामने आती। जबकि नियमों के विरूद्ध दर्शन के लिए आईं कम्युनिस्ट युवतियों के विरोध के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाएं कम्युनिस्ट राज में जुट गईं।
केरल सरकार द्वारा जिस तरह का षडयंत्र किया जा रहा है भगवान अयप्पा के नाम पर उसे केरल की जनता अब गम्भीरता से ले रही है। इसी का परिणाम है कि पिछले दिनों दिल्ली एनसीआर से हजारों की संख्या में भगवान अयप्पा के भक्तों ने जंतर मंतर पर इकट्ठे होकर विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन सरकार पर दबाव बनाने के लिए था कि वह मंदिर की पुरानी परंपरा को बचाए रखने के लिए विधेयक लाए। यहां गुरूवयूर देवस्वम एक्ट, 1978 की बात हुई, जहां स्पष्ट तौर पर लिखा हुआ है कि यहां के धार्मिक मामले में अंतिम और मान्य निर्णय लेने का अधिकार मंदिर के तंत्री के पास होगा।
अंत में एक जानकारी उनके लिए जो सबरीमला प्रकरण को सिर्फ सोशल मीडिया पर पढ़ रहे हैं। सबरीमला में आने वाले श्रद्धालुओं से सबसे अधिक कमाई इरूमेली से शनिधानम तक बड़ी संख्या में रहने वाले क्रिश्चियन और मुसलमानों की होती है। यह कमाई कोई छोटी—मोटी कमाई नहीं है। यहां दो—तीन महीने की मेहनत में पूरे साल भर के बराबर की आमदनी हो जाती है। कम से कम उस कमाई की लाज रखते हुए भी स्थानीय मुसलमानों और क्रिश्चियनों को सबरीमला संघर्ष में पूरे केरल से इकट्ठे हुए श्रद्धालुओं का साथ देना चाहिए।