शबरीमला मंदिर मामला: आस्था पर आघात सहने को तैयार नहीं हिंदू
स्रोत:    दिनांक 23-अक्तूबर-2018
आस्था सबसे ऊपर है। केरल में लाखों लोग इसी आस्था के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका कहना है कि शबरीमला मंदिर मामले में आस्था का सम्मान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय की फिर समीक्षा करे
धार्मिक आस्थाओं को कानून के रास्ते कुचले जाने को लेकर तीव्र विरोध में उतरीं महिलाएं 
 शबरीमला मंदिर के संदर्भ में इन दिनों अनेक तरह की बातें हो रही हैं। एक व्यक्ति ने कहा,‘‘सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को यदि अयप्पा मंदिर के बारे में पूरी जानकारी होती और कभी उन्होंने शबरीमला में भगवान अयप्पा के दर्शन किए होते तो शायद यह फैसला नहीं सुनाया गया होता।’’ दिल्ली में कई दशकों से बसी आयुर्वेद और केरल चिकित्सा पद्धति विशेषज्ञ डॉ. सुधा अशोकन किताबी ज्ञान और लोक आस्था के बीच की दूरी को इसका कारण बताते हुए कहती हैं, ‘‘भगवान अयप्पा का मंदिर सदियों से जिन नियमों का पालन करता आया है वही बना रहना चाहिए। यह लाखों भक्तों की आस्था का प्रश्न है।’’ दिल्ली के सफदरजंग एन्क्लेव स्थित अपने आयुर्वेद चिकित्सा केंद्र में बैठीं डॉ. सुधा अशोकन ने बताया कि केरल की हिंदू महिलाएं अदालत के आदेश के बाद भी मंदिर में नहीं जाएंगी, क्योंकि उनको पता है कि भगवान अयप्पा कौन हैं और उनकी आराधना-दर्शन के क्या नियम हैं। अपने केंद्र में उन्होंने केरल शैली में लकड़ी का मंदिर बनवा रखा है। भगवान अय्प्पा की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, ‘‘हम मलयाली कोई भी ऐसा काम नहीं कर सकते जिससे हमारे अयप्पा नाराज हो जाएं।’’ डॉ. सुधा ऐसी महिला नहीं हैं जो केवल अपने चिकित्सा केंद्र तक ही सीमित हैं। उनके पति अशोकन दिल्ली में जाने-माने पत्रकार हैं। इसलिए देश और उनके राज्य में होने वाली हर गतिविधि से वह परिचित रहती हैं। 50 वर्ष की आयु पार करने के बाद भी वह स्वयं दो बार शबरीमला की 41 दिन की तीर्थयात्रा कर चुकी हैं। वे कहती हैं कि केरल के हिंदुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। हम चाहते हैं कि मंदिर की पवित्रता किसी ‘आजादी’ या ‘समानता’ के नाम पर भंग नहीं की जानी चाहिए।
अयप्पा भक्तों की आस्था से याचिकाकर्ता भी सहमत दिखती हैं। जिन पांच महिला वकीलों ने 12 वर्ष पहले सभी आयु की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश दिए जाने संबंधी याचिका दायर की थी उनको भी कुछ वर्ष पूर्व ही यह अहसास हो गया था कि उन्होंने मलयाली संस्कृति और आस्था की पूरी जानकारी के बिना याचिका दायर कर दी। याचिकाकर्ताओं में से दो ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया, ‘‘भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने सभी उम्र की महिलाओं को संविधान के आधार पर शबरीमला में प्रवेश करने की अनुमति दे दी हो लेकिन हम रजोनिवृत्ति के बाद ही शबरीमला जाएंगे। जैसे हम उत्तर भारतीय महिलाएं हनुमान जी का स्पर्श नहीं करती हैं वैसे ही मलयाली महिलाएं भगवान अयप्पा से मासिक धर्म होने की आयु तक दूर रहती हैं।’’
 
 अयप्पा मंदिर के प्रांगण में भक्तों की भारी भीड
याचिकाकर्ताओं से बातचीत के दौरान लगा कि उनको कुछ लोगों ने महिला अधिकारों के नाम पर इस्तेमाल किया और उन्हें अंधेरे में रखा। एक याचिकाकर्ता ने बताया कि उस समय उम्र बहुत कम थी। केरल के कुछ लोगों ने उन्हें मना भी किया था लेकिन ये लोग सेकुलर पत्रकार बरखा दत्त के लेख से प्रभावित हो गए। हालांकि प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मामले में एडवोकेट आॅन रिकॉर्ड रविप्रकाश गुप्ता ने इन लोगों से ‘लैंगिक समानता’ के नाम पर याचिका दायर करवाई थी इन याचिकाकर्ताओं ने बातचीत के दौरान स्वीकार किया कि याचिका दायर करते समय उन्हें न तो अयप्पा मंदिर के बारे में ज्यादा जानकारी थी, न इसके रीति-रिवाज पता थे और न ही मलयाली भक्तों की अपार श्रद्धा के बारे में पता था। वे तो लैंगिक समानता के मद्दे पर आगे आई थीं। उनके अनुसार यदि उन्हें विषय की सही-सही जानकारी होती तो वे कभी भी याचिका दायर न करतीं। बातचीत का सिलसिला जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया याचिकाकर्ताओं ने बहुत से राज खोले। उन्होंने बताया, ‘‘जब यह मामला तूल पकड़ने लगा तो इसमें जाने- माने लोग भी शामिल होने लगे। इसकी खबर मीडिया में आने लगी तो हमें अपनी भूल का अहसास हुआ। हमें लगा कि किसी की आस्था में दखल देने वाले हम कौन होते हैं। हम पांचों इस विषय पर आपस में बंट गए।’’ प्रेरणा कुमारी ने तो साफ कहा है कि उन्हें मंदिर की परंमपराओं की जानकारी नहीं थी। आज वे चाहती हैं कि सर्वोच्च न्यायालय निर्णय पर पुनर्विचार करे। एक याचिकाकर्ता ने माना कि जब मामला धार्मिक और राजनीतिक रंग लेने लगा तो हमें समझ आया यह लैंगिक समानता का मामला नहीं है। इसके पीछे कुछ तो राजनीतिक स्वार्थ है। हम किसी की धार्मिक भावनाओं का अनादर नहीं करना चाहते थे। हमें समझ आया कि कानूनी मामला अलग होता है और धार्मिक आस्था अलग। यदि हमें पता होता कि केरल में अय्प्पा की इतनी मान्यता है और नियम कड़े हैं तो हम कभी भी याचिका दायर नहीं करते। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मामले की सुनवाई के दौरान वह अदालत में कम ही जा पाती थीं, क्योंकि मामला और ही रूप ले चुका था और लैंगिक समानता के बहाने मंशा कुछ और थी। वह कहती हैं यदि उस समय अयप्पा मंदिर प्रबंधन या किसी पुजारी ने या पंडालम राजसी परिवार से किसी ने उनसे संपर्क किया होता और पूरी बात बताई होती तो बरसों पूर्व ही याचिका वापस ले लेते।

 
 छोटी बच्ची भी अपने माता—पिता के साथ प्रदर्शन करने पहुंची
दिलचस्प बात यह है कि इन याचिकाकर्ताओं में से कई अत्यंत धार्मिक हैं। उनमें से एक ने बताया, ‘‘गुरुद्वारे में ऐसी कोई रोक नहीं है कि मासिक धर्म के दिनों में प्रवेश नहीं कर सकते, लेकिन फिर भी मैं उन दिनों में गुरुद्वारे नहीं जाती। अपने मन को लगता है, गुरुनानक भी तो हमारे भगवान राम और कृष्ण के समान हैं। जो नियम हम अपने मंदिरों के लिए मानते हैं वही गुरुद्वारे के लिए भी मानते हैं।’’ याचिकाकर्ताओं के हाथ से कुछ समय के बाद यह मामला निकल गया। इस पर कुछ और लोगों ने कब्जा कर लिया। वह कहती हैं, ‘‘सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे केवल संविधान की धाराओं के आधार पर देखा। लोक मान्यताओं और आस्थाओं को दरकिनार कर दिया।’’ केरल के हिंदुओं को अपने आस्था- स्थल में बाहरी दखल पसंद नहीं है। केरल इस मामले पर सुलगा हुआ है। धरने- प्रदर्शन जारी हैं। अय्प्पा भक्त किसी भी कीमत पर ब्रह्मचारी अयप्पा के मंदिर की पवित्रता को भंग नहीं होने देना चाहते। मंदिर की पवित्रता और सदियों पुरानी मान्यताओं को बनाए रखने के लिए वे अपनी जान तक देने को तैयार हैं। केरल की महिलाएं कानूनी अधिकार मिलने के बावजूद मंदिर नहीं जाएंगी और यदि 10 वर्ष से 50 वर्ष तक की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश भी नहीं करने देंगी। लेकिन केरल की वामपंथी सरकार हर हालत में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता जता रही है। उधर पंडालम राज परिवार और मंदिर के तंत्री यानी पुजारी सरकार और त्रावणकोर देवासम ट्रस्ट द्वारा बुलाई जा रही बैठकों का बहिष्कार कर रहे हैं। केरल के आम नागरिक की बात तो दूर यहां का प्रबुद्ध वर्ग भी कानून से ज्यादा आस्था और धार्मिक रीति-रिवाजों को महत्व दे रहा है। एशिया नेट टीवी के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख प्रशांत कहते हैं, ‘‘सर्वोच्च न्यायालय का फैसला लागू होना चाहिए। महिला और पुरुष तीर्थयात्रियों में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन मेरे अपने परिवार की महिलाएं भगवान अयय्पा के मंदिर तब तक नहीं जाना चाहतीं जब तक वे 50 वर्ष की नहीं हो जाएंगी।’’ आस्था और संवैधानिक अधिकार के बीच पैदा हुए इस टकराव में बीच का रास्ता क्या निकलता है, यह देखना अभी बाकी है।
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भगवान अयप्पा की महिमा

भगवान शिव और भगवान विष्णु की संतान हैं अयप्पा। मलयाली भाषा में अय्या यानी शिव और अप्पा यानी श्री विष्णु। जब समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धरा था उस समय दोनों का संगम हुआ और उनका एक पुत्र पैदा हुआ जिसे उन्होेंने बाद में वर्तमान केरल की पंपा नदी के किनारे छोड़ दिया था। पंडालम राज्य के राजा राजशेखर की कोई संतान नहीं थी। उन्होेंने बालक को गोद ले लिया और नाम दिया मणिकांत। इसके बाद राजा और रानी के भी एक बेटा हुआ। मणिकांत शस्त्र और शास्त्र दोनों में अति निपुण था। युवराज घोषित करने का समय आया तो राजा मणिकांत को युवराज बनाना चाहते थे और रानी अपने पुत्र को। रानी ने एक चाल चली और कहा कि वह बहुत बीमार है और शेरनी के दूध से ही बीमारी ठीक हो सकती है। मणिकांत अपने खाने-पीने का सामान एक पोटली में बांध कर जंगल की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसने महिषासुर राक्षस की बहन महिषी का वध किया। उसको वरदान था कि उसे केवल हरिहर की संतान ही मार सकती है। लगभग 41 दिन के बाद मणिकांत अपनी सौतेली मां के लिए शेरनी का दूध लेकर लौटा। राजा रानी को अहसास हो गया कि यह कोई दिव्य अवतार है। राजा और रानी ने मणिकांत से कहा कि तुम राज्य संभालो। लेकिन उसने मना कर दिया और संन्यास लेकर जंगलों में जाकर तपस्वी बन गया। बाद में शरीर छोड़ कर बैकुंठ को चला गया। अपने दत्तक पुत्र की याद में राजा ने शबरीमला पहाड़ियों में एक मंदिर बनवाया। कहते हैं मंदिर का निर्माण देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किया और मूर्ति महर्षि परशुराम ने बनायी। मकर संक्रांति के दिन मूर्ति की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा की गई।
मणिकांत ने जितने दिन जंगल में बिताए उतने ही दिन की पवित्र यात्रा सबरीमला की होती है। तीर्थयात्रियों को स्वामी कहा जाता है। 41 दिन तक वे काले कपड़े पहनते हैं और कड़े नियमों का पालन करते हैं। अयप्पा अखंड ब्रह्मचारी थे इसलिए उनके मंदिर में मासिक धर्म होने की आयु तक की महिलाओं के प्रवेश की परंपरा नहीं है। 10 वर्ष तक की बालिकाएं और 50 वर्ष से ज्यादा की महिलाएं ही मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं। यह मंदिर केरल के पश्चिमी घाट में पेरियार टाईगर रिजर्व में 18 पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच है। समुद्र तल से यह लगभग 1574 फीट की ऊंचाई पर है। इसकी यात्रा अति दुर्गम है। यह हिंदुओं के बड़े और पवित्र मंदिरों में से एक है। यहां सभी मत-पंथों के लोगों को जाने की अनुमति है। लेकिन लोक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए एक याचिका पर सुनवाई के बाद केरल उच्च न्यायालय ने 10 वर्ष से लेकर 50 वर्ष तक की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर रोक लगा दी थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने हटा दिया और वर्तमान आक्रोश को जन्म दिया।