बिना संस्कार, नहीं सहकार का मंत्र देने वाले थे वकील साहब
स्रोत:    दिनांक 03-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                              - नरेन्द्र मोदी 
कार्यकर्ता गढ़ना और संगठन का आधार तैयार करना सरल काम नहीं है। किन्तु वकील साहब के नाम से प्रसिद्ध लक्ष्मणराव ईनामदार यह काम सहज ही करते रहे। सहकारिता आंदोलन के लिए, ‘बिना संस्कार, नहीं सहकार,’ का मंत्र उन्होंने ही दिया। गुजरात में अनेक कार्यकर्ताओं के जीवन और संघ-संगठनों के विविध आयामों पर उनकी छाप आज भी दिखाई देती है। वकील साहब के जीवन की झांकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कलम से।
लक्ष्मण माधव ईनामदार उपाख्य वकील साहब का जन्म 21 सितम्बर 1917 को महाराष्ट्र का नंबर तीसरा था। माधवराव की छह बहनों में से चार बहनें समय से पहले ही विधवा होकर अपने बच्चों के साथ मायके में आ गई थीं। माधवराव कैनाल इंस्पेक्टर थे। उनका एक से दूसरे गांव तबादला होता रहता था, इसलिए भरा-पूरा परिवार खटाव में ही रहता था।
1923 में उनके पिताजी का तबादला किर्लोस्करवाडी के पास दुधोंडी गांव में हुआ। वहां लक्ष्मणराव ने स्कूल में प्रवेश लिया। दो साल वहां पढ़कर वे दादाजी के पास वापस खटाव आ गए।1929 में वे 5वीं कक्षा में सतारा के न्यू इंग्लिश स्कूल में दाखिल हुए।
संयुक्त कुटुंब के कारण सीमित आमदनी के साथ ईनामदार परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता था। लेकिन बड़े कुटुंब में रहने में आनंद आता है, यह संस्कार उन्होंने बचपन से ही पाया था। साहब के प्रत्यक्ष सामाजिक जीवन की शुरुआत सतारा से हुई थी। क्रीड़ा मंडल बनाने, अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन करने में उनकी विशेष रुचि थी। कबड्डी और खो-खो के वे निष्णात खिलाड़ी थे।
भागानगर सत्याग्रह
वकील साहब की जीवन तपस्या चल ही थी। एक ओर अभ्यास, दूसरी ओर संघ कार्य। वकील साहब ने कला विषयों में इंटर पास करने के बाद एल-एल.बी. में दाखिला लिया। प्रथम वर्ष की परीक्षा भी पास की, लेकिन तभी 1939 में भागानगर सत्याग्रह शुरू हुआ। पूना में उस समय के एक अग्रगण्य वकील और हिन्दू महासभा के ल.ब.भोपटकर की अगवानी में करीब 150 महाविद्यालयीन युवक सत्याग्रह में शामिल हुए। वकील साहब ने भी अपना एल-एल.बी. की पढ़ाई अधूरी छोड़कर इस टुकड़ी के साथ सत्याग्रह में कदम रखा।
संघ जीवन में ज्यादा से ज्यादा समय देने की परंपरा रही है। नित नई योजना द्वारा स्वयंसेवकों को संघ कार्य के लिए अधिकाधिक प्रेरित किया जाए, ऐसी एक योजना यानी प्रांत स्वयंसेवक योजना बनी। वकील साहब भी संघ की योजनानुसार 1943 में गुजरात में नवसारी आ पहुंचे। तब उनकी उम्र केवल 25 साल थी। 1952 में वकील साहब के युवा हाथों में गुजरात के संघ कार्य की कमान आई। संकटकाल में से हाल ही बाहर आए संघ कार्य का विस्तार करना कोई आसान काम न था। युवावस्था थी, फिर भी वकील साहब ने धीरज से काम लिया। करीब तीन-चार साल के अंदर ही 150 स्थानों पर संघ शाखाएं फिर से पूर्ववत् चालू हो गईं। हर साल होने वाले संघ शिक्षा वर्ग में 150-200 तरुणों ने भाग लिया था। वकील साहब नित्य कसरत, ध्यान, प्राणायाम, गीता-पाठ, उपवास इत्यादि का नियमित पालन करते थे। बातचीत और बैठकों में तथा बौद्धिक वर्गों में विषय को अच्छी तरह से समझाने के लिए वकील साहब नित्य व्यवहार के उदाहरण देते।
व्यापक संपर्क
व्यापक संपर्क वकील साहब की बड़ी विशेषता थी। संघ के क्षेत्र प्रचारक और उसके बाद अखिल भारतीय श्रेणी के अधिकारी बनने के बाद भी उनके प्रवास में निश्चित कार्यक्रमों के बाद का समय ऐसे संपर्क में ही व्यतीत होता था। किसी कारणवश संघ कार्य की जिम्मेदारी से अलग हुए स्वयंसेवकों के परिवारों में जाने से भी वे चूकते नहीं थे।
पैंतीस वर्ष के दीर्घ कार्यकाल में उन्होंने अनेक जिम्मेदारियां संभालीं। 1952 से 1973 तक गुजरात में प्रांत प्रचारक के रूप में और फिर क्षेत्र प्रचारक (गुजरात, महाराष्ट्र, नागपुर, विदर्भ) के रूप में संघ कार्य को मार्गदर्शन दिया था।1948 के संघ प्रतिबंध के समय कार्यकर्ताओं पर अनेक मुसीबतें आ पड़ी थीं। उसमें भी गुजरात में काम कर रहे महाराष्ट्र के स्वयंसेवकों के जीवन-मरण का प्रश्न खड़ा हो गया था, ऐसे समय में उन्होंने भूमिगत रहकर संघ पर प्रतिबंध के विरुद्ध चल रहे सत्याग्रह का सफल संचालन किया था। ऐसी ही दूसरी मुसीबत 1975 के आपातकाल के समय आई थी। उस समय भी उन्होंने कुशल मार्गदर्शन से निर्धारित परिणाम प्राप्त किया था।
1971 में जूनागढ़ के विवेकानंद हाई स्कूल में संघ शिक्षा वर्ग लगा था। एक कार्यकर्ता उसमें शिक्षक के रूप में आए थे। 16-17-18 मई को पूज्य गुरुजी वर्ग में पधारे थे। वहां से वे किसी अन्य प्रांत के वर्ग में जाने के लिए रवाना हुए। उनके प्रस्थान के तुरंत बाद वकील साहब ने उस कार्यकर्ता को कक्ष में बुलाया। उसके कंधे पर हाथ रखकर प्रेम से कहा, आप अपने घर वापस जाने की तैयारी करो। कार्यकर्ता हिल गए और कांपते स्वर में पूछा, वकील साहब, मुझसे कोई भूल हुई? क्या मैंने अनुशासन भंग किया है? वकील साहब बोले, नहीं भई, ऐसा कुछ भी नहीं है। कार्यकर्ता की दुविधा बढ़ गई। उसने पूछा, तो फिर मुझे घर वापस जाने के लिए क्यों कह रहे हैं? वकील साहब ने फिर धीरे से अपने हाथ में छुपाया हुआ टेलीग्राम खोलकर उन्हें दिखाते हुए कहा, देखो, तुम्हारे पिताजी का तार आया है। लिखा है, ‘इंटरव्यू का बुलावा आया है, जल्दी आओ।’ इसलिए जाओ और सफलतापूर्वक इंटरव्यू दो। कार्यकर्ता ने दलील दी, मैंने तो अन्य भी कई जगह एप्लाई कर रखा है। इस इंटरव्यू के लिए मुझे वर्ग को छोड़ना नहीं है। अब वकील साहब का स्वर अधिक संवेदनापूर्ण बना। कार्यकर्ता का कंधा धीरे से दबाते हुए बोले, देखो, आपके घर की आर्थिक स्थिति खराब चल रही है। आपको इस बात का पता हो या न हो, लेकिन मुझे हर छोटी से छोटी बात मालूम है। आपका कुटुुंब आजकल भयंकर मुश्किलों का सामना कर रहा है, इसलिए आपको आर्थिक रूप से उन्हें मदद देनी चाहिए। संघ कार्य तो जीवन भर करना ही है, लेकिन अभी तो आपको तुरंत जाना चाहिए, नौकरी पर लग जाना चाहिए और पिताजी का बोझ हल्का करना चाहिए। कार्यकर्ता की आंखें भर आर्इं। कर्म कठोर अनुशासन के आग्रही प्रांत प्रचारक का दायित्व निभाने वाले वकील साहब हर परिवार की चिंता करते थे। शायद इसीलिए असंख्य कार्यकर्ता नहीं, असंख्य परिवार संघ कार्य में जुड़े।
संघ देखभाल करता है
1982-83 का वर्ष होगा। वकील साहब की तबीयत बिगड़ती जा रही थी। एक स्वयंसेवक ने उनके पास आकर कहा, प्रभु की कृपा से मुझे चार पैसे मिले हें, जिसमें से कुछ आपकी देखभाल के लिए खर्च करना चाहता हूं, आप उसको स्वीकार करें। वकील साहब ने जवाब दिया, भाई, हम अपने गरीब बंधुओं के लिए जो मेडिकल सेंटर चलाते हैं, उसमें इसका उपयोग करेंगे। उन्होंने पैसे रख लिये और उस स्वयंसेवक को भी संतोष हुआ। 35 वर्ष तक सतत गुजरात के एक से दूसरे गांव नियमित घूमते रहे वकील साहब केवल संघ कार्य ही नहीं, संपूर्ण समाज जीवन की रुग्णावस्था दूर करने के लिए संकल्पबद्ध थे। उन्होंने तो शाखा ही चलाई, लेकिन शाखा में से निर्मित हजारों कार्यकर्ता आज भी समाज जीवन के अनेक क्षेत्रों को प्रकाशित कर रहे हैं। इन कार्यों की सूची लंबी है। वकील साहब के जीवन-यज्ञ का यही प्रेरक परिणाम है। राष्ट्र-निर्माण के यज्ञ में जुटे रहे इस शिल्पी के नाम की पट्टिका कहीं भी नहीं लगी है। वे तो हजारों कार्यरत हृदयों के सिंहासन पर विराजमान हैं। केंसर की जानलेवा बीमारी से ग्रस्त होने के बावजूद वे अंत समय तक संघ कार्य में जुटे रहे। पूना में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। गुजरात के संघ-जीवन में आज भी वकील साहब का प्रतिबिंब दिखता है।
(पुस्तक ज्योतिपुंज से साभार)