शबरीमला मंदिर मामला: वामपंथी सरकार ने अपनाए बहुत से हथकंडे पर हिंदू नहीं झुके
स्रोत:    दिनांक 30-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                       - टी. सतीशन, केरल से
शबरीमला मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के बाद केरल की वामपंथी सरकार ने हिंदुओं के दमन के लिए क्या—क्या हथकंडे नहीं अपनाएं, मुस्लिम महिला रेहाना फातिमा को पुलिस ने घेरे में लेकर मंदिर में प्रवेश कराने की कोशिश भी की लेकिन हिंदु नहीं झुके
 पुलिस के घेरे में जबरन प्रवेश करने की कोशिश करती रेहाना फातिमा
घने जंगलों की सुरम्य हरियाली से ढकी पहाड़ी पर स्थित केरल का शबरीमला मंदिर हिंदुओं का एक पावन तीर्थस्थल है जहां हर साल करोड़ों भक्त खिंचे चले आते हैं। इस मंदिर में आने से पहले भक्तों को 41 दिन का कठिन व्रत रखना पड़ता है; 10 से 50 के बीच की आयु की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित है; भक्त सिर पर नैवेद्य से भरी पोटली इरुमुड्डीकेटु लेकर मंदिर पहुंचते हैं। किसी भी श्रद्धालु महिला को कभी भी इन नियमों का उल्लंघन करने का ख्याल तक नहीं आया। भगवान स्वामी अयप्पा के दर्शन की ऐसी रीत है तो है। लेकिन अब अचानक कम्युनिस्ट, माओवादी वामपंथी महिलाओं और हिंदू धर्म विरोधी इस मंदिर की परंपराओं, और हिंदू जीवन शैली को ध्वस्त करने पर आमादा हैं।
राज्य की माकपा के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार ने हमेशा शांत रहने वाले मंदिर परिसर और वहां जाने के मार्ग को विरोध की अग्नि से झुलसाया हुआ है। दरअसल मंदिर में महिला दर्शनार्थियों के संदर्भ में हाल में आया सर्वोच्च न्यायालय का फैसला हिन्दू परंपराओं को तिलांजलि देने की बात करता है जो किसी आस्थावान हिन्दू को स्वीकार्य नहीं है। यह फैसला 2006 में 5 लोगों द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जवाब में आया था, लेकिन आज उनमें से तीन-अधिवक्ता प्रेमकुमारी, अधिवक्ता सुधा पाल और अधिवक्ता लक्ष्मी शास्त्री-ने फैसले से पहले ही इस संवाददाता को बताया था कि वे उन महिलाओं के साथ हैं जो मंदिर में दर्शन करने के लिए 50 साल की आयु तक पहुंचने का इंतजार करने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि वे केरल की महिलाओं की भावनाओं का सम्मान करती हैं। उन्हें मंदिर के विधि-विधान के बारे में पता नहीं था। उनमें से कुछ इस मामले से खुद को हटाना भी चाह रही थीं लेकिन उन्हें अदालत से इसकी अनुमति नहीं मिली थी।
अदालत के फैसले के बाद हिंदू संगठनों, पंडालम शाही परिवार और मंदिर के पुजारियों के परिवार ने तिरुविथमकूर देवासम बोर्ड (टीडीबी) और प्रदेश की पिनरई विजयन सरकार से एक पुनर्विचार याचिका दायर करने का अनुरोध किया था। लेकिन, माकपा और मुख्यमंत्री पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने के खिलाफ थे। इसने राज्य में एक चिंगारी सुलगा दी थी। 2 अक्तूबर को सभी उम्र की हिन्दू महिलाएं सड़क पर उतर आईं और नाम जप यात्रा निकाली। यह बेहद शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन था। लाखों महिलाओं ने इस स्वत:स्फूर्त प्रदर्शन में भाग लिया। केरल का इतिहास पहली बार ऐसी किसी गतिविधि का साक्षी बना था।
8 अक्तूबर को रा.स्व. संघ और इसके आनुषंगिक संगठनों ने शबरीमला मंदिर की शुचिता की रक्षा के लिए महिलाओं की ओर से शुरू किए गए इस आंदोलन में शामिल होने का फैसला किया। संघ परिवार से जुड़े संगठनों के आंदोलन में प्रवेश ने माहौल में और ऊर्जा भर दी। प्रदेश भाजपाध्यक्ष श्रीधरन पिल्लई ने पंडालम अयप्पा मंदिर से तिरुअनंतपुरम तक एक लंबी शबरीमला संरक्षण यात्रा निकाली। हजारों पार्टी कार्यकर्ताओं और श्रद्धालुओं के साथ राजग के सभी सहयोगियों दलों ने इस यात्रा में हिस्सा लिया। भाजपा के कई राष्ट्रीय नेता भी यात्रा के दौरान बीच-बीच में शामिल होते रहे।
 
 शबरीमला मंदिर में उमड़ी श्रद्धालुओं की अपार भीड़
10 अक्तूबर को श्रद्धालुओं ने अपने विरोध के संकेत के तौर पर पूरे राज्य में 200 जगहों पर राजमार्गों को अवरुद्ध कर दिया। प्रदर्शन में महिलाएं भी काफी संख्या में उपस्थित थीं। उनके संकल्प को सूर्य की तपती किरणें भी नहीं पिघला सकीं। जब परंपराओं की रक्षा के लिए उभरे जन आंदोलन को अत्यधिक लोकप्रियता और सार्वजनिक समर्थन मिलने लगा तो माकपा ने पलटवार के लिए अपनी सेना खड़ी करने की कोशिश की, पर बुरी तरह विफल रही। पत्तनमथिट्टा में महिलाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से संबंधित बैठक के बहाने से माकपा की बैठक में बुलाया गया था, लेकिन सभी यह कहते हुए बैठक से बाहर निकल आईं कि उन्हें धोखा दिया गया है। उन्होंने कहा कि उनका समर्थन शबरीमला की प्राचीन परंपराओं को बरकरार रखने के लिए है। माकपा नेता सांसद पी. के. श्रीथी ने श्रद्धालु महिलाओं के बारे में एक अश्लील टिप्पणी की जिस पर आम केरलवासियों का गुस्सा फूट पड़ा।
इस बीच सरकार को केरल उच्च न्यायालय के सामने हिंदू मंदिरों के प्रशासन को संभालने के लिए निर्धारित देवासम बोर्ड में आयुक्त और सहायक आयुक्त के तौर पर गैर-हिंदुओं की नियुक्ति की अनुमति देने के लिए नियम में संशोधन करने की गलती स्वीकार करनी पड़ी।
उन दिनों मुख्यमंत्री पिनरई केरल में आई बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण के लिए पैसा मांगने संयुक्त अरब अमीरात गए हुए थे। यात्रा पर निकले समय उन्होंने घोषणा की थी कि जो महिलाएं मंदिर में प्रवेश करना चाहती हैं, उन्हें सरकार से पूरा समर्थन मिलेगा। पर वे बड़ी चतुराई से इस बात को नजरअंदाज कर गए कि शबरीमला में स्त्री-पुरुष का भेदभाव तो है ही नहीं। वहां सिर्फ महिलाओं की आयु से जुड़ा एक प्रतिबंध है जिसे सभी श्रद्धालु महिलाएं श्रद्धा के साथ निभाती आई हैं।
17 अक्तूबर को मंदिर के कपाट खुले तो भक्तों को यकीन था कि माकपा प्रतिबंधित आयु की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश कराने के लिए सभी संभव हथकंडे अपनाएगी। इसलिए, महिला श्रद्धालु उसकी चाल को विफल करने के लिए सबरीमाला जाने के सभी मार्गों पर शांतिपूर्ण विरोध के साथ डटी थीं। आखिरकार, सरकार और पुलिस ने मिलकर पत्रकार कविता कोशी और रेहाना फातिमा, जो किस आफ लव नाम का गंदा अभियान चला रही हैं, को मंदिर तक ले जाने की भरसक कोशिश की। लेकिन, भक्तों ने उन्हें मंदिर की ओर बढ़ने नहीं दिया। अंतत: पुलिस को उन दोनों को वहां से हटाना पड़ा। भक्तों ने इसे विजयादशमी पर श्रद्धा का विजयोत्सव बताया। उसी दिन 47 वर्षीय मैरी स्वीटी ने मंदिर जाने के लिए पुलिस सुरक्षा मांगी, लेकिन उप पुलिस अधीक्षक ने इनकार कर दिया।
पुलिस भाजपा की महिला कार्यकर्ताओं प्रो. वी.टी. रीमा और शोभा सुरेंद्रन को गिरफ्तार करके गाड़ी तक घसीटते हुए ले गई। भक्तों की दृढ़ आस्था के कारण मंदिर की प्राचीन परंपरा पर कोई आंच नहीं आई। थुलम पूजा के बाद 22 अक्तूबर को मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए।
बहरहाल, अदालत ने 13 नवंबर को अपने पहले के फैसले के विरुद्ध 19 याचिकाओं और 2 पुनर्विचार याचिकाओं पर विचार करने का निर्णय लिया है।