सरदार पटेल को कांग्रेस ने कभी अपना माना क्या ?
स्रोत:    दिनांक 31-अक्तूबर-2018
     दुनिया जिन्हें भारत का बिस्मार्क कहती है, उन सरदार पटेल का राष्ट्रीय स्मारक तक राजधानी दिल्ली में नहीं बनवाया गया जबकि राज परिवार के नाम के ट्रस्ट और फाउंडेशन फलते-फूलते रहे। सैकड़ों सरकारी योजनाएं (केंद्र और राज्य सरकार दोनों की), संस्थान, महोत्सव, पुरस्कार छात्रवृत्तियां, फेलोशिप, विश्वविद्यालय आदि अकेले गांधी परिवार के नाम कर दिए गए, सरदार को जानबूझकर भुलाया गया
जहां एक ओर लौह पुरुष की विशाल कांस्य प्रतिमा भारत गणराज्य की शक्ति और एकता का प्रतीक बनकर खड़ी है, वहीँ कुछ राजनैतिक धड़े इसके बोझ के नीचे दबे कराह से रहे हैं| ये बोझ उनके द्वारा इतिहास के साथ किये गए अन्याय का है। चाटुकारिता के बीते दशक वर्तमान की शर्मिंदगी बन गए हैं| सत्ता की परिक्रमा कर-करके जिन्हें अब चक्कर आने लगे हैं, वो सर पकड़े “प्रतीकों को चुराने” के इलज़ाम लगा रहे हैं, लेकिन नर्मदा के अंचल में स्थापित सरदार पटेल की ये मूर्ति गवाही दे रही है कि वक्त के दरिया में काफी पानी बह चुका है
कांग्रेस ने सरदार क्यों बिसराया ?
प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात के अपने मुख्यमंत्री काल में ही इस स्मारक के निर्माण की घोषणा कर दी थी। आज कांग्रेस कह रही है कि सरदार पटेल तो कांग्रेस में थे, और मोदी कांग्रेस के प्रतीकों को चुरा रहे हैं। सवाल ये है कि कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकारों ने सरदार पटेल को प्रतीक बनाया कब था ? स्वतंत्रता के बाद जिस परिवार के हाथ सत्ता आई, सारे सार्वजनिक स्थानों को उसी परिवार के नाम करने की परिपाटी स्थापित की गई। हजारों वर्ष के कालखंड में हुए हजारों महान व्यक्तित्वों को भुला दिया गया| उन बिसरे दिग्गजों में सरदार पटेल भी एक रहे हैं| नेहरु और श्रीमति इंदिरा गांधी ने प्रधानमन्त्री रहते हुए स्वयं को भारत रत्न से सम्मानित कर डाला। तब भी उन्हें सरदार की याद नहीं आई। राजीव गांधी को भारत रत्न दिया गया। फिर सरदार पटेल को 1991 में। और 1991 ही क्यों ? हुआ यूँ, कि 1990 में कांग्रेस के हाथ से गुजरात की गद्दी सरक गई। चिमनभाई पटेल के नेतृत्व में जनता दल और भाजपा गठबंधन की सरकार बनी। भारत में दुर्भाग्य है कि महापुरुषों का भी मूल्यांकन क्षेत्र-भाषा-जाति के आधार पर किया जाता रहा है। तो जब गुजरात हाथ से खिसकता दिखने लगा तो गुजरात में जन्मे सरदार पटेल याद आए। अन्य कोई तर्किक उत्तर तो समझ नहीं आता। आखिर क्यों सत्ता में बैठे लोगों को भारत रत्न चढ़ाए जाते रहे जबकि 1950 में देहत्याग करने वाले सरदार पटेल को 41वर्षों बाद ये सम्मान प्रदान किया गया। दुनिया जिन्हें भारत का बिस्मार्क कहती है, उन सरदार पटेल का राष्ट्रीय स्मारक तक राजधानी दिल्ली में नहीं बनवाया गया जबकि राज परिवार के नाम के ट्रस्ट और फाउंडेशन फलते-फूलते रहे। जिन ट्रस्टों के नाम घोटालों में सामने आते रहे। सैकड़ों सरकारी योजनाएं (केंद्र और राज्य सरकार दोनों की), संस्थान, महोत्सव, पुरस्कार, अवार्ड, चेयर्स, अस्पताल, हवाई अड्डे, बंदरगाह, स्टेडियम, खेल आयोजन, ट्रॉफी, राष्ट्रीय उद्यान, संग्रहालय, छात्रवृत्तियां, फेलोशिप, विश्वविद्यालय आदि अकेले गांधी परिवार के नाम कर दिए गए, जबकि सरदार पटेल को जानबूझकर भुलाया गया। आधुनिक भारत के राजनैतिक एकीकरण का महान काम करने वाले सरदार पटेल के साथ जिन्होंने ये सुलूक किया, वो आज उन्हें अपना बताने में लगे है, और प्रतीकों को चुराने की बात कर रहे हैं ? दशकों तक कांग्रेस के पोस्टरों में जिनका चेहरा नहीं दिखा और प्रकाशनों में जिनका जिक्र नहीं आया उन सरदार पटेल से यदि कांग्रेस को अचानक इतना लगाव उत्पन्न हो गया है, तो उन्हें प्रसन्न होना चाहिए कि आखिरकार सरदार को इतिहास में उनका सही स्थान मिल रहा है। लेकिन वो परेशान हैं। ये परेशानी ही सब कुछ बयां कर रही है। सच ये है कि प्रासंगिता खो रहे लोग सरदार पटेल की बढती प्रासंगिकता से बेचैन हैं।
राष्ट्रीय पुनर्जागरण का बोध :   राष्ट्रीयता के प्रति सरदार की दृष्टि स्पष्ट थी। स्वतंत्र भारत में विदेशी आक्रांताओं द्वारा खड़े किये गए आतंक के प्रतीकों को हटाकार पुनः भारत की संस्कृति का उद्घोष हो ऐसे प्रयास उन्होंने किए। इसी कड़ी में उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनरोद्धार का बीड़ा उठाया| महात्मा गांधी ने इसका स्वागत किया। प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इसमें सहयोग किया, लेकिन पंडित नेहरु ने स्वयं को इस कार्य से पूरी तरह अलग रख। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत के राष्ट्रपति को मंदिर के प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम में जाने से रोकने का प्रयास किया। खैर, राजेंद्र बाबू सोमनाथ पहुंचे और कहा “''सोमनाथ मंदिर इस बात का परिचायक है कि पुनर्निर्माण की ताक़त हमेशा तबाही की ताक़त से ज़्यादा होती है.'' इस प्रकार सरदार का संकल्प पूरा हुआ। दो समकालीनों का राष्ट्र के प्रति दृष्टियों का ये अंतर आज कांग्रेस के लिए असहजता उत्पन्न कर रहा है। ये असहजता बढ़ती जा रही है। खासतौर पर जब उसी खानदान के कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष आज खुद को आस्थावान हिन्दू के रूप में पेश करने में जुटे हैं | 
राष्ट्रीय हितों के मोर्चे पर
जम्मू-कश्मीर विलय, हैदराबाद के पाकिस्तान परस्त निजाम से निपटना, जूनागढ़ और भोपाल के नवाब के भारतघाती स्वप्नों को चकनाचूर करना, हर मौके पर सरदार पटेल की दूरदर्शिता, गहरी राजनैतिक समझ और स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टी दिखाई पड़ती है| निज़ाम की सेनाएं हैदराबाद के हिंदुओं का कत्लेआम मचा रहीं थीं, और नेहरु सैनिक कार्यवाही करने में हिचक रहे थे| पाकिस्तानी सेना कबायलियों के वेश में कश्मीर पर चढ़ आई थी, हजारों बलात्कार, क़त्ल, लूटपाट और आगजनी हो रही थी, और नेहरु विदेशनीति की दार्शनिक व्याख्याएं कर रहे थे| इन कठिन अवसरों पर सरदार पटेल ही थे, जिन्होंने सेना का मार्ग प्रशस्त करवाया था| 1924 में नेहरु बोल्शेविक क्रांति (कम्युनिस्ट क्रांति) की दसवीं वर्षगांठ में भाग लेने रूस पहुँचे और कम्युनिस्ट व्यवस्था से अभिभूत हो उठे | वो चमकते लाल शामियानों के पीछे सड़ते रूस के करोड़ों किसानों मजदूरों जनसामान्य और नस्लीय सफाए के शिकार लोगों के शव नहीं देख सके| न ही वो रूस की सत्ता पर पकड़ जमा चुके स्टालिन के, गांधी, भारत तथा स्वयं उनके प्रति हिकारत भरे विचारों को भांप सके| भारत लौटकर उन्होंने कांग्रेस की बैठकों में कम्युनिस्ट व्यवस्था की प्रशंसा और वकालत शुरू कर दी | जिस पर गांधी जी को लगाम कसनी पडी | आजादी के बाद, कम्युनिस्ट व्यवस्था से सम्मोहित नेहरु चीन की मित्रता के स्वांग में फंस गए | सरदार पटेल इससे चिंतित थे। उन्होंने नेहरू को पत्र लिखकर आगाह किया।
7 नवंबर 1950 को लिखे गए इस पत्र में सरदार ने लिखा “चीन की सरकार ने शांतिपूर्ण इरादों की घोषणा करके हमें धोखा देने का प्रयास किया है। वे हमारे राजदूत के मन में यह बात बिठाने में सफल हो गए हैं, कि चीन तिब्बत मामले का शांतिपूर्ण हल चाहता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस पत्राचार के बीच के समय में चीनी तिब्बत पर भीषण आक्रमण की तैयारी कर रहे हैं। त्रासदी ये है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया है परंतु हम उन्हें चीन की कूटनीति और दुष्ट इरादों से बचाने में असफल रहे हैं। ......हमें समझ लेना चाहिए कि वे (चीन) शीघ्र ही तिब्बत की भारत के साथ हुई तमाम पुरानी संधियों (सीमा संबंधी) को नकार देंगे। तिब्बत के साथ हुई जिन संधियों के आधार पर भारत पिछले आधी सदी से सीमान्त संबंधी और वाणिज्यिक व्यवहार करता आया है, वे सारी संधियां (चीन द्वारा) अमान्य कर दी जाएंगी।..."
नेहरू नहीं माने 
सेना और सैन्य तैयारियों की पूर्ण उपेक्षा की| “हिंदी चीनी भाई-भाई“ का नारा लगाते हुए नेहरु देश को 1962 के अपमानजनक युद्ध में ले गए और भारत को चीन के हाथों अपनी भूमि और वीर सैनिकों के प्राण गँवाने पड़े। सरदार पटेल की भविष्यदृष्टि अक्षरशः सत्य साबित हुई| उन्होंने लिखा था “चीन की जमीन की भूख (Chinese Irredentism) और कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद पश्चिमी (यूरोपीय) विस्तारवाद और साम्राज्यवाद से अलग है। चीन ने विचारधारा का आवरण ओढ़ा हुआ है, ये उसे दस गुना अधिक खतरनाक बनाता है।...” इसी पत्र में उन्होंने लिखा “पिछले तीन वर्षों में हम नगा लोगों अथवा असम की पहाड़ी जनजातियों से कोई उल्लेखनीय संवाद नहीं कर पाए हैं। यूरोपीय मिशनरियां व अन्य आगंतुक उनके संपर्क में रही हैं, जिनका भारत और भारतीयों के प्रति कोई सदभाव कतई नहीं रहा है।" शेष इतिहास है
इतिहास राष्ट्र का अनुभव होता है
इतिहास वास्तविकता में याद रखा जाए तो समाज की आंख बन जाता है| ये आंख बतलाती है कि क्या है जिसका गौरव करना करना चाहिए और कौनसी गलतियाँ हुईं, जिन्हें दुहराया नहीं जाना चाहिए| ये समझ हमें बतलाती है कि हम कौन हैं और हमें किस ओर बढना चाहिए ।
सरदार पटेल के शब्दों में “हमारे पास स्पष्ट मत होना चाहिए कि हम क्या प्राप्त करना चाहते हैं, और उसे किस विधि से प्राप्त करेंगे। किसी भी प्रकार की हिचक, अपने लक्ष्य को अर्जित करने में अनिर्णय अथवा अपने उन लक्ष्यों को अर्जित करने संबंधी नीतियों के प्रतिपादन में अक्षमता हमें दुर्बल बनाएगी, और उन खतरों की वृद्धि करेगी जो स्पष्ट लक्षित हो रहे हैं।"
इतिहासजन्य अनुभव है कि जैसा इतिहास पढ़ाया जाएगा वैसी पीढ़ी तैयार होगी| जैसे अक्स गढ़े जाएंगे वैसी परिपाटी बनेगी| सरदार पटेल का ये अभूतपूर्व स्मारक अतीत की गलतियों का एक परिमार्जन है| आशा करनी चाहिए कि यह स्मारक लौह पुरुष के फौलाद को देश की पीढ़ियों में स्थापित करेगा| आत्मगौरव और आत्मविश्वास के सच्चे प्रतीकों को उभारने का ये समय है| भारत के पश्चिमी तट पर खड़े सरदार तेज बदलावों के इस दौर को अपनी पैनी-अनुभवी आंखों से निहार रहे हैं। ये एक सुखद अहसास है