अपने गिरेबां में कब झांकेगा मीडिया ?
स्रोत:    दिनांक 31-अक्तूबर-2018
खबरों को को गलत रंग देकर भारतीय मीडिया अपनी नई पहचान गढ़ रहा है जाति, धर्म और राजनीतिक विचारधारा से जुड़े मामलों में मुख्यधारा मीडिया का दोहरा रवैया अब रोजमर्रा की बात है। ऐसा पहले कभी-कभी होता था लेकिन अब अखबार, चैनल और समाचार पोर्टल इसे अपनी पहचान बना चुके हैं। चाहे इसके लिए उन्हें खबरों को तोड़ना-मरोड़ना या तथ्यों को छिपाना ही क्यों न पड़े।
यौन शोषण से जुड़े मीटू कैंपेन में एमजे अकबर पर आरोप लगे तो मीडिया ने खूब हंगामा किया। यह कैंपेन करीब हफ्ते भर देश की सबसे बड़ी खबर बना रहा। लेकिन जब पंजाब की एक महिला आईएएस अफसर ने वहां की कांग्रेस सरकार के मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी पर अश्लील संदेश भेजने के आरोप लगाए तो मीडिया ने आंख-कान बंद कर लिए। हां, दैनिक भास्कर ने चौथे पेज पर खबर छापी। खबर से जुड़े बाकी पक्षों के नाम भी लिखे, लेकिन आरोपी मंत्री का नाम गायब कर दिया। पर ज्यादातर अखबारों और चैनलों ने #मी टू अभियान से जुड़ी इस खबर को हाथ तक नहीं लगाया। यौन शोषण के आरोपों पर मीडिया ने अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत तक नहीं समझी। विनोद दुआ और सिद्धार्थ भाटिया ही नहीं, तमाम मीडिया संस्थानों में कई संपादकों और बड़े पत्रकारों पर यौन शोषण के आरोप लगे, लेकिन उनकी चर्चा सोशल मीडिया से आगे नहीं जा पाई।
अमृतसर रेल हादसे के बहाने मीडिया ने अपने कांग्रेसी चरित्र को एक बार फिर से उजागर किया। हादसा होते ही मानो गिद्धों का एक झुंड टूट पड़ा। सर्वप्रथम रेलवे को दोषी ठहरा दिया गया। जब हादसे की थोड़ी जानकारी सामने आई तो दशहरे के पर्व पर टीका-टिप्पणी शुरू हो गई। जैसे ही यह साफ हुआ कि मेले का आयोजक कांग्रेस पार्टी के नेता है, मीडिया का सुर बदल गया। अब यह साबित करने की कोशिश शुरू हो गई कि इसमें प्रशासन ही नहीं, रेलवे की भी गलती थी। इसके लिए झूठे तथ्य गढ़े जाने लगे। कांग्रेस के दुष्प्रचार पोर्टल 'द वायर' ने यहां तक झूठ बोला कि इंजन की हेडलाइट बंद थी। सच्चाई को सामने लाने के लिए रेलवे ने जब तथ्य रखे तो आजतक चैनल के अनुसार उसने 'जिम्मेदारी से पल्ला झाड़' लिया। लेकिन इसी भाषा का इस्तेमाल पंजाब की कांग्रेस सरकार के लिए देखने को नहीं मिला, जो आयोजकों को खुलेआम बचाने में जुटी रही। अगर ऐसा ही हादसा किसी भाजपा शासित राज्य में हुआ होता तो क्या मीडिया का रवैया वहां की सरकार के लिए इतना नरम होता?
शबरीमला विवाद पर मीडिया का रवैया हैरान करने वाला
शबरीमला विवाद पर इन समाचार चैनलों ने जैसा रवैया दिखाया वह हैरान करने वाला है। खास तौर पर अंग्रेजी चैनलों ने हिंदुओं की आस्था को लेकर अपशब्दों की झड़ी लगा दी। भगवान अयप्पा के भक्तों के लिए 'गुंडे' और 'पुरुषवादी' जैसे विशेषण प्रयुक्त किए गए। मीडिया को बखूबी पता है कि वो ऐसी भाषा सिर्फ हिंदुओं के लिए इस्तेमाल कर सकता है। किसी और पंथ के मामले में वह इतना साहस दिखा दे तो दिल्ली और नोएडा में उनके 'शीशमहलों' को खतरा हो सकता है। केरल के हजारों हिंदुओं ने न सिर्फ मंदिर की परंपरा की रक्षा की, बल्कि सरकारी और मीडिया तंत्र के हमलों का भी मुकाबला किया। पर दो अंग्रेजी चैनलों ने जिस तरह से हिंदुओं की भावनाओं को अपमानित करने का काम किया, उसे हमेशा याद रखा जाएगा। ऐसे समय में केरल का 'जनम टीवी' चैनल इकलौता था जो सच को सामने लाता रहा। इसी चैनल ने शबरीमला के भक्तों पर पुलिस के अत्याचार के वीडियो दिखाए, जबकि लगभग सभी चैनल वामपंथी सरकार के अपराधों में साझीदार बने रहे। केरल के हजारों युवाओं ने सोशल मीडिया के जरिए बाकी देश को जागरूक किया और मंदिर के बारे में अपप्रचार को ध्वस्त कर दिया।
 
शबरीमला मामले में मीडिया ने बृंदा करात और कविता कृष्णन जैसी हिंदू विरोधी वामपंथी नेताओं को बोलने का खूब मौका दिया। टाइम्स नाऊ इनमें सबसे आगे था। कुछ समय पहले केरल में ही माकपा की एक महिला कार्यकर्ता ने पार्टी के विधायक पी.के. शशि पर बलात्कार की कोशिश का आरोप लगाया था। बृंदा करात और कविता कृष्णन जैसी नारीवादियों ने उस मामले में एक शब्द तक नहीं कहा। बृंदा करात ने आरोपी विधायक को बचाने में मदद भी की थी। लेकिन उनसे साक्षात्कार में चैनल की पत्रकार ने एक बार भी इस बारे में सवाल पूछने की जहमत नहीं उठाई। समझना मुश्किल नहीं कि यह एक प्रायोजित साक्षात्कार था, जिसका उद्देश्य बलात्कारी का बचाव करने वाली इस नेता का पुनर्वास था।
केरल में ही जब बलात्कार का आरोपी बिशप जमानत पाकर मुस्कराता हुआ जेल से निकला तो मीडिया ने आंखें बंद कर लीं। सालों साल तक हिंदू संतों के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाने वाले चैनलों ने बिशप की बेहयाई पर चुप्पी ओढ़ ली। पंजाब लौटने पर बिशप का हीरो की तरह स्वागत हुआ। मीडिया ने इसकी आलोचना की, लेकिन ध्यान रखा कि ऐसा कुछ न कहा जाए जिससे एक बलात्कार आरोपी के लिए ईसाइयों की आस्था को ठेस पहुंचती हो। उस पोप पर भी सवाल नहीं उठे, जिसने ऐसे जाने कितने यौन अपराधियों को शह दे रखी है। इस केस का एक गवाह पंजाब में संदिग्ध परिस्थितियों में मरा पाया गया, लेकिन मीडिया ने उसे भी अधिक तूल नहीं दिया। सीबीआई की अफसरशाही में मचे घमासान में मीडिया भी अपनी सुविधा के हिसाब से पक्षकार बन गया। आपस में भिड़ रहे दो बड़े अफसरों को छुट्टी पर भेजा गया तो कई पत्रकारों ने सूत्रों के हवाले से तरह-तरह का झूठ फैलाने की पूरी कोशिश की। इन झूठों को गौर से देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर की उत्पत्ति कांग्रेस के आईटी सेल से हुई थी। 2019 से पहले सरकार को किसी भी तरह घेरने के इस कांग्रेसी उपक्रम में भ्रष्ट अफसरशाही से लेकर तमाम बड़े पत्रकार तक शामिल हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक फर्जी खबर छापी कि दिल्ली में प्याज 40 रुपये किलो हो गया है। शायद इसलिए ताकि त्योहार के मौसम में जमाखोरी हो और दाम वाकई बढ़ जाएं। दिल्ली में सीवर की सफाई कर रहे दिल्ली जल बोर्ड के एक मजदूर की मौत की खबर मीडिया ने दबा दी, क्योंकि इससे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर सवाल उठते। समझना मुश्किल नहीं है कि दिल्ली सरकार के विज्ञापनों के दबाव में मीडिया से दिल्ली सरकार के लिए नकारात्मक खबरें गायब हैं और जनता की मुश्किलों के बावजूद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का स्तुतिगान जारी है।