हिंदू दर्शन अध्यात्म का ही दूसरा नाम है, यह एक वैज्ञानिक दर्शन
स्रोत:    दिनांक 04-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                          - चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
हिन्दू दर्शन और अध्यात्म पर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का विशद् अध्ययन था। उनका कहना था कि कर्म ऐसा हो, जो स्वयं को तो उन्नति के मार्ग पर ले ही जाए, पर उससे समाज का भी भला हो। यहां हम पाञ्चजन्य के 2 नवम्बर 1953 के अंंक में प्रकाशित श्री राजगोपालाचारी का ऐसा ही सारगर्भित आलेख पुन: प्रकाशित कर रहे हैं
हिंदू दर्शन अध्यात्म का ही दूसरा नाम है। यह एक वैज्ञानिक दर्शन है। उसके आधार पर जो धर्म खड़ा हुआ, वह सर्वश्रेष्ठ धर्म सिद्ध हुआ। आज भी उस दर्शन के सिद्धांत विश्व को नयी अर्थव्यवस्था देने की क्षमता रखते हैं। कम्युनिज्म का प्रयोग जिस संकट में फंस गया है, उससे उबारने की शक्ति हिंदू-दर्शन में ही है।
यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि वेदांत-दर्शन वर्तमान परिस्थितियों के लिए बहुत उपयुक्त है। उपनिषदों के अध्ययन से पता चलता है कि विश्व परमसत्ता की क्रमश: विकासमान अभिव्यक्ति है। हिंदू दर्शन ने प्राणीशास्त्र तथा भौतिक विज्ञान के मूल सिद्धांतों का पहले ही ज्ञान प्राप्त कर लिया था। यह आरंभ से अंत तक वैज्ञानिक ढंग पर चलता है, अन्य प्राचीन मतों की भांति उसमें संकुचित रूढ़िवादिता और दुविधा नहीं है।
हिंदू ऋषियों ने अत्यंत प्राचीनकाल में जान लिया था कि लाभ की प्रवृत्ति व अनियंत्रित प्रतियोगिता मानव विकास के लिए हितकर नहीं है। हिंदू शास्त्रों ने स्पष्ट और बलशाली शब्दों में समाज के लिए कर्म सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, जिसके अनुसार श्रम प्रमुख है, लाभ नहीं। गीता में इसके स्वाभाविक परिणाम, श्रम की प्रतिष्ठा को स्पष्ट किया गया है। उसके अनुसार प्रत्येक कर्म की मूलभूत प्रेरणा उसे उपासना के दैवीय स्तर तक उठा ले जाने की होनी चाहिए। बहुकथित कर्मयोग का, जिसको सही रूप में नहीं समझा गया है, ठीक अर्थ यही है। लाभ के लिए नहीं, अपितु ईश्वर की आराधना के लिए कर्म का साधन है। यदि व्यक्ति अपने कर्तव्यों को भलीभांति निभाता है, तो वह ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है। अन्य व्यक्तियों के कर्तव्यों का भलीभांति पालन करने की अपेक्षा अपने कर्तव्यों का अधूरा पालन करना श्रेयस्कर है। संकट पड़ने पर भी उसे अपने कर्तव्यों का त्याग नहीं करना चाहिए। प्रत्येक कर्म के साथ दोष उसी तरह रहता है, जिस तरह आग के साथ धुआं। जो निस्वार्थ भाव से कर्म करता है, वही सच्चा न्यासी है। आज विश्व व्यक्तिक्तगत लाभ के जिस संकट से परेशान होकर नयी अर्थनीति की कल्पना और कामना कर रहा है, उसकी आध्यात्मिक आधारशिला गीता द्वारा प्रस्तुत की गई है। जिन श्लोकों से मैंने उपर्युक्त व्याख्या की है, वे अज्ञ लोगों के हाथ में पड़कर ऐसे बन गया है मानो वे व्यक्तिगत स्वार्थों का ही समर्थन करते हों। विचारदोष और पूर्वग्रह अमृत को भी विष बना देने की शक्ति रखते हैं।
अनियमित अर्थनीति और धर्म
वर्तमान परिस्थितियों में, जब जीवन के स्तर काफी ऊंचे हो गये हैं तथा बढ़ती हुई जनसंख्या ने अनेक समस्याएं खड़ी कर दी हैं, प्रत्येक व्यक्ति के कार्यों पर समाजहित का सर्वोपरि दावा होना चाहिए और लोगों को अपना नियमन आप करते हुए एक नियमित अर्थव्यवस्था के मातहत रहना चाहिए। इस नियमन का विरोध होता है, क्योंकि लोग वृत्ति से स्वतंत्र रहना चाहते हैं। अत: नियमन इस प्रकार किया जाय जिससे व्यक्तिगत स्वाधीनता का आनंद नष्ट न हो। नियमन चूंकि बाहर से थोपा जाता है, इसलिए उसका विरोध होता है। आध्यात्मिक अधिष्ठान पर यदि उपयुक्त ढंग से उसकी रचना की जाएगी तो व्यक्ति को दुख नहीं होगा। समाजहितकारी कार्यों के लिए आवश्यक नियंत्रण मनुष्य के भीतर उसकी आंतरिक निष्ठा तथा विश्वास से प्रवाहित होने चाहिए। सामूहिक कार्य व्यक्तिगत कार्यों से ही मिलकर बनते हैं, अत: यदि उनके लिए व्यक्तियों में उत्साह न हुआ तो वे सफल नहीं होंगे। उत्साह व्यक्ति में ही उत्पन्न हो सकता है, समूह में तो ऐसे भावों की क्षमता ही नहीं होती। मेरा दावा है कि न्यायपूर्ण और प्रभावी नियमन के लिए धर्म अनिवार्य शक्ति है। आध्यात्मिक निष्ठा और शक्ति ही मनुष्य को समाज-सेवा की ओर प्रेरित कर सकती है। हिंदू दर्शन का सारत्व भी यही है। अब कोई यह विश्वास नहीं करता कि 19वीं शताब्दी में यूरोप को समूह बनाने वाली जीवन-पद्धति आज भी लागू की जा सकती है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी आवश्यकता के अनुसार व्यक्तिगत उद्योग के बजाय नियमित सहयोगी अर्थनीति बरतने की जरूरत है। कम्युनिज्म द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के द्वारा सफलता का दावा भले ही करे, इस संबंध में लोग भूल जाते हैं कि दुर्भाग्य, क्रांति और संकट सब मिलकर कुछ समय के लिए मनुष्य मन की स्थिति प्राय: धार्मिक बना देते हैं। उसी के कारण क्रातियां सफल होती हैं। यह धर्म का अस्थायी स्थानापन्न जरूर है, लेकिन सर्वकाल के लिए संभव नहीं। कुछ लोगों की गरीबी पर अपनी संपत्ति खड़ी करना अपराध है। धन इस प्रकार उपार्जित करना चाहिए कि उससे कहीं भी दुख उत्पन्न न हो। असमानता असहनीय है। प्रत्यक्ष या परोक्ष आर्थिक प्रतियोगिता आज जंगल के कानून का ही दूसरा संस्करण कही जाएगी।
क्रांतिकारियों की महान भूल
दुर्भाग्य से जिन लोगों ने आर्थिक ढांचे को बदलने वाली क्रातियों का नेतृत्व किया, वे एक तत्कालीन सुविधा के लोभ में फंस गये। उन्होंने देखा कि क्रांति के लिए असंतोष उत्पन्न करना आवश्यक है और धर्म असंतोष का सबसे बड़ा कारण है। अत: उन्होंने यही कह दिया कि धर्म पुरानी अर्थव्यवस्था का ही एकमात्र अंग है और उसे भी खत्म कर देना चाहिए। उन्होंने उसी वस्तु को खत्म करने की चेष्टा की, भले ही वह असफल रही हो, जो मनुष्य को निस्वार्थी बनाने के लिए आवश्यक है। अब निस्वार्थता की नयी अर्थ नीति का आधार क्या होता। यह आत्महत्या के समान और आर्थिक क्रांति के लिए भार बन गया। दक्ष काल के लिए क्रांतिकारी भावना की आध्यात्मिकता के कारण भले ही उसे छिपा लिया गया हो, लेकिन शांति स्थापित होते ही उसकी आवश्यकता हुई तथा समझौते करके व्यक्तिगत सुविधाओं को गुंजाइश दी जाने लगी। पुरानी अर्थनीति के आधार, लाभवृत्ति को फिर से परोक्ष रूपों में प्रचलित किया गया। स्वार्थ को शक्ति के द्वारा पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता और न निस्वार्थता को राज्य के नियंत्रण में बढ़ाया ही जा सकता है। नियंता शक्ति सदा सबल नहीं रह सकती, वह दुर्बल होगी ही और उसके साथ-साथ सार्थ भी बढ़ेगा, अत: समझौते आवश्यक हो जायेंगे।
(लेखक भारत के आखिरी गवर्नर जनरल, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्र पार्टी के नेता रहे हैं)