राफेल पर बोले गए झूठ का पर्दाफाश, अब क्या करेंगे राहुल
स्रोत:    दिनांक 13-नवंबर-2018
राफेल लड़ाकू विमान सौदे में आरोपों की झड़ी लगाने वाले राहुल गांधी का झूठ एक बार फिर पकड़ा गया। अब राफेल कंपनी दसां और फ्रांस सरकार को झूठा साबित करने में जुटी कांग्रेस
 
राफेल लड़ाकू विमान भारत के आकाश में गरजे उसके पहले मीडिया और राजनैतिक हलकों में खूब गरज रहा है और राफेल को आरोपों से लैस करके राहुल गांधी ने मोदी की ओर उड़ाया था अब वो (बूमरेंग की तरह) लौटकर कांग्रेस अध्यक्ष और उनकी पार्टी पर ही आ गया है।
“हम किसी पार्टी के साथ काम नहीं करते| हम 60 सालों से भारत सरकार के साथ काम कर रहे हैं। हमने दशकों से भारत की वायुसेना को हथियारों से सुसज्जित किया है। हमने सारा काम पारदर्शिता से किया है। रिलायंस का चुनाव भी हमने स्वयं किया। हम पर कोई दबाव नहीं था। मैं कंपनी के प्रमुख के तौर पर बयान दे रहा हूँ मैं झूठ नहीं बोलता। ये सौदा भारत सरकार और हमारी सरकार के बीच हुआ है। हम केवल आपूर्तिकर्ता (सप्लायर) हैं|” ये बयान दिया है राफेल बनाने वाली कंपनी दसां के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने।
राफेल पर रोज बयान दे रहे राहुल गांधी ने उन्हें “झूठा” बतलाया था| एरिक ट्रैपियर ने कहा कि उन्हें कांग्रेस पार्टी के साथ पुराना अनुभव है और कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा की गई टिप्पणियों ने उन्हें दुखी किया है। ट्रैपियर के शब्दों में , "कांग्रेस पार्टी के साथ हमें लंबा अनुभव है। भारत के साथ हमारा पहला सौदा 1953 में नेहरू और अन्य प्रधानमंत्रियों के साथ था। हम बरसों से भारत के साथ काम कर रहे हैं”
जब उनसे पूछा गया कि लड़ाकू विमानों के निर्माण का कोई अनुभव न होने के बाद भी रिलायंस को ऑफसेट पार्टनर के रूप में क्यों चुना गया तो ट्रैपियर ने कहा कि जो पैसा दसां के द्वारा निवेश किया जा रहा है वो रिलायंस कंपनी को नहीं जा रहा है बल्कि दसां और रिलायंस के जॉइंट वेंचर (संयुक्त खाते ) में जा रहा है।
उन्होंने कहा, “हम रिलायंस में पैसा नहीं लगा रहे हैं। जहां तक सौदे के औद्योगिक हिस्से का संबंध है दसॉ के इंजीनियर और श्रमिक इसका नेतृत्व कर रहे हैं। रिलायंस कंपनी इस जॉइंट वेंचर में पैसा लगा रही है। क्योंकि वे अपने देश को विकसित करना चाहते हैं। इस सौदे में हमारे साथ काम करके रिलायंस कंपनी को भी पता चल जाएगा कि (राफेल) विमान कैसे बनाना है।" यानी कल भारत में ही इसका उत्पादन अपने दम पर हो सकेगा| उन्होंने राहुल गांधी के इस आरोप को भी पूरी तरह नकार दिया है कि उनकी कंपनी द्वारा दिए गए धन से अम्बानी ने कोई जमीन खरीदी है।
एक और बात सामने आई है कि राफेल मामले में रिलायंस की साझेदारी मात्र 10 प्रतिशत है, शेष साझेदारी के लिए दसां 30 अन्य भारतीय कंपनियों से बात कर रही है।
राफेल मामले में हुए नए खुलासों ने कांग्रेस के आरोपों को औंधा कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र से राफेल सौदे की प्रक्रिया की जानकारी मांगी थी। केंद्र ने न्यायालय और याचिकाकर्ताओं को राफेल सौदे के तथ्य सौंपे, जिनसे खुलासा हुआ कि खरीददारी के नियम तो यूपीए सरकार ने ही बनाए थे और मोदी सरकार ने उसी प्रक्रिया के अंतर्गत नया सौदा किया, और पहले से भी कम कीमत पर (यूपीए से) बेहतर विमान हासिल किए।
राहुल गांधी बार-बार आरोप लगा रहे थे कि “मोदी जी अचानक फ़्रांस पहुंचे और वायुसेना और रक्षामंत्री से पूछे बिना सौदा कर डाला। दस्तावेज उनके इस आरोप का समर्थन नहीं कर रहे हैं। वास्तव में सौदे के पहले एक –दो नहीं, पूरी 74 बैठकें हुईं, तब डील पर मुहर लगी| ये बैठकें मई 2015 से अप्रैल 2016 के बीच हुईं। डील के पहले कैबिनेट की रक्षा मामलों की समिति से अनुमति ली गई| इसके बाद 4 अगस्त 2016 को भारतीय वार्ताकारों ने 36 राफेल विमानों को खरीदने की योजना पेश की जिसका आकलन वित्त और क़ानून मंत्रालय ने किया। फिर 24 अगस्त को रक्षा खरीद परिषद और रक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी ने राफेल खरीदने की मंजूरी दी। तब कहीं जाकर प्रधानमंत्री ने सहमति दी और 23 सितंबर 2016 को राफेल समझौते पर हस्ताक्षर हुए|
इन दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि राफेल बनाने वाली कंपनी दसां और हिन्दुस्तान एयरोनौटिक्स (हाल) के बीच आखिर समझौता क्यों नहीं हो सका| वास्तव में पुरानी (यूपीए की) डील के अनुसार पहले दसां कंपनी को पूरी तरह तैयार 18 रफाल भारत को देने थे फिर हाल को शेष 108 विमान तैयार करने थे, लेकिन इसके लिए हाल तय समय से ढाई गुना ज्यादा समय मांग रहा था, जिससे विमान की कीमत(लागत) बढ़ रही थी और दसां इसके लिए तैयार नहीं थी। उसे घाटा हो रहा था। अंततः रफाल और हाल के बीच सौदा नहीं हो सका
कांग्रेस एक और आरोप लगाती रही है कि दुनिया में और भी कई विमान थे पर मोदी जी ने राफेल का ही चुनाव किया क्योंकि उन्हें रिलायंस को फायदा पहुंचाना था। इस पर दस्तावेज कांग्रेस के आरोपों की धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के रिकार्ड के अनुसार रफाल खरीदने का फैसला यूपीए सरकार के दौरान ही 2012 में हो गया था।
हाल के खराब प्रदर्शन को देखते हुए भी दिक्कतें आ रहीं थीं। इस आशय की ख़बरें 2013 में ही अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित हो चुकीं थीं देखें (देखें मेल ऑनलाइन, 9 अप्रैल 2013, “हाल्स पुअर ट्रैक रिकॉर्ड कास्ट्स शैडो ऑन फ्रेंच फाइटर जेट डील”)
इस बारे में वायुसेना प्रमुख ने कुछ ही दिन पूर्व पत्रकार वार्ता में कहा था कि कि “ जहाँ तक विमानों के निर्माण की बात है, हाल थोडा पीछे है| सुखोई विमानों पर हम (हाल) तीन साल पीछे हैं| जगुआर विमान निर्माण अपनी तय समय सीमा से 6 साल पीछे है| हलके लड़ाकू विमान निर्माण में भी हाल 5 साल पीछे है| मिराज 2000 विमान को अपग्रेड करने में हाल दो साल पीछे चल रहा है| एक और विमान में हम 5 साल पीछे चल रहे हैं|” हाल द्वारा बनाया गया तेजस विमान भी दशकों के इंतज़ार के बाद आया | इस “देशी विमान” में 80 प्रतिशत पुर्जे विदेशी हैं| तेजस निर्माण की वर्तमान दर भी 8 विमान प्रतिवर्ष है, जो कि बहुत कम है| न्यूनतम आवश्यकता 18 विमान प्रतिवर्ष की है|
कीमत पर हो रहे बवाल पर दसां के प्रमुख ट्रैपियर ने बतलाया है कि मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार की तुलना में 9 प्रतिशत सस्ती कीमत पर राफेल विमान हासिल किए हैं, जबकि तकनीक पहले से बेहतर है| वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ के शब्दों में “हमें विमान के साथ बहुत अच्छी पैकेज डील मिली है| बहुत अच्छे सेंसर, इलेक्ट्रोनिक उपकरण इसमें लगे हैं, विमान जल्दी मिलेगा। रखरखाव की शर्त भी पहले से बेहतर है और हमें ज्यादा वारंटी मिली है| वर्तमान कीमत में इन विमानों का रखरखाव भी शामिल है जिसे दसां कंपनी वहन करेगी
आश्चर्य नहीं कि हाल के इस प्रदर्शन को देखते हुए डसाल्ट उसके साथ साझेदारी करने को तैयार नहीं थी।
राहुल गांधी बेझिझक बिना जिम्मेदारी के बोलने के लिए मशहूर हैं| राहुल गांधी ने लोकसभा में खड़े होकर बयान दिया था कि फ़्रांस के राष्ट्रपति ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से बतलाया है कि फ़्रांस की तरफ से राफेल सौदे को गुप्त रखने की कोई शर्त नहीं जोड़ी गई है। इसके तुरंत बाद फ़्रांस सरकार की तरफ से बयान आया कि राहुल गांधी से फ़्रांस के राष्ट्रपति ने ऐसा कुछ नहीं कहा और फ़्रांस ने राफेल सौदे को गुप्त रखने की शर्त शुरू से रखी है, तब भी जब यूपीए की सरकार थी। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष इससे शर्मिंदा नहीं हुए उलटे उन्होंने कहा कि वो प्रधानमंत्री मोदी को गंभीरता से नहीं लेते।
फिर राहुल गांधी ने कहा कि रक्षा मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव, राजीव वर्मा ने राफेल सौदे पर आपत्ति उठाई थी, और सौदे के विरोध में वो छुट्टी पर चले गए। राजीव वर्मा ने मीडिया में आकर इस बात का खंडन किया। उन्होंने बताया कि वो काफी पहले से तय, एक छोटी अवधि का कोर्स करने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए थे। राजीव वर्मा ने ही राफेल सौदे को तय करने वाला कैबिनेट नोट लिखा था। कांग्रेस ने कहा कि वर्मा ने सितंबर में डील के खिलाफ नोट लिखा और तुरंत छुट्टी पर चले गए। कार्यालय के दस्तावेज के अनुसार वर्मा ने जुलाई में आवेदन लगा दिया था कि उन्हें सितंबर में इस अध्ययन अवकाश पर जाना है। ज़ाहिर है राजीव ने कांग्रेस के सभी आरोपों को पूरी तरह नकार दिया।
कीमत पर हो रहे बवाल पर दसां के प्रमुख ट्रैपियर ने बतलाया है कि मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार की तुलना में 9 प्रतिशत सस्ती कीमत पर राफेल विमान हासिल किए हैं, जबकि तकनीक पहले से बेहतर है| वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ के शब्दों में “हमें विमान के साथ बहुत अच्छी पैकेज डील मिली है| बहुत अच्छे सेंसर, इलेक्ट्रोनिक उपकरण इसमें लगे हैं, विमान जल्दी मिलेगा। रखरखाव की शर्त भी पहले से बेहतर है और हमें ज्यादा वारंटी मिली है| वर्तमान कीमत में इन विमानों का रखरखाव भी शामिल है जिसे दसां कंपनी वहन करेगी। इस सौदे से भारत की शक्ति बहुत बढ़ जाएगी| चीन और पाकिस्तान से एक साथ युद्ध होने की स्थिति में भी यह भारत को बढ़त दिलाएगी|”
राफेल के नए सौदे में विमान पर लगने वाली मिसाइल, परमाणु बम दागने की क्षमता और आधुनिक सुरक्षा प्रणालियां शामिल हैं| इन राफेल विमानों को भारतीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार ढाला अथवा नयी तकनीक से लैस किया जा रहा है, क्योंकि भारत को समुद्र और रेगिस्तान, मैदानी इलाकों से लेकर बर्फीले युद्ध क्षेत्र सियाचिन तक कार्यवाही करने को तैयार रहना है। चीन से सामना होने पर हमारे जहाज़ों को दुनिया की सबसे विशाल पर्वतमाला हिमालय के ऊपर से उड़ना होगा।
सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय के सामने इन सारे खुलासों के बाद, क्या राहुल गांधी और उनकी पार्टी रफाल पर शोर मचाना बंद कर देंगे ? उत्तर है नहीं। उन्हें तो धुन सवार है कि किसी आरोप को इतना दुहराओ कि वो सबको सच लगने लगे। ये वही राहुल हैं जिन्होंने समय समय पर अनेक आरोप उछाले हैं बिना तथ्यों की परवाह किए। यही वो राफेल मामले पर कर रहे हैं। उनके इतिहास को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि वो इसी तरह बोलते रहेंगे, सेना के मनोबल को दांव पर लगाकर, भारत और उसके सहयोगी देशों की परवाह किये बिना| जिन राहुल को देश जानता है वो राहुल इसी तरह भारत के प्रमुख रक्षा सहयोगी फ़्रांस को भी असहज करते रहेंगे| चुनाव सर पर हैं| आखिर मई 2019 को समय बचा ही कितना है ......