जयंती विशेष: बिरसा मुंडा के आह्वान पर वनवासी समाज ने लड़ी थी स्वाभिमान की लड़ाई
स्रोत:    दिनांक 15-नवंबर-2018
वनवासी समुदाय में पैदा हुए बिरसा मुंडा ने वनवासी समुदाय को एकत्रित किया और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के वनवासी बिरसा मुंडा को अब 'बिरसा भगवान' कहकर याद करते हैं। 19वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे
 
 
झारखंड की स्थापना बिरसा मुंडा की जयंती के अवसर पर 2000 में की गई। उन्होंने अपनी छोटी सी आयु में ही अपने राष्ट्र के लोगों के लिए अंग्रेजो से लोहा लेने का काम किया था। उनका बलिदान और अद्वितीय शौर्य अविस्मरणीय है। सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को झारखंड प्रदेश के उलीहातू गांव में हुआ था।
 
1 अक्टूबर 1894 को युवा नेता के रूप में सभी स्थानीय लोगों को एकत्र कर उन्होंने अंग्रेजों से लगान माफी के लिए आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उनके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी जो उन्होंने किया भी। बिरसा मुंडा ने अपने जीवन काल में ही महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग "धरती बाबा" के नाम से पुकाराते और पूजते थे।  उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी। 1897 से 1900 के बीच बिरसा और अंग्रेजों के बीच युद्ध होते रहे। बिरसा ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था।
1898 में तांगा नदी के किनारे बिरसा मुंडा की भिड़ंत अंग्रेजों की सेना से हुई, जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गई लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से वनवासी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं। बिरसा भी गिरफ्तार हुए। बिरसा ने अपनी अंतिम सांसें 9 जून 1900 को रांची कारागार में लीं। बिरसा मुंडा ने न केवल ब्रिटिश शासन के विरूद्ध आंदोलन किया बल्कि लोगों की जीवन शैली में भी बदलाव लाने का प्रयास किया।