'ऐसा कतई नहीं है कि हमें मुसलमान नहीं चाहिए, हिंदुत्व तो विश्व कुटुम्बकम की बात करता है'
स्रोत:    दिनांक 18-नवंबर-2018
संघ जिस बंधुभाव को लेकर काम करता है, उस बंधुभाव का एक ही आधार है, विविधता में एकता। परम्परा से चलते आए इस चिंतन को ही दुनिया हिंदुत्व कहती है। इस लिए हम कहते हैं कि हमारा हिन्दू राष्ट्र है। इसका मतलब इसमें मुसलमान नहीं चाहिए , ऐसा बिलकुल नहीं होता है। जिस दिन यह कहा जाएगा कि मुसलमान नहीं चाहिए उस दिन वह हिंदुत्व नहीं रहेगा। हिंदुत्व तो विश्व कुटुम्बकम की बात करता है

 
 हाल ही दिल्ली में 'भविष्य का भारत' विषय पर हुई व्याख्यानमाला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत ने जब कहा कि “संघ जिस बंधुभाव को लेकर काम करता है, उस बंधुभाव का एक ही आधार है, विविधता में एकता। परम्परा से चलते आए इस चिंतन को ही दुनिया हिंदुत्व कहती है। इस लिए हम कहते हैं कि हमारा हिन्दू राष्ट्र है। इसका मतलब इसमें मुसलमान नहीं चाहिए , ऐसा बिलकुल नहीं होता है। जिस दिन यह कहा जाएगा कि मुसलमान नहीं चाहिए उस दिन वह हिंदुत्व नहीं रहेगा। हिंदुत्व तो विश्व कुटुम्बकम की बात करता है”। -
तब अनेक भृकुटियां तनी गईं। संघ के कुछ समर्थकों के मन में भी प्रश्न निर्माण हुआ।
कई बार समय और परिस्थिति विशेष में एक भूमिका लेने के कारण मूल भाव का विस्मरण हो जाता है। स्वभाव पर भी इसका प्रभाव दिखता है।
हिंदुत्व भारत की आत्मा, भारत की पहचान, भारत की विशेषता है। उसका मूलभाव विस्मृत किया ही नहीं जा सकता। हिंदुत्व भारत की अध्यात्म आधारित एकात्म और समग्र जीवन दृष्टि है, जो सर्व समावेशक (all inclusive), वैश्विक और केवल मानव जाति ही नहीं, अपितु सृष्टि के भी कल्याण, समन्वय और शांति की कामना करता है।
इसलिए हिंदू ने अपने आप को हिंदू नाम भी नहीं दिया। हिन्दुओं की सभी प्रार्थनाएं हमेशा समग्र मानव, चराचर सृष्टि के कल्याण की प्रार्थना ही दिखती है।
कहते हैं कि भारत के बाहर के लोगों ने भारत से व्यापार के लिए आनेवालों को स्वयं से अलग पहचान दिखाने के लिए सिंधु नदी के उस पार से आने वाले (इसलिए) हिंदू, नाम दिया। बाहर से आने वाले आक्रामकों ने भी इसका प्रयोग किया। इसलिए वह हमारा सबका, इस भूखंड पर रहने वालों का नाम हुआ।
हिन्दू, इस नाम से पहचाने गए समाज का वैचारिक आधार तथा चिंतन समानता का पोषक, सम्पूर्ण सृष्टि के लिए सकारात्मक और सर्वसमावेशी रहा।
इसी कारण इस राष्ट्र का वैचारिक उद्घोष
(एकम सत विप्र: बहुधा वदंति, इशावास्यमिदम सर्वम, विविधता में एकता, और जीवन का अध्यात्म आधारित चिंतन आदि) शाब्दिक रूप से अलग होने पर भी इसकी गूंज एक ही रही।
अंग्रेज़ी शासन के समय स्वतंत्रता आंदोलन में भी इसलिए हिंदू एवं मुसलमान समान रूप से सहभागी हुए थे। 1857 का स्वतंत्रता का युद्ध हो या 1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध हुआ सफल जनआंदोलन हो, हिंदू मुसलमान सभी एकजुट हो कर सहभागी हुए थे। बाद में हिंदू मुसलमानों के बीच विरोध और द्वेष के बीज बो कर राजनीति शुरू हुई जिस का परिणाम भारत विभाजन में हुआ। विभाजन का आधार ही हिंदू मुस्लिम विभाजन ऐसा था। उस समय समाजिक बहस, चर्चा, वाद प्रतिवाद में मुसलमानों का पक्ष तो हिंदू विरोध और भारत विरोध का था ही। कारण मुस्लिम विचार सेमेटिक मूलसे निकला है। परंतु उस बहस में, प्रतिक्रिया में हिंदू की बात में भी विभाजन का विरोध करते करते मुस्लिम विरोध भी आना स्वाभाविक था, जो हिंदू विचार से मेल नहीं खाता था। उस समय के अनेक हिंदू नेताओं के भाषण में, प्रतिपादन में यह मुस्लिम विरोध झलकता था कारण उस समय की परिस्थिति ऐसी थी।
परंतु मूलतः हिंदू विचार exclusivist यानी किसी को छोड़ कर केवल अपना विचर करने वाला नहीं है यह ध्यान में रखना चाहिए। इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने अपने सुप्रसिद्ध शिकागो व्याख्यान में गर्व के साथ यह कहा था कि, “मुझे आपसे यह निवेदन करते गर्व होता है कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूँ जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत में अंग्रेज़ी शब्द exclusion का कोई पर्यायवाची शब्द नहीं है।”
सेमेटिक मूल (वामपंथ सहित) के विचारों की यह विशेषता है कि उन्होंने मानव समाज को दो हिस्सों में बाँटा है। एक जो हमारे साथ है वे तो अच्छे, ईमानवाले, believers या वामपंथी है। जो हमारे साथ नहीं है वे बुरे, शैतान के पक्ष के, काफ़िर या दक्षिणपंथी ही है और इसलिए निषिद्ध, भर्त्सनीय है या ज़िंदा रहने के भी लायक नहीं है। ऐसे exclusivist विचारों के लोगों ने हिंदू विचार को भी ऐसे द्वंद्वात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया। और उनका विरोध सहन करते करते, सामना करते करते हमारी भी, माने हिंदू की भी सोच वैसी ही बन जाना अस्वाभाविक नहीं है।
जब भारत स्वतंत्र हुआ तब भारत का हिंदू – मुसलमान इस आधार पर विभाजन हुआ। पहले सब एक ही थे। दोनों देशों का संविधान एक साथ बना। जो हिस्सा मुसलमान के आधार पर पाकिस्तान बना उनके संविधान में सेमेटिक विचार की परम्परा के अनुसार ग़ैर मुसलमानों को मुसलमानों के समान अधिकार नहीं नहीं दिए गए। परंतु भारत के संविधान में हिंदू परम्परा के अनुसार सभी रिलीजंस को समान अधिकार दिए गए। यह भारत के संविधान का हिंदुत्व है। सेमेटिक विचारों के प्रभाव के कारण अल्पसंख्य (minority) यह संकल्पना संविधान में ली गयी। वास्तव में भारत की परम्परा में रिलीजन के नाम पर कभी भेदभाव नहीं रखा गया। सभी को अपने अपने रिलीजन का पालन करने का स्वतंत्रय व अधिकार हिंदू समाज ने दे कर रखा है। ऐसा भारत का चिंतन और इतिहास भी रहा है।
दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में भी स्वार्थ राजनीति के लिए हिंदुत्व का विरोध और मुसलमान- ईसाइयों का तुष्टिकरण चलता रहा। कहीं कहीं मुस्लिम आक्रमण का प्रतिरोध करने के लिए हिंदू समाज को भी मुसलमान गुंडों के ख़िलाफ़ लड़ना पड़ा। इस कारण मुस्लिम विरोध का भाव भी समाज मन में जमा। परंतु भारत के सभी मुसलमान और ईसाई भी मूलतः तो हिंदू ही थे। किसी कारण से, हिंदू समाज के दुर्बल रहने एक कारण उन्हें अपनी उपासना पद्धति छोड़नी पड़ी या बदलनी पड़ी परंतु वे इस भारत के उतने ही अभिन्न अंग है जैसे हिंदू हैं।
मुसलमान ये बात भूल सकते है पर हिंदू को यह नहीं भूलना चाहिए। मुस्लिम द्वारा होने वाले हिंदू विरोध के कारण हिंदू समाज की कोई हानि ना हो इसकी पुख़्ता सावधानी और व्यवस्था रखने के बाद भी वे एक समय हिंदू समाज का अंग ही थे ये हमें नहीं भूलना चाहिए। उन्हें छोड़ कर भारत के भविष्य का विचार करना यह सेमेटिक exclusivist विचार का लक्षण है, जो भारत की परम्परा से मेल नहीं खाता है।
भारत का विचार हिंदुत्व आधारित होने के कारण वह incusive और सर्व समावेशी है यह भारत को नहीं भूलना चाहिए। इसलिए कहीं प्रतिक्रिया में मुसलमान विरोध दिखता होगा तो भी भारत के मुसलमानों में भारतीयता यानी हिंदुत्व का जागरण करते हुए उन्हें भारत का भविष्य गढ़ने में साथ लेना ही हिंदुत्व की पहचान है।
संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूजनीय श्री गुरुजी ने प्रसिद्ध पत्रकार डॉ. सैफ़ुद्दीनजिलानी को दिए साक्षात्कार में इसको स्पष्ट किया है।
डॉ. जिलानी: भारतीयकरण पर बहुत चर्चा हुई, भ्रम भी बहुत निर्माण हुए, क्या आप बता सकेंगे कि ये भ्रम कैसे दूर किये जा सकेंगे?
श्री गुरुजी: भारतीयकरण की घोषणा जनसंघ द्वारा की गई, किंतु इस मामले में संभ्रम क्यों होना चाहिये? भारतीयकरण का अर्थ सबको हिंदू बनाना तो है नहीं।
हम सभी को यह सत्य समझ लेना चाहिये कि हम इसी भूमि के पुत्र हैं. अतः इस विषय में अपनी निष्ठा अविचल रहना अनिवार्य है। हम सब एक ही मानवसमूह के अंग हैं, हम सबके पूर्वज एक ही हैं, इसलिये हम सबकी आकांक्षाएं भी एक समान हैं- इसे समझना ही सही अर्थों में भारतीयकरण है।
भारतीयकरण का यह अर्थ नहीं कि कोई अपनी पूजा-पद्धति त्याग दे। यह बात हमने कभी नहीं कही और कभी कहेंगे भी नहीं. हमारी तो यह मान्यता है कि उपासना की एक ही पद्धति संपूर्ण मानव जाति के लिये सुविधाजनक नहीं।
सरसंघचालक जी ने अपने व्याख्यान में कहा, “ राष्ट्र के नाते हम सब लोगों की पहचान हिंदू है। कुछ लोग हिंदू कहने में गौरव मानते हैं और कुछ के मन में उतना गौरव नहीं है, कोई बात नहीं। कुछ ‘मैटेरियल कंसिडरेशंस’ या ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’ के कारण सार्वजनिक रूप से कभी कहेंगे नहीं, लेकिन निजी रूप से कहते है भी है। और कुछ लोग हैं जो भूल गए है, ये सब लोग हमारे अपने है, भारत के हैं। जैसे परीक्षा में प्रश्नपत्र जब हमारे हाथ में आता है, तो हम सबसे पहले आसान सवालों को हाल करते हैं, बाद में कठिन सवालों को हाथ लगाते हैं। वैसे ही हम पहले उनका संगठन करते हैं, जो अपने आपको हिंदू मानते है। क्योंकि हमारा कोई शत्रु नहीं है, न दुनिया में, न देश में। हमसे शत्रुता करने वाले लोग होंगे, उनसे अपने को बचाते हुए भी हमारी आकांक्षा उनको समाप्त करने की नहीं है, उनको साथ लेने की है, जोड़ने की है। ये वास्तव में हिन्दुत्व है।”
स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कहा था, ‘ आप मुसलमान हो इसलिए मैं हिंदू हूँ। अन्यथा मैं तो विश्वमानव हूँ।”
भारत का अर्थात् हिंदुत्व का सर्वसमावेशी विचार तथा संस्कार कैसा inclusive है यह स्पष्ट करने वाली एक अंग्रेज़ी कविता याद आती है।
He drew a circle and kept me out.
A heretic, a rebel and somebody to flout.
But love and I had a wit to win.
We drew a circle and took him in.