कठुआ कांड: मासूम के परिजनों को नहीं मिला मदद के नाम पर इकट्ठा किया पूरा पैसा
स्रोत:    दिनांक 19-नवंबर-2018
                                                                                                                                                 - आशीष कुमार 'अंशु'
कठुआ पीड़िता के नाम पर इकट्ठा किए गए पैसे की जांच होनी चाहिए ताकि पैसा उस परिवार को मिले जिसकी मदद के नाम पर पैसा एकत्रित किया गया। पीड़ित परिवार के अनुसार उन्हें पैसों की कोई जानकारी नहीं है। उनके पास न बैंक की पासबुक है और न ही चेकबुक। वहीं कथित सेकुलर पत्रकार,अब इस बात को दबाने के लिए सक्रिय हो गए हैं
आज से दस महीने पहले कठुआ में एक आठ वर्षीय मासूम के साथ दरिंदगी हुई थी। पूरे देश में इस मामले के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे, लेकिन एक सच यह भी है कि कथित सेकुलर गिरोह ने इस मामले को मजहबी रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। गतिशील खेमा शीतकालीन मौन व्रत पर जा चुका है। हां, जब कठुआ पीड़िता के परिजनों की मदद के नाम इकट्ठा किए फंड के बारे में पूछा गया तो सेकुलर मीडिया इस मामले पर सफाई जरूर दे रहा है।
crowdnewsing.com ने कठुआ पीड़िता के परिवार को गोद लिया था। मदद के नाम पर 18 लाख रुपए इकट्ठे किए गए। इस वेबसाइट के मॉडरेटर बिलाल जैदी के अनुसार यह 18 लाख रूपए जम्मू में पीड़िता के दोनों अभिभावकों के नाम पर खुले ज्वाइंट अकाउंट में चले गए। जबकि बच्ची के माता—पिता को न यह पता है कि बच्ची के नाम पर कितना पैसा इकट्ठा किया गया। उनके पास न बैंक की चेकबुक है और न ही पासबुक।
इसी साल जनवरी में जब देश भर की मीडिया में कठुआ बलात्कार कांड चर्चा में था, कॉमरेड समाज सेवियों की लंबी कतार कठुआ में लगी थी और उस दौरान वादों का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। जैसे हर खबर की जगह एक नई खबर हर दिन ले लेती है। एक दिन कठुआ की खबर मीडिया से गायब हुई और सारे क्रांतिकारियों ने धीरे—धीरे इस मामले से मुंह मोड़ लिया।
यह खबर एक बार फिर नवम्बर के प्रथम सप्ताह में चर्चा में आई। इस बार की चर्चा ने देश भर के कई क्रांतिकारी—सामाजिक कार्यकर्ताओं के चेहरे पर पड़े मुखौटे को उतार दिया। मामला एक बार फिर पैसों से जुड़ा। प्रगतिशील खेमे की चाल और चरित्र एक बार फिर स्पष्ट हुए।
शहला रशीद ने 40 लाख का हिसाब अब तक नहीं दिया। यह 40 लाख रुपया उस परिवार के नाम पर इकट्ठा किया गया था जो बलात्कार पीड़िता बच्ची का परिवार था। मंदिर का नाम पूरे प्रकरण से जोड़कर मामले को साम्प्रदायिक बनाने वाले गिरोह का एक सदस्य तालिब हुसैन बलात्कार के मामले में जेल गया। उसकी पत्नी की एक रिश्तेदार ने उस पर बलात्कार का आरोप लगाया था। तालिब को प्रगतिशील गिरोह ने अपना मुखिया बनाया हुआ था। मीटू मामले में जेएनयू की एक छात्रा ने इशारों—इशारों में तालिब पर यह गंभीर आरोप लगाया कि जेएनयू आकर उसने उस लड़की को परिसर से बाहर बुलाया। बाहर आने के बाद बाटला हाउस ले जाकर उसने उस छात्रा के साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं — बलात्कार के बाद कथित तौर पर तालिब ने कहा— ''तुम बहुत नाजुक हो। मुझसे निकाह करोगी।''
तालिब पहले से ही शादीशुदा है। कठुआ मामले में अफवाह फैलाने वाले पूरे गिरोह का नेतृत्व कर रहा था। इस मामले की पैरवी के लिए आगे आई अधिवक्ता दीपिका सिंह राजावत ने देश भर में चर्चा बटोरी। अब जब यह बात सामने आई कि बच्ची के परिजनों ने उसे केस से हटा दिया है क्योंकि वह 100 से अधिक तारीखों में दो—तीन बार ही सुनवाई में पहुंची। इस विषय पर वह कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं हैं।
जब यह मामला सुर्खियों में था तो उस वक्त दीपिका का चेहरा इस पूरे मामले में परिवार की पीड़ा को सबसे अधिक समझने वाले प्रतिनिधि चेहरे के तौर पर दिखाया जा रहा था। तारीखों में न्यायालय जाने की बात तो दूर। पीड़िता के परिवार के अनुसार— राजावत ने उनका फोन तक उठाना बंद कर दिया था। जिसके परिणास्वरूप परिवार को राजावत को मामले से हटाने के लिए प्रार्थना पत्र देना पड़ा।
इसी बीच 19 नवम्बर को कई वेबसाइट शहला रशीद और दीपिका सिंह राजावत के पक्ष में सक्रिय हो गई। जिसमें शहला रशीद के हवाले से कहा जा रहा है कि पैसा आॅनलाइन ट्रांसफर हुआ। जिसका रिकॉर्ड उनके पास है। जबकि इस मामले में बताया जा रहा है कि परिवार को न पासबुक मिली और न चेकबुक। जम्मू के पत्रकार दिनेश मन्होत्रा बताते हैं कि परिवार वालों से कई बार चेक पर हस्ताक्षर कराए गए । एक बार पचास हजार रूपए के चेक पर उनसे हस्ताक्षर कराए गए और उनसे दस हजार रूपए अनंतनाग के फार्रुख ने लिए। परिवार के अनुसार, इसी तरह पीड़िता फंड से एक लाख रूपए के चेक पर तालिब हुसैन के मामले की पैरवी के लिए परिवार से से हस्ताक्षर कराए गए। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है किे मासूम बच्ची के परिजनों की मदद के नाम पर इकट्ठा किए गए पैसे से उस आदमी को मदद की गई जिस पर स्वयं बलात्कार का आरोप था।
कठुआ पीड़िता के नाम पर इकट्ठा किए गए पैसे की जांच होनी चाहिए ताकि पैसा उस परिवार को मिले जिसके मदद की नाम पर पैसा एकत्रित किया गया। पीड़ित परिवार के अनुसार— उन्हें पैसों की कोई जानकारी नहीं है। अब शहला रशीद और दीपिका सिंह राजावत को बताना चाहिए कि क्या पैसा इकट्ठा करने तक की ही उनकी जिम्मेदारी थी। दीपिका यह कहती नहीं थक रही कि उन्होंने कठुआ पीड़िता परिवार से एक पैसा नहीं लिया। जबकि यह बात बार—बार सामने आ रही है कि उनके एनजीओ को भी पीड़िता के नाम पर इकट्ठा हुए पैसे का एक हिस्सा मिला है। अब पैसों के हेर—फेर मामले पर एक निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। वरना अचानक झूठ को सच प्रचारित करने के उद्देश्य से उग आए आधा दर्जन से अधिक वामपंथी मीडिया कीे वेबसाइट पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए पूरी तैयारी से सच्ची—झूठी खबरों का आॅन लाइन अंबार लगाने में लग गए हैं।