संवैधानिक साख पर ‘एक्टिविस्ट’ घात
स्रोत:    दिनांक 19-नवंबर-2018
न्यायपालिका, विधिपालिका, कार्यपालिका और खबरपालिका, वे चार स्तंभ हैं जिन पर लोकतंत्र का पूरा भवन खड़ा है। क्या हो यदि इन खंभों में जरा भी कमजोरी, दरार या डगमगाहट आ जाए!
 
भारतीय लोकतंत्र के लिए यह सवाल इसलिए ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि विश्व का सबसे विशाल लोकतंत्र चौतरफा खतरों के लिए पर्याप्त रूप से खुला है। दागियों के राजनीति में प्रवेश से लेकर क्षेत्रवाद-परिवारवाद का दंश झेलती रही विधिपालिका! नौकरशाही की सुस्त-भ्रष्ट कार्यकथाएं! सेना द्वारा सरकार के तख्तापलट जैसी झूठी-मनगढ़ंत खबरें परोसता और ‘राडिया टेप’ में रंगेहाथ पकड़े जाने पर भी जरा न शर्माता मीडिया! और न्यायपालिका! 60 बरस कुनबे की काठी से व्यवस्था को हांकते हुए कितनी बार नियम-निर्देशों की अनदेखी हुई और कितनी बार न्यायपालिका की बांह मरोड़ी गई, इसका कभी, किसी ने हिसाब भी नहीं लिया। इस सब के बाद भारतीय लोकतंत्र न केवल टिका रहा बल्कि और मजबूत होता रहा तो इसका श्रेय केवल और केवल इसकी जनता को है।
भारत की वह जनता (जिसकी संस्कृति ‘विविध’ प्राचीन सबक समेटे है) बहुत समझदार है। इसलिए वह सही के स्वीकार, गलत के तिरस्कार और ठीक होने लायक चीजों के परिष्कार का निर्णय ले ही लेती है। परंतु यह भी सच है कि जनता की इस समझ और सही के प्रति विश्वास को छलने-ललकारने वाले कुछ लोग इसी लोकतंत्र की छतरी तले बैठे हैं। लोकतंत्र की छांह में रहते हुए जनभावनाओं को ठगने, संवैधानिक संस्थाओं की साख में सुराख करने और इस तरह के तमाम षड्यंत्र रचते हुए भी अपनी छाती पर आंदोलनकारी (एक्टिविस्ट) का प्रगतिशील बिल्ला लगाना इन्हें खूब
आता है। तीस्ता सीतलवाड़ याद हैं! वह कथित आंदोलनकारी, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनका इशारा पाते ही उनके सहयोगियों ने दो दर्जन से ज्यादा मुसलमानों की कब्रें खोदकर शव निकाल लिए थे ताकि ‘मोदी’ के विरुद्ध जाल बिछाने-सबूत के काम को तेजी से अंजाम दिया जा सके। क्या आपको पता है कि तीस्ता और उनके पति पर एनजीओ को मिली करीब डेढ़ करोड़ रु. की वित्तीय मदद महंगे प्रसाधनों जैसे निजी खर्चों में उड़ाने का मामला चल रहा है! कठुआ बलात्कार कांड याद है! यह भी जान लीजिए कि यहां भी पीड़िता के पैरोकार बन रुपए जुटाने वाले ू१ङ्म६ल्लिी६२्रल्लॅ पर कोष में घपले के आरोप उठ रहे हैं। आरोपी की वकील दीपिका राजावत के साथी तालिब हुसैन खुद एक बलात्कार के मामले में फंस चुके हैं और खुद दीपिका इस मामले की 110 से ज्यादा हुई सुनवाई में सिर्फ दो बार शामिल हुई हैं।
उपरोक्त दो मामले सिर्फ उदाहरण हैं। इस बात का उदाहरण कि आंसू और आक्रोश दिखाते भावुक एवं अति संवेदनशील-प्रगतिशील चेहरे के पीछे कोई छलावा भी हो सकता है। ऐसे तत्व जनाक्रोश को भड़काते हुए अपना स्वार्थ ही नहीं भुनाते बल्कि एक समय बाद मुद्दे और मौके से अचानक लापता भी हो जाते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसी मौकापरस्ती और खालीपन उन्हें चोट पहुंचाए न पहुंचाए, व्यवस्था के स्तंभों पर अनास्था का हथौड़ा जरूर चला देता है। यह हथौड़ा चलने के बाद समाज की अपनी ही संस्था-व्यवस्थाओं के प्रति राय क्या बनती है—
— राजनीति बुरी है, इसमें सिर्फ बुरे ही लोग होते हैं।
— सरकारी नौकरी मजे की है, इसमें काम नहीं करना पड़ता। ऊपरी कमाई भी होती है, बाद में पेंशन भी मिलती है।
— अदालत में सिर्फ पैसे और रसूख वालों की सुनवाई होती है।
— मीडिया अपने ‘गणित’ से खबरें चलाता है, लोगों के मतलब की बात दबा देता है।
सोचिए, जहां भरोसा होना था वहां अविश्वास का भाव कैसे गहराता गया! इस व्यवस्था में रहते हुए हमें अपने ही ताने-बाने से काटने, आपस में लड़ाने और इन मौकों को भुनाने का काम कौन लोग कर रहे हैं? व्यवस्था के हर पाये पर उपद्रवी आंदोलन के प्यादे और ढाल बनकर कौन लोग काम कर रहे हैं? सकारात्मक आंदोलन निश्चित ही आवश्यक हैं परंतु निहित स्वार्थ या वामपंथ जैसी खूनी-उपद्रवी विचारधारा के आंदोलन समाज में हताशा, विषाद और आक्रोश ही पैदा करते हैं ताकि लोगों का व्यवस्था से भरोसा उठ जाए। विभिन्न राज्यों में जारी चुनाव प्रक्रिया और आसन्न लोकसभा चुनाव वह मौका हैं जब भाइयों को लड़ाने वाले, सज्जनों पर लांछन लगाने वाले और फिर इस हड़बोंग में लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की साख की बोटियां नोचने वाले गिद्ध मंडराएंगे। इन गिद्धों से सतर्क रहना जरूरी है, क्योंकि लोकसभा चुनाव से पूर्व जनभावना से जुड़े कई मुद्दे ‘कतार’ में हैं।