कांग्रेस नहीं, कॉमरेड कांग्रेस: कांग्रेसी नेताओं के नक्सलियों से संबंध
स्रोत:    दिनांक 19-नवंबर-2018
     शुभम उपध्याय
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इन सभी शहरी नक्सलियों को एक्टिविस्ट कहा था, लेकिन अब पुणे पुलिस ने स्पष्ट कर दिया है कि इन शहरी नक्सलियों से मिले पत्रों में दिग्विजय सिंह का फ़ोन नंबर भी है

 
 जनवरी 2018, भीमा कोरेगांव. एक ऐसी जगह जहां अचानक हिंसा हो उठी. कहने को तो वह हिंसा थी लेकिन पहली नजर में ही समझ आ रहा था कि किसी पत्थर को जबरदस्ती रगड़कर चिंगारी निकाली गई और फिर उस चिंगारी की मदद से आग लाग लगाई गई हो. दो समुदायों के बीच हुए इस हिंसा में 30 लोग बुरी तरह घायल हुए थे वहीं 1 बेकसूर व्यक्ति की जान गई थी. हिंसा का होना, फिर उसे सालों के शोषण से जोड़ना और उसके बाद हिंसा में संदिग्धों का महिमामंडम करना, यह सबकुछ संदेह पैदा कर रहा था कि किस तरह समाज के ताने-बाने को दूषित कर अपनी राजनैतिक और वैचारिक रोटियां सेंकी जा रही है. वैसे शुरू से ही हिंसा के पीछे किसी षड़यंत्र होने की आशंका तो थी, लेकिन जैसे जैसे पुलिस की जांच आगे बढ़ती गई बड़े बड़े नाम जो मुखौटे के पीछे छिपे हुए थे वो बाहर आने लगे. अब इन सब में कांग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का नाम आया है. कांग्रेस के बड़े नेता और वामपंथी कार्यकर्ताओं के नाम आने से यह तो स्पष्ट होता दिख रहा है कि अपनी गिरती साख और खत्म होते वजूद को बचाए रखने के लिए राजनैतिक और वैचारिक गिद्ध एक होकर समाज में फूट डालकर फायदा उठाने की कोशिश में हैं.
दरअसल 2 जनवरी 2018 को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दो समुदायों के बीच भीषण हिंसा हुई थी. इस हिंसा के बाद पुणे पुलिस ने बड़ी सावधानी बरतते हुए इसकी जांच शुरू की और जांच के दौरान इस हिंसा के षड़यंत्र में वामपंथी कार्यकर्ताओं को शामिल पाया. पुणे पुलिस ने 28 अगस्त को अरुण फरेरा, वर्नोन गॉन्जोल्वीस और सुधा भारद्वाज सहित अन्य वामपंथी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. कोर्ट ने हिंसा के आरोपी इन कार्यकर्ताओं की जमानत याचिका खारिज कर 14 दिन न्यायिक हिरासत में भेजा था. महाराष्ट्र पुलिस ने 10 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट भी दायर किया है. 5000 से अधिक पन्नों में दायर चार्जशीट में सुधीर प्रह्लाद ढवले, रोना जेकब विल्सन, सुरेंद्र पुंडलीकराव गडलिंग, शोमा कांति सेन, महेश सीताराम राऊत के नाम हैं. वहीं पुलिस ने फरार आरोपियों के नाम भी दिए हैं जिनमें वामपंथी कार्यकर्ता मिलिंद तेलतुंबडे, कॉमरेड प्रकाश उर्फ नवीन, उर्फ ऋतुपन गोस्वामी, कॉमरेड मंगलु, कॉमरेड किशन उर्फ प्रशांतो बोस, कॉमरेड दीपू का नाम शामिल है. इसके साथ ही पुलिस ने हिंसा से पहले हुए यलगार परिषद में दिए इनके भाषणों को भी मामले में आधार बनाया है. चार्जशीट में सुधीर ढवले, शोमा सेन और सुरेंद्र गडलिंग को प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) ने महेश सीताराम राउत के द्वारा 5 लाख रुपये देने का भी ज़िक्र है. इन सब के अलावा इन शहरी माओवादियों के पास से अनेक पत्र बरामद हुए हैं. कुछ पत्रों के माध्यम से यह पता चला है कि वामपंथी कार्यकर्ता महेश ने टीस (टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस) से दो छात्रों को सीपीआई में शामिल कर उन्हें माओवादियों के संपर्क में गुरिल्ला युद्ध के ट्रेनिंग के लिए जंगलों में भेजा है.
लेकिन इन सब बातों से महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी का इन शहरी नक्सलियों के समर्थन में खुलकर आ जाना. हालांकि कांग्रेस की विचारधारा हमेशा से वामपंथ की ओर झुकी नज़र आई. राहुल गांधी जो कि कांग्रेस पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष हैं वो भी खुलकर इन शहरी नक्सलियों को एक्टिविस्ट बोलने से नहीं चूके. लेकिन एक बात विचारणीय है कि राहुल गांधी जो कि आज विपक्ष की सबसे पार्टी के नेता हैं, अपनी पार्टी से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हैं, जिनके पार्टी ने देश पर 60 सालों तक राज किया, जिनके परिवार में 3 प्रधानमंत्री रहे, वहीं उनकी मां ने परोक्ष रूप से 10 साल तक शासन चलाया उनकी नज़र में आज देश की सुरक्षा पर दंश लगाने वाले, सामाजिक ताने-बाने को दूषित करने वाले और इस लोकतांत्रिक ढाँचे में दशकों से गृहयुद्ध कर रहे जंगली आतंकवादियों के मददगार आज एक्टिविस्ट क्यों नज़र आ रहे हैं?
जिस तरह से कांग्रेस के शासन के दौरान तरह-तरह के एनजीओ, संगठनों और सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से वामपंथी कार्यकर्ता सरकारी मशीनरी का उपयोग करते थे, वहीं जंगल में चल रहे युद्ध में लोकतंत्रविरोधी ताकतों की वैचारिक दलाली करते थे वो सभी तंत्र पिछले साढ़े चार वर्षों में तबाह हो चुका है. मीडिया, साहित्य, शिक्षा, इतिहास जैसे संस्थानों से जुड़े वामपंथी कार्यकर्ताओं की असलियत जनता के सामने आ चुकी है वहीं दूसरी ओर इनकी विचारधारा पूरी तरह से नकार दी गई है, जिस वजह से अब संसाधनों की कमी और डूबते सूरज को बचाने के लिए छटपटाया हुआ वामपंथ लगातार खुद को उजागर कर रहा है.
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इन सभी शहरी नक्सलियों को एक्टिविस्ट कहा था, लेकिन अब पुणे पुलिस ने स्पष्ट कर दिया है कि इन शहरी नक्सलियों से मिले पत्रों में दिग्विजय सिंह का फ़ोन नंबर भी है. 25 सितंबर 2017 को कॉमरेड प्रकाश द्वारा कॉमरेड सुरेंद्र को लिखे एक पत्र में लिखा है कि "कांग्रेस राष्ट्रव्यापी विरोध में छात्रों का उपयोग करने के प्रयासों में सहायता करने को लेकर काफी इच्छुक है", वहीं पत्र में इसके लिए कॉमरेड सुरेंद्र ने कथित रूप से एक नंबर का उल्लेख करते हुए कहा है कि "इसमें संपर्क कर सकते हैं". जिस नंबर का उल्लेख सुरेंद्र ने किया है वह नंबर कथित रूप से दिग्विजय सिंह का है. मीडिया में आ रही रिपोर्ट के अनुसार पुणे पुलिस के डीसीपी ने भी इस बात की पुष्टि की है.
छत्तीसगढ़ में होने रहे विधानसभा चुनाव के दौरान आये कांग्रेस के स्टार प्रचारक और उत्तप्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने तो नक्सलियों-माओवादियों को "क्रांतिकारी" बता दिया था. छत्तीसगढ़ का एक-एक निवासी जानता है कि नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ का कितना नुकसान किया है, एक-एक आदिवासी जानता है कि नक्सलियों ने उनके बच्चों की ज़िंदगी कैसे खराब कर रखा है, मैं स्वयं छत्तीसगढ़ का निवासी होने ने नाते यह महसूस करता हूं कि सामाजिक ताने-बाने और पर्यटन एवं खनिज संपदा में समृद्ध होने के बाद भी मुझे नक्सल प्रभावित प्रदेश का नागरिक माना जाता है. लेकिन वहीं कांग्रेस के नेताओं को नक्सली क्रांतिकारी लगते हैं, और कांग्रेस पार्टी ऐसे नेताओ को स्टार प्रचारक और प्रदेश अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर भी बिठाती है.
कांग्रेस ने जिस तरह शहरी नक्सलियों का समर्थन किया है उससे यह तो स्पष्ट है कि राहुल गांधी और उनकी टीम सत्ता के लालच में देश को तोड़ने में आमादा नक्सलियों को भी साथ लेने से गुरेज नही करेंगे. वैसे उपरोक्त कथन कोई अतिश्योक्ति नही बल्कि सत्य के करीब नजर आती है. कांग्रेस पार्टी छत्तीसगढ़ में मुख्य विपक्षी पार्टी है और पिछले 15 सालों से सत्ता से बाहर है. छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहाँ नक्सलवाद एक मुख्य समस्या है, ऐसे राज्य में अपने घोषणा पत्र में कांग्रेस पार्टी ने नक्सलियों के खात्मे को लेकर कोई घोषणाएं नही की है, वहीं किसी भी स्टार प्रचारक ने नक्सलियों की समस्या को खत्म करने को लेकर कोई अहम बात नही कही. यह दिखाता है कि कांग्रेस पार्टी अब पूरी तरह विषाक्त हो चुकी है और वर्तमान में देश और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अत्यंत हानिकारक है.