'वामपंथी इतिहासकारों ने नहीं सुलझने दिया राम मंदिर का मामला'
स्रोत:    दिनांक 02-नवंबर-2018
 
''एक हिन्दू के लिए अयोध्या में श्रीराम मंदिर का उतना ही महत्त्व है जितना कि एक मुसलमान के लिए मक्का-मदीना का। इसी सोच पर आगे बढ़कर हमें नये भारत का निर्माण करना होगा। अयोध्या में श्रीराम मंदिर का मुद्दा बहुत पहले हल हो सकता था, लेकिन वामपंथी इतिहासकारों और कट्टर मुसलमानों ने ऐसा नहीं होने दिया।'' उन्होंने अपनी आत्मकथा 'जानएन्ना भारतीयन' (मैं एक भारतीय) में यह खुलासा किया है इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता के. के. मोहम्मद पूर्व निदेशक उत्तरी क्षेत्र, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने। प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
आपने अपनी पुस्तक में खुलासा किया है कि श्रीराम मंदिर का मुद्दा काफी पहले सुलझ सकता था। फिर आप इतने वर्षों तक चुप क्यों रहे?
देखिये 15 दिसम्बर, 1990 को मैं मद्रास पुरातत्व विभाग में उप अधीक्षक के पद पर कार्यरत था। उस समय भी मैंने कुछ तथ्यों को उजागर किया था जिनसे स्पष्ट हो रहा था कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर ही था। उससे संबंधित समाचार एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित किए जाने के बाद यह विषय चर्चा में आया और उस समय तक बाबरी कांड भी नहीं हुआ था, लेकिन एक सरकारी कर्मचारी होने के नाते तब मैं मजबूर था। फिर भी मुझे उन तथ्यों को उजागर करने की सजा दी गई और मद्रास से मेरा तबादला गोवा कर दिया गया।
आपकी पुस्तक में अयोध्या मंदिर का जिक्र होना क्या चर्चित होने का प्रयास तो नहीं है?
मैंने अपनी पुस्तक में कोई भी तथ्य किसी धर्म या मजहब को ध्यान में रखकर नहीं लिखा है। अयोध्या में मंदिर से संबंधित साक्ष्य उपलब्ध थे जिन्हें अनदेखा किया गया। पहला मंदिर के स्तम्भ जिन्हें बाद में मस्जिद के खंभों का रूप दिया गया। दूसरा स्तम्भों के नीचे का आधार, मंदिर में लगे कलश के नीचे का स्थान और विष्णु-हरि शिला काफी महत्वपूर्ण तथ्य हैं, इनसे स्पष्ट है कि संबंधित भूमि पर मंदिर पहले ही अस्तित्व में था और उसके बाद उनसे छेड़छाड़ की गई। 1976-77 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक प्रो. बी. बी. लाल के समय में भी मंदिर वाले स्थान पर 14 स्तम्भ मिले, जो प्रमाण दे रहे थे कि वहां पर मंदिर ही था। मैंने सिर्फ सही तथ्यों को स्पष्टता के साथ अपनी पुस्तक में समाहित किया है। रही बात चर्चा या किसी एक का पक्ष लेने की तो बता दूं कि 2000 में बिहार में कुछ हिन्दूवादी संगठनों ने शेरशाह सूरी के मकबरे के निकट मंदिर बनाकर भूमि पर अतिक्रमण करने का प्रयास किया था, उस समय मैंने कार्रवाई करते हुए उन लोगों को तत्काल रोका था। 2003 में आगरा में हिन्दूवादी संगठनों ने ताजमहल के निकट एक प्राचीन मंदिर का विस्तार किया जिसके अवैध होने पर मैंने उसे तुड़वाया था इसके विरोध में मेरा पुतला भी जलाया गया। इसलिए मैं दावे से कह सकता हूं कि मैंने ईमानदारी से अपना काम किया है, चर्चा छेड़ना या मुद्दा गरमाना मेरा उद्देश्य कभी नहीं रहा।
 
आप एक इतिहासकार और मुसलमान के रूप में अयोध्या मंदिर की समस्या का क्या हल देखते हैं क्योंकि आपने कट्टर मुसलमानों को इस समस्या में अडंगा लगाने वाला भी बताया है?
सही मायने में अयोध्या मंदिर से मिले प्राचीन साक्ष्यों की जानकारी कभी जनता तक पहुंचाई ही नहीं गई। वामपंथी इतिहासकार तो हैं, लेकिन वे पुरातत्व विशेषज्ञ नहीं हैं। यही वजह रही कि उन लोगों ने अधूरी जानकारी को ही मुख्य मुद्दा बनाकर समाज के सामने परोस दिया। इतिहासकारों को मालूम होना चाहिए कि खुदाई के दौरान भी अनेक साक्ष्य मिले हैं जिनसे पता लगता है कि मंदिर के रूप को ही मस्जिद में तब्दील किया गया। अधूरी जानकारी और सीमित तथ्य सामने रखते हुए वामपंथी इतिहासकारों ने कट्टरवादी मुसलमानों को बरगला दिया। वे अपनी जिद पर अड़े रहे, ''जिस तरह एक मुसलमान के लिए मक्का-मदीना का महत्व है, ठीक उसी तरह एक हिन्दू के लिए अयोध्या में श्रीराम मंदिर का महत्व है''। इसलिए मुसलमानों को समझाकर किसी दूसरे स्थान की व्यवस्था की जानी चाहिए और यहां बिना किसी विवाद के मंदिर बनवाना चाहिए।
इस समस्या के समाधान के लिए हिन्दुओं को दोबारा मुसलमानों से वार्ता करनी चाहिए अयोध्या मामले का शांतिपूर्ण हल निकालना है तो वामपंथी इतिहासकारों को इससे दूर रखना होगा। इसी तरह से नये भारत का निर्माण होगा। इन दिनों केरल में रहकर मैंने आम मुसलमानों से बातचीत की तो उनका मत भी यही था कि अयोध्या मुद्दे का हल निकलना चाहिए।
मंदिर निर्माण के लिए जितने तथ्य मिले हैं, क्या वे पर्याप्त हैं?
जी बिल्कुल, मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या में मिले तथ्य पर्याप्त हैं। 50 से अधिक मंदिर स्तम्भों और उनके आधार का मिलना काफी है। देश के बुद्धिजीवियों को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़कर हिन्दू-मुसलमानों के बीच वर्षों से पल रहे विवाद को दूर करना होगा। इसके लिए देशहित में मुसलमानों को गुमराह करने वालों को अपनी पुरानी परंपरा को बदलना होगा। यही देश के भविष्य के लिए अच्छा होगा।
 
( साक्षात्कार पाञ्चजन्य के आर्काइव से लिया गया है )