जयंती विशेष : " शूरवीर मेजर सोमनाथ शर्मा को नमन "
स्रोत:    दिनांक 02-नवंबर-2018
दुश्मन हम से बस 100 गज की दूरी पर है। हम घिरे हुए हैं संख्या में कम हैं लेकिन मैं एक कदम भी पीछे नहीं हटूंगा। जब तक हमारे पास एक भी गोली और एक भी सांस है मैं अपने जवानों के साथ मोर्च से पीछे नहीं हटूंगा और मरते दम तक लड़ूंगा। आर्मी हेडक्वार्टर को दिया यह मेजर सोमनाथ शर्मा का अंतिम संदेश था। 1947 में 3 नवंबर को देश के लिए मेजर सोमनाथ शहीद हुए थे। मरणोपरांत उन्हें सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। आजाद भारत का यह पहला परमवीर चक्र था 
एक सैन्य अधिकारी होने के नाते वह जानते थे कि दुश्मन ज्यादा है और उनके सैनिकों की संख्या कम इसलिए दुश्मन को बहुत देर तक नहीं रोका जाता सकता, लेकिन वह यह भी जानते थे कि जब तक और मदद नहीं आ जाती पीछे हटना मुनासिब नहीं होगा। यदि ऐसा हुआ तो कबाइली बिना किसी रुकावट के एयरफील्ड पर पहुंच जाएंगे और श्रीनगर पर कब्जा कर लेंगे।
उन्होंने वहीं टिकने का फैसला किया। जवानों की हौसला अफजाई करते हुए उन्होंने उन्हें अंतिम समय तक लड़ने का हुक्म दिया। उनके बाएं हाथ में प्लास्टर था लेकिन वह लगातार मोर्च पर डटे रहे। ऐसे थे शूरवीर थे मेजर सोमनाथ शर्मा। रचना बिष्ट की पुस्तक "शूरवीर परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां " में उन्होंने मेजर सोमनाथ शर्मा के छोटे भाई लेफ्टिनेंट जनरल सेवानिवृत सुरिंद्रनाथ शर्मा से हुई बातचीत के आधार पर विस्तार से उस युद्ध का वर्णन किया है जिसमें मेजर सोमनाथ शर्मा शहीद हुए थे।
मेजर जानते थे कि दुश्मन के सामने ज्यादा देर नहीं टिका जा सकता। सिपाही अपना आत्मविश्वास न खो दें इसलिए वह स्वयं खुले मैदान में आ गए। सिपाही मारे जा रहे थे। मेजर का बायां हाथ जख्मी था उन्होंने एक हाथ से लाइट मशीनगन लोड की और मोर्चा संभाल लिया। वह सिपाहियों को भी मशीनगन लोड करके देते और दुश्मन पर लगातार खुद भी फायर करते। इधर मारो, उधर मारो, वह लगातार अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। 3 नवंबर दोपहर की बात है उनका गोला बारूद खत्म होने के कगार पर था। उन्होंने ब्रिगेड मुख्यालय को इसकी सूचना दी। सीनियर अधिकारियों ने उन्हें सलाह देते हुए कहा कि वह पीछे हट जाएं। लेकिन उन्होंने इस बात से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि दुश्मन हम से बस 100 गज की दूरी पर है। हम घिरे हुए हैं संख्या में कम हैं लेकिन मैं एक कदम भी पीछे नहीं हटूंगा। जब तक हमारे पास एक भी गोली और एक भी सांस है मैं अपने जवानों के साथ मोर्च से पीछे नहीं हटूंगा और मरते दम तक लड़ूंगा। आर्मी हेडक्वार्टर को दिया यह मेजर सोमनाथ शर्मा का यह अंतिम संदेश था। कुछ ही मिनटों पर उनके खंदक में एक गोला आकर गिरा और मेजर सोमनाथ, उनका सहायक, मशीनगन चलाने वाला जवान और जेसीओ जो वहीं बगल में खड़ा था तीनों शहीद हो गए।
 
कुमाउं रेजीमेंट गेट ,इस गेट का नाम मेजर सोमनाथ के नाम पर  है
बाद में 5 नवंबर की सुबह बडगाम पर हमला बोलकर भारतीय सेना ने वहां कब्जा कर लिया। सभी हमलावर मारे गए और भारतीय सेना ने मेजर सोमनाथ शर्मा, सुबेदार प्रेम सिंह मेहता और शहीद हुए 20 जवानों का बदला लिया।
मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी, 1923 को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में हुआ था. अपनी शुरुआती शिक्षा के लिए सोमनाथ पहले नैनीताल और बाद में उच्च शिक्षा के लिए देहरादून गए। उनके परिवार में कई लोग पहले से ही सेना में थे। उनके पिता मेजर अमरनाथ शर्मा भी सेना का हिस्सा रहे, जो आर्मी मेडिकल सर्विस के डायरेक्टर जनरल के पद सेवानिवृत हुए। पिता के अलावा उनके मामा किशनदत्त वासुदेव सेना में बतौर लेफ्टिनेंट 4/19 हैदराबादी बटालियन का हिस्सा रहे।
मई 1941 में उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी में प्रवेश लिया। नौ महीने का कड़ा प्रशिक्षण लेने के बाद 22 फरवरी, 1942 को उन्हें चौथी कुमायूं रेजिमेंट में बतौर कमीशंड ऑफिसर के रूप में सेना का हिस्सा बन गए। जब वह सेकेंड लेफ्टिनेंट बने तो मात्र 19 साल के थे। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था। सेना का हिस्सा बनते ही उन्हें दूसरे विश्व युद्ध के तहत कई मोर्चों पर युद्ध लड़ा। उनकी नेतृत्व क्षमता से सभी लोग वाफिक थे, इसलिए उनके वरिष्ठ अधिकारी भी उनकी बात बहुत मानते थे।
15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो पाकिस्तान के रूप में एक देश दुनिया के नक्शे पर आ चुका था। 22 अक्टूबर, 1947 को जब पाकिस्तान सेना ने कबाइलियों, भगौड़े सैनिकों के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर पर कब्जे की नियत से आक्रमण किया।
इस दौरान मेजर अस्पताल में भर्ती थे उनके बाएं हाथ की कलाई में फ्रैक्चर था। उन्होंने उसी हालत में अपने वरिष्ठ अधिकारियों से कहा कि वह मोर्च पर जाना चाहते हैं। उनके कमाडिंग अफसर ने उन्हें साफ मना कर दिया लेकिन मेजर अपनी कंपनी के साथ मोर्च पर जाना चाहते थे। सोमनाथ नहीं माने। आखिरकार वह अपने कमाडिंग अफसर को मनाने में कामयाब हो गए। जैसे ही उन्हें अनुमति मिली वह एयरपोर्ट पहुंचे और अपनी डेल्टा कंपनी में शामिल हो गए।
सोमनाथ शर्मा इसी कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी कमांडर थे। अक्टूबर के अंत में जब सोमनाथ श्रीनगर पहुंचे तो हमलावर बरामुला पहुंचने वाले थे और फिर बडगाम। यही नियति थी। यहीं वह युद्ध होने वाला था जहां सेना के इस बहादुर अफसर को शहीद होना था और आजाद भारत का पहला परमवीर चक्र लेने का सम्मान हासिल करना था।
रानीखेत में कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर के ट्रेनिंग ग्राउंड का नाम उनके नाम पर रखा गया है। यहां लाल पत्थर से बना एक बड़ा द्वार है जिसे सोमनाथ द्वार के नाम से जाना जाता है। उनकी कहानी नए आने वाले जवानों और अफसरों को सुनाई जाती है ताकि वे उससे प्रेरणा ले सकें।
 
(लेख के अंश शूरवीर परमवीर चक्र विजेताओं की कहानियां पुस्तक से साभार लिए गए हैं )