रंगा सियार पीएफआई: मानवाधिकार की आड़ में छिपा दी जाती हैं देशविरोधी गतिविधियां
स्रोत:    दिनांक 22-नवंबर-2018
- बिनय कुमार सिंह  
झारखंड सरकार ने आईएसआईएस से प्रभावित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को प्रतिबंधित घोषित कर दिया है. (फाइल चित्र ) 
पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पी.एफ.आई.) के कर्ताधर्ता बहुत ही शातिर किस्म के लोग हैं। यही कारण है कि ये लोग अपनी देश-विरोधी गतिविधियों को भी मानवाधिकार की आड़ में छिपा लेते हैं। ऊपर से यह दलील भी देते हैं कि उनकी गतिविधियां भारतीय संविधान के दायरे में हैं। पी.एफ.आई. का मानना है कि हमास, तालिबान और अलकायदा के लड़ाके ‘स्वतंत्रता सेनानी’ हैं। इसी से पता चलता है कि यह संगठन किस विध्वंसक विचार को बढ़ावा देने का काम कर रहा है। यही नहीं, यह संगठन भारत को मुसलमानों के दुश्मन देशों के मित्र के रूप में भी देखता है। 2009 में कोझिकोड में आयोजित अपने पहले राजनीतिक सम्मेलन में पी.एफ.आई. ने एक घोषणापत्र जारी किया था। इसके अनुसार, ‘‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध एक अमेरिकी एजेंडा है। यह एक राजनीतिक चाल है जिसे विश्व वर्चस्व की सोच वाली आधिपत्यवादी शक्तियों ने आकार दिया है। मुसलमान आतंक के विरुद्ध युद्ध के पीड़ित हैं। भारत सरकार डब्ल्यू.टी.ओ. का समर्थन करती है और अमेरिका-इस्रायल गठजोड़ द्वारा रची गई योजनाओं को लागू करने के लिए तंत्र भी उपलब्ध कराती है। इस गठबंधन के कारण ही हम देश में बम विस्फोटों में बढ़ोतरी देख रहे हैं, जबकि सेकुलर राजनीतिक दल मुस्लिम मतों का उपयोग करने के लिए चिंतित हैं, वे उन्हें समान सहभागी के रूप में स्वीकार नहीं कर रहे हैं। वे नागरिक के रूप में मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहे हैं। यहां तक कि सांप्रदायिक दंगों के दौरान उन्हें कानूनी संरक्षण देने से भी इनकार कर दिया, जो समग्र रूप से मुस्लिम विरोधी हमलों का ही एक रूप है। प्रशासन ने जब मुस्लिम विरोधी शक्तियों से हाथ मिला लिया, तो मुसलमानों के मस्तिष्क में डर पैदा हो गया। गहरी आशंका है कि मुसलमानों को आर्थिक और सामाजिक रूप से तोड़ने के लिए सोची-समझी योजनाएं बनाई और लागू की जा रही हैं। बुनियादी जरूरतें न देने और उनकी बुनियादी मांगों की जान-बूझ कर उपेक्षा करने से वे सामाजिक गुलामी में जी रहे हैं। इसके लिए सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि मुसलमानों की उन्नति के लिए मुस्लिम संगठन आगे आएं और समुदाय को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करें।’’
इस्लामी गुट पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के कई गुर्गे कुख्यात आतंकी संगठन आई.एस.आई.एस. में शामिल हो चुके हैं। यही नहीं, संचालकों में से अनेक पर गंभीर आरोप हैं। इसके बावजूद बहुत ही चालाकी से उस पर उदारवाद का आवरण चढ़ा दिया गया है। ‘यथार्थ’ स्तंभ के तहत पी.एफ.आई. को बेनकाब किया जा रहा है। प्रस्तुत है दूसरी कड़ी-
वर्तमान में पी.एफ.आई. का 12 राज्यों में व्यापक संगठन और 23 से ज्यादा राज्यों में सक्रियता है। राजनीतिक तौर पर पी.एफ.आई. खाने के अधिकार, बोलने के अधिकार, काले कानून जैसे मुद्दों पर देशव्यापी अभियान चलाती है, लेकिन अंदर ही अंदर वह ‘100 वर्ष का मुस्लिम एजेंडा : रोडमैप 2047’ के प्रचार-प्रसार में व्यस्त है। इसका उद्देश्य है 2047 तक व्यापक उपायों से मुस्लिमों का सशक्तिकरण करना, ताकि वे उन सुविधाओं को भोग सकें, जिन्हें वे स्वतंत्रता से पहले भोग रहे थे, खास कर मुगलकाल में।
पी.एफ.आई. का मानना है, ‘‘आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिकी युद्ध और इस्रायल के साथ भारत की नई दोस्ती ने मुस्लिमों के सर्वनाश में और बढ़ोतरी की है। भारत की सुरक्षा और रणनीतिक तंत्र अमेरिका और इस्रायली खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों से बहुत हद तक प्रभावित हैं। भारतीय मुसलमान गोमांस खाने के नाम पर हिंदुओं द्वारा पीड़ित किए जाते हैं। मीडिया लगातार उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाता है और आतंकी गतिविधियों में मुसलमानों की भूमिका को बिना जांच के ही स्वीकार कर लेता है।’’
पी.एफ.आई. पिछले दो साल से 15 अगस्त के अवसर पर ‘फ्रीडम परेड’ निकालती है। इसमें उसके समर्थक अर्धसैनिक संगठनों के जैसी वर्दी पहन कर शामिल होते हैं। इस तरह की परेड केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के कई शहरों में निकल चुकी है। विशेषज्ञों का दावा है कि परेड में शामिल होने वाले पी.एफ.आई. समर्थकों को पूर्व पुलिस अधिकारियों और सैन्य बलों के द्वारा प्रशिक्षित किया गया है। केरल के पूर्व पुलिस महानिदेशक विन्सन एम़ पॉल के अनुसार, ‘‘पी.एफ.आई. में शामिल होने वाले सभी मुस्लिम युवाओं को मोबाइल फोन, मोटरसाइकिल और पैसा दिया जाता है। यह खाड़ी के देशों में युवाओं को नौकरी दिलाने में भी सहायता करती है।’’
पी.एफ.आई. की राजनीतिक शाखा, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया (एस.डी.पी.आई.) ने केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में पहले से ही अपने समर्थकों की एक बड़ी संख्या बना ली है। कुछ महीने पहले कर्नाटक विधानसभा के लिए चुनाव हुआ था। उस चुनाव में एस.डी.पी.आई. ने कांग्रेस का समर्थन इस शर्त पर किया था कि सरकार बनने पर उसके समर्थकों से मुकदमे वापस लिए जाएंगे इनमें ज्यादातर मुकदमे हत्या से जुड़े हैं।
असम में भी एस.डी.पी.आई. पैठ बनाने में लगी है। इसके लिए उसने असम के सांसद और इत्र व्यापारी मौलाना बदरुद्दीन अजमल के कंधों का सहारा लिया है। अजमल की पार्टी असम संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (ए.यू.डी.एफ.) ने पी.एफ.आई. के साथ एकजुटता की घोषणा की है।
पश्चिम बंगाल में मिल्ली इत्तेहाद परिषद और तमिलनाडु में तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कझगम (टी.एम.एम.के.) जैसे छोटे राजनीतिक मुस्लिम समूह और दल पी.एफ.आई. की अगुआई वाले राष्ट्रीय गठबंधन में शामिल हो गए हैं। इनमें से ज्यादातर पी.एफ.आई. के कोझीकोड के 2017 के सम्मेलन से उभर कर आए हैं, जिसमें तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी शामिल हुए थे। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति के तत्कालीन सलाहकार इब्राहिम रसूल ने यहां एक सरल-सा समीकरण देकर पी.एफ.आई. का उत्साहवर्धन किया था, वह था ‘‘दक्षिण अफ्रीका में मुसलमानों की संख्या उसकी कुल जनसंख्या का तीन प्रतिशत है, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व 15 प्रतिशत है। अगर हम ऐसा कर सकते हैं, तो भारत में 13 प्रतिशत मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर सकते?’’
सूत्रों के अनुसार पी.एफ.आई. देश के कई राज्यों में अशांति को बढ़ावा देने में भी लगी है। 2014 में पंजाब के कई हिस्सों में वंचित समूहों द्वारा हिंसक आंदोलन हुए थे। माना जाता है कि वंचितों को भड़काने में पी.एफ.आई. का हाथ था। इसी तरह कुछ समय पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी जातीय संघर्ष हुआ था। उसमें भी पी.एफ.आई. की भूमिका मानी जाती है। झारखंड के माओवादियों से भी पी.एफ.आई. के संबंध हैं। यही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार शहरी नक्सली रोना विल्सन का संबंध भी पी.एफ.आई. की झारखंड इकाई से बहुत ही गहरा रहा है। पी.एफ.आई. और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच भी गहरे रिश्ते हैं। इन्हें भारत के विभिन्न हिस्सों में बसाने में पी.एफ.आई. की बड़ी भूमिका मानी जाती है। केरल पुलिस का आंतरिक सुरक्षा जांच दल (आई.एस.आई.टी.) भी पी.एफ.आई. की गतिविधियों की जांच कर रहा है। आई.एस.आई.टी. ने दावा किया है कि उसने पूरे केरल में छापों के दौरान तालिबानी सामग्री, वीडियो और अत्यधिक सांप्रदायिक और विध्वंसक साहित्य जब्त किया है। केरल उच्च न्यायलय में प्रस्तुत एक शपथपत्र में केरल सरकार के उप सचिव (गृह) राजशेखरन नायर ने दावा किया था कि आई.एस.आई.टी. ने अलकायदा से जुड़ी सीडी पाई है।
महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) ने भी दावा किया है कि पी.एफ.आई. के संबंध आतंकवादी गुट से हैं। उल्लेखनीय है कि पुणे के जर्मन बेकरी ब्लास्ट मामले में लश्कर-ए-तोयबा के मिर्जा हिमायत बेग और शेख लाल बाबा मोहम्मद हुसैन फरीद उर्फ बिलाल की गिरफ्तारी हुई थी। महाराष्टÑ एटीएस के अनुसार, बेग एक सक्रिय पी.एफ.आई. गुर्गा था। इतना सब कुछ बाहर आने के बाद तो यही कहना होगा कि अब पी.एफ.आई. के फन को कुचलना जरूरी है। नहीं तो यह आने वाले समय में अपने विष से पूरे भारत को जहरीला बना सकता है।
(लेखक पी.एफ.आई. पर शोध कर रहे हैं)