अयोध्या और आस
स्रोत:    दिनांक 26-नवंबर-2018
अयोध्या में सरयू नदी के किनारे दीपावली के अवसर पर अनूठी दीपमालिका का जगमगाता दृश्य
 
अयोध्या - केवल शब्द नहीं, पूरा आख्यान है।
इस शब्द का अर्थ है : अ-युध्य।
अर्थात् जिससे युद्ध नहीं किया जा सकता,
जिससे बैर नहीं पाला जा सकता।
जिसे जीतना नितांत असंभव है।
इतिहास साक्षी है कि इस अयोध्या को जीतने के लिए बर्बरतम प्रयास हुए।
श्रीरामचरितमानस के रचयिता महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने दोहाशतक में लिखा—
मंत्र उपनिषद् ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास।
जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास।।
सिखा सूत्र से हीन करि, बल ते हिंदू लोग।
भमरि भगाये देश ते, तुलसी कठिन कुजोग।।
बाबर बर्बर आइके, कर लीन्हे करवाल।
हने पचारि पचारि जनल, तुलसी काल कराल।।
संबत सर वसु बान भर नभ, ग्रीष्म ऋतु अनुमानि।
तुलसि अवधहिं जड़ जवन, अनरथ किए अनखानि।।
राम जनम महिं मंदिरहिं, तोरि मसीत बनाय।
जबहि बहु हिंदुन हते, तुलसी कीन्ही हाय।।
दल्यो मीर बाकी अवध, मंदिर राम समाज।
तुलसी रोवत हृदय अति, त्राहि त्राहि रघुराज।।
राम जनम मंदिर जहँ, तसत अवध के बीच।
तुलसी रची मसीत तहँ, मीर बाकी खाल नीच।।
रामायन धरि घंट जहँ, श्रुति पुरान उपखान।
तुलसी जवन अजान तहँ, कुरान अजान।।
इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि इस अयोध्या को जीतने के बर्बरतम के प्रयास अंतत: परास्त ही हुए।
समय की प्रस्तरशिला पर प्रबलतम आघात को सरयू की रेती सा बारीक घिस देने वाली है अयोध्या।
राम जी की चौखट, राम जी की चक्की है अयोध्या।
बाबर का ध्वंस, मीर बाकी का बनाया ढांचा, कुछ बाकी नहीं रहा।
दिल्ली के गलियारों में होती रहे राजनीति, अयोध्या के लोग इसे ‘रामजी की माया’ कहते हैं।
सवाल है कि अयोध्या सकल राष्ट्र की आस्था का विषय है या राजनीति का?
सुनिए—यहां पक्ष-विपक्ष का सवाल नहीं है।
क्योंकि जिन्होंने कभी कहा था—‘यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता’, उनकी राजनीति के पर कट गए। जो सुर कभी बहुत तीखे और सख्त थे—मुलायम पड़ गए।
वोट के लिए राम को नकारने वाले, शाहबानो के लिए सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पलटने वाले भी आज जनेऊधारी बन चौखट-चौखट मत्था टेक रहे हैं तो यह भी रामजी की ही माया है।
पता नहीं कि यह संयोग है या विडंबना कि जो काम राजनीति ने नहीं किया, वह अचानक न्यायालय से हुआ।
जाने-अनजाने का प्रश्न ही नहीं है, मगर रामजन्भूमि मुद्दे पर अदालती सुनवाई की तिथि सरककर अब उस जगह आ गई है जहां से अगले लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज होंगी।
न्यायालय की यह बात सिर-माथे कि उसकी प्राथमिकताएं अलग हैं। मगर इस समाज का क्या जिसके लिए राम ही
शिरोधार्य हैं!
जै रामजी की कहकर उठने और सदा के लिए सोने वाले को भी ‘राम नाम सत्य है’ बताने वाले, समाज की प्राथमिकता और क्या हो सकती है!
बहरहाल, चुनाव आते-जाते रहेंगे, समाज की आस्था अडिग है। जो इस बात को समझने में चूकेगा वह अयोध्या से युद्ध करने की गलती करेगा।
फिर जान लीजिए - अयोध्या अ-युध्य है।