भारतीय मीडिया का दुराग्रही नजरिया चिंतनीय
स्रोत:    दिनांक 26-नवंबर-2018

अयोध्या में राम मंदिर का प्रश्न मीडिया में छाया हुआ है। हर कोई उम्मीद लगाए था कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में अब फैसला सुनाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। यही वह मौका था जिसकी कांग्रेस प्रायोजित मीडिया को लंबे समय से प्रतीक्षा थी। एक खास दृष्टिकोण वाले अखबारों और चैनलों ने ऐसे में लोगों के बीच भ्रम फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि  ‘हम न्यायालय के फैसले पर कुछ नहीं कर सकते, फिलहाल मंदिर निर्माण की तारीख उन्हीं को बतानी है।’ तो इस पर आजतक चैनल ने ब्रेकिंग न्यूज चलाते हुए बताया कि केशव प्रसाद मौर्य ने कहा है कि सरकार कुछ नहीं कर सकती। मूल बयान कुछ था, लेकिन आजतक चैनल ने इसे कुछ और ही बना दिया। इसके फौरन बाद एबीपी न्यूज और दूसरे तमाम चैनलों ने बिना बयान को ध्यान से सुने वही कहना शुरू कर दिया, जिसके लिए शायद उनसे कहा गया था।
मुंबई के पास ठाणे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेस वार्ता में मंदिर पर कही गई बातों में भी मीडिया ने अर्थ का अनर्थ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसमें कही गई बातों को कई चैनलों ने ‘सर्वोच्च न्यायालय को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धमकी’ के तौर पर दिखाया। बताया गया कि संघ ने 1992 की तरह एक बार फिर से राम मंदिर आंदोलन शुरू करने की धमकी दी है। जबकि सवाल-जवाब को सुनकर आसानी से समझा जा सकता है कि वह धमकी थी या कुछ और था। यही वह मीडिया है जो तेलंगाना में मंदिर में भजन बजाने पर मुसलमानों के हाथों एक पुजारी की पिटाई पर मौन धारण कर लेता है।
जी न्यूज पर एक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस के प्रवक्ता ने एंकर को 2019 के बाद जेल भिजवाने की धमकी दी। इस घटना पर प्रेस की आजादी पर बड़ी-बड़ी बातें करने वालों ने कान बंद कर लिए। यहां तक कि मीडिया की स्वयंभू नियामक संस्थाओं ने भी उस कांग्रेसी प्रवक्ता के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। जबकि ऐसी बात भाजपा का कोई स्थानीय नेता कह देता तो मीडिया उसे राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना लेता। उधर मीडिया का कांग्रेस प्रेम जस का तस है। दिल्ली में सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ बदसलूकी की गई। लेकिन यह दिल्ली सरकार के विज्ञापनों के दबाव का ही कमाल था कि कुछ चैनलों और अखबारों ने इसे दोनों पक्षों के झगड़े का मामला बना दिया। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी दिल्ली का मीडिया खुलकर कांग्रेस की मदद कर रहा है। पार्टी के अंदरूनी विरोधाभासों और झगड़ों की खबरें चैनलों और अखबारों से करीब-करीब गायब हैं। साथ ही ऐसी फर्जी खबरें भी फैलाई जा रही हैं, जिनसे मतदाताओं में भ्रम पैदा किया जा सके। आजतक चैनल ने खबर चलाई कि मुख्यमंत्री चौहान के साले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। इस खबर से पहले लोग मुख्यमंत्री के उस तथाकथित साले को जानते तक नहीं थे। लेकिन मीडिया ने उसके कांग्रेस में जाने को एक ‘महत्वपूर्ण घटना’ साबित कर दिया। इसे अति उत्साह कहें या कांग्रेस के लिए प्रेम कि चैनलों ने उस तथाकथित साले का नाम भी गलत चलाया।
बीते सप्ताह शबरीमला मंदिर के दरवाजे एक बार फिर से खोले गए। मीडिया ने इस बार भी अपना रवैया नहीं बदला। रिपब्लिक और तमाम दूसरे अंग्रेजी चैनलों ने इस बार भी भगवान अयप्पा के भक्तों को कोसने और उन्हें दकियानूसी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। केरल की जनता जिस बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर रही है उससे भी मीडिया की आंखें नहीं खुल रहीं और तमाम कष्ट उठाकर मंदिर तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को ‘गुंडा’ साबित करने में जुटा है। पिछले दिनों इंडोनेशिया में एक विमान दुर्घटना का शिकार हो गया। संयोग से एक पायलट भारतीय था। टाइम्स आॅफ इंडिया की रिपोर्ट पढ़कर ऐसा लगा मानो हादसे के लिए उसका भारतीय होना ही सबसे अधिक जिम्मेदार था। कोई भारतीय समाचार पत्र अगर देश के खिलाफ इस तरह की मानसिकता दिखाता है तो क्या यह चिंता का विषय नहीं होना चाहिए? सोशल मीडिया पर चौतरफा आलोचना के बाद अखबार ने 11वें पेज पर एक स्पष्टीकरण छापकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली।