मध्य प्रदेश: इस बार फिर शिवराज के सिर सजेगा ताज!
स्रोत:    दिनांक 27-नवंबर-2018
- दीपक गोस्वामी                
15 साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस दांव पर लगे अपने भविष्य को बचाने के लिए सत्ता में वापसी के हर जोड़-तोड़ में लगी है। लेकिन मुद्दों के अभाव के कारण वह बिखरी हुई नजर आती है। वह समझ नहीं पा रही है कि कैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चुनौती से पार पाया जाय 
 जनता के बीच : मध्य प्रदेश में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
मध्य प्रदेश में मतदान की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, सियासी पारा गर्माता जा रहा है। 28 नवंबर को होने वाले मतदान से पहले पंद्रह साल से सत्ता से बाहर बैठी कांग्रेस दांव पर लगे अपने भविष्य को बचाने के लिए सत्ता में वापसी के हर जोड़-तोड़ में लगी है। लेकिन मुद्दों के अभाव के कारण वह बिखरी हुई नजर आती है। वह समझ नहीं पा रही है कि कैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चुनौती से पार पाया जाय। इसलिए कभी वह संघ की शाखा पर प्रतिबंध की बात करती है तो कभी उसके प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ मुस्लिमों को डराकर अपने पाले में करने का प्रयास करते हैं।
यही कारण है कि कांग्रेस शिवराज के सामने कोई चेहरा भी नहीं रख पा रही है और इस भ्रांति में जनता के भरोसे बैठी है कि वही उसका बेड़ा पार लगाएगी। उसने न तो कोई आगे की रूपरेखा पेश की है, न ही प्रदेश की उन्नति के लिए कोई कार्ययोजना। किसानों को वह कर्जमाफी का लालच तो दे रही है लेकिन किसानों के लिए लंबी अवधि की कोई योजना उसके पास नहीं है।
इस बार हम प्रदेश की उन कुछ चुनिंदा सीटों पर बात करेंगे जिन पर पूरे प्रदेश ही नहीं, देश की भी नजरें भी लगी हैं-
बुधनी सीट है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की। 2005 से शिवराज यहां से अजेय हैं। कांग्रेस उनके खिलाफ कोई दमदार स्थानीय उम्मीदवार नहीं खोज सकी तो उसने पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव को ही पैराशूट उम्मीदवार बनाकर क्षेत्र में उतार दिया। चर्चा है कि गुटबाजी में घिरी कांग्रेस ने अरुण यादव की राजनीतिक हत्या करने का प्रयास किया है। वैसे क्षेत्र में शिवराज के विकास कार्य लोगों की जुबान पर चढ़े हैं। स्थानीय नागरिक बताते हैं कि शिवराज के पहले यहां न तो सड़कें थीं, न ही बिजली-पानी की व्यवस्था। इसलिए वोट तो शिवराज को ही देंगे। उन्होंने रोजगार के लिए यहां दो ओद्यौगिक इकाइयां लगाई हैं। शिक्षा के लिए आईटीआई संस्थान खड़ा किया है। अस्पताल बनाया है।
शायद इसीलिए अरुण यादव को क्षेत्र में विरोध भी झेलना पड़ा है और एक वायरल वीडिया में वह लोग उनसे कहते नजर आ रहे हैं, ‘बस करो महाराज, हमारा नेता शिवराज।’
भोपाल की गोविंदपुरा सीट पर भी पर्यवेक्षकों की नजर रहेगी, जहां से लगातार दस बार जीत का रिकार्ड बनाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की बहू और भोपाल की पूर्व महापौर कृष्णा गौर मैदान में हैं। हालांकि कांग्रेस यहां कोई दमदार उम्मीदवार नहीं खोज सकी है। वह अंत समय तक इस आस में थी कि सरताज सिंह की तरह बाबूलाल गौर ही भाजपा से बगावत करके कांग्रेस में आ जाएं। लेकिन ऐसा नहीं हो सका और कांग्रेस के अरमानों पर पानी फिर गया। कृष्णा के सामने कांग्रेस ने नये चेहरे पार्षद गिरीश शर्मा को मैदान में उतारा है।
भोपाल उत्तर सीट इसलिए सुर्खियों में है, क्योंकि भाजपा ने यहां अपना एकमात्र मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारा है। इस सीट पर कांग्रेस के आरिफ अकील मैदान में हैं। यह सीट भाजपा के लिए चुनौती रही है। इस बार भाजपा ने इस चुनौती को स्वीकार किया और कांग्रेस को उसी की भाषा में जवाब देते हुए कांग्रेस के पूर्व मंत्री रसूल अहमद सिद्दीकी की बेटी फातिमा रसूल सिद्दीकी को पार्टी में लाकर आरिफ अकील के सामने खड़ा कर दिया। कांग्रेस, जो भाजपा के नेताओं को तोड़कर भाजपा को ही सत्ता से बेदखल करने के प्रयास में थी, भाजपा के इस कदम से सकते में आ गई है। गौरतलब है कि रसूल अहमद सिद्दीकी इस सीट से दो बार विधायक रहे हैं और एक बार अकील से पराजित भी हो चुके हैं। अकील ने रसूल को हराया था इसलिए फातिमा कहती हैं कि वे अपने पिता की हार का बदला लेंगी।
होशंगाबाद सीट पर मुकाबला एक भाजपा नेता और एक पूर्व भाजपा नेता के बीच है। यानी मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण शर्मा और चार दशक तक भाजपा में रहे, पूर्व केंद्रीय मंत्री, प्रदेश सरकार में मंत्री रहे सरताज सिंह के बीच है। 78 वर्षीय सरताज का टिकट भाजपा ने अपने उम्र के नियम के चलते काट दिया था। लेकिन सरताज इस पर बागी हो गये और कांग्रेस का दामन थाम लिया। सरताज भी होशंगाबाद से हैं। लेकिन सभी क्षेत्रीय समीकरण सीताशरण शर्मा के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। वे इस सीट से 4 बार के विधायक हैं। 2008 में परिसीमन के पहले तक यह इटारसी सीट हुआ करती थी। 1998 तक इस सीट पर वे जीते। 2003 और 2008 में वे चुनाव नहीं लड़े, लेकिन 2013 में लड़े और फिर जीते। करीब तीन दशक से यह सीट भाजपा के पास है और स्थानीय जनता उसके काम से खुश नजर आती है। आम जनता का कहना है कि चार दशक तक जिस पार्टी ने आपकी हर तरह से मदद की, उसे छोड़कर दूसरे दल का हाथ थामना तो मौकापरस्ती है। रायसेन जिले की भोजपुर सीट प्रदेश सरकार में मंत्री सुरेंद्र पटवा के पास है। कांग्रेस ने उनके सामने पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी को उतारा है। पटवा उन्हें 2003 में बड़े अंतर से हरा चुके हैं। वे दो बार से यहां से विधायक हैं और ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि सुरेश पचौरी फिर उनके सामने कोई चमत्कार करके दिखा सकेंगे। यह सीट भाजपा का गढ़ रही है और 1980 से अब तक हुए 8 चुनावों में से 7 में भाजपा ने जीत दर्ज की है। अरुण यादव की तरह ही अब सुरेश पचौरी के सामने अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाये रखने की चुनौती है।
मनावर सीट पर सबकी नजर इसलिए है, क्योंकि पूर्व मंत्री रंजना बघेल के सामने कांग्रेस ने यहां से ‘जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन’ के डॉ. हीरालाल अलावा को मैदान में उतारा है। कांग्रेस का यह दांव इस सीट को जीतने से अधिक के अलावा संगठन ‘जयस’ को खत्म करना ज्यादा था। ‘जयस’ के चलते कांग्रेस को डर था कि कहीं भाजपा विरोधी वोट ‘जयस’ न पा ले तो उसने ‘जयस’ को तोड़ने के लिए उसके अध्यक्ष को ही पार्टी में शामिल कर लिया। हीरालाल कुक्षी से टिकट चाहते थे लेकिन पार्टी ने उन्हें मनावर भेज दिया। एक प्रत्याशी जो किसी और सीट पर लड़ने का इच्छुक था, उसे कहीं और से लड़ाकर कांग्रेस ने मुकाबले में बने रहने की उम्मीद भी खो दी। रंजना बघेल 2003 से यहां से जीतती आ रही हैं।
ग्वालियर जिले की भितरवार सीट से पूर्व भाजपा मंत्री और वर्तमान मुरैना सांसद तथा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा एक बार फिर ताल ठोक रहे हैं। पिछले चुनाव में वे यहां कांग्रेस के लाखन सिंह से हार गये थे। हालांकि उनकी हार का कारण भाजपा से बागी हुए पूर्व विधायक बृजेंद्र सिंह को माना गया था। बृजेंद्र तब 14,578 वोट पाने में सफल रहे थे, जबकि अनूप को महज 6,500 मतों से हार का सामना करना पड़ा था। अनूप यहां काफी लोकप्रिय हैं और कांग्रेस प्रत्याशी लाखन सिंह को इस बार किसी बृजेंद्र सिंह के सहारे अनूप का वोट कटने की भी उम्मीद नहीं है। वहीं स्थानीय जनता भी क्षेत्र में विकास न होने के चलते बदलाव के लिए आतुर है। पहले यह सीट गिर्द हुआ करती थी और अनूप यहां से कभी हारे नहीं थे।
कटनी की विजयराघवगढ़ सीट पर मुकाबला रोचक है, क्योंकि यहां दो ऐसे उम्मीदवार आमने-सामने हैं जो पिछले चुनाव में भी टक्कर में थे, लेकिन उनके दल अलग थे। जो पहले भाजपा में था वह अब कांग्रेस में है और जो कांग्रेस में था वह अब भाजपा में है।
भाजपा प्रत्याशी संजय पाठक 2013 में यह सीट कांग्रेस के टिकट पर भाजपा प्रत्याशी पद्मा शुक्ला को हराकर जीते थे। 2014 में वे कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये, 2014 के उपचुनाव में उन्होंने फिर से जीत दर्ज की। संजय पाठक को बाद में शिवराज सरकार में मंत्री भी बनाया गया। इस दौरान पद्मा शुक्ला को पार्टी ने कई अहम पद सौंपे, लेकिन पिछले दिनों ऐन चुनावी नामांकन के समय वे कांग्रेस में शामिल हो गईं। उन्होंने इस दौरान भाजपा पर कई आरोप लगाये लेकिन जनता को यह जवाब नहीं दे सकीं कि इसी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, संगठन में अहम पद पाये, तब तक सब ठीक था, लेकिन टिकट नहीं मिला तो भाजपा बुरी कैसे हो गई?
इंदौर-तीन सीट अभी भाजपा के पास है और ऊषा ठाकुर यहां से विधायक हैं. लेकिन इस बार भाजपा ने यहां से एक नये और युवा चेहरे भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय को मैदान में उतारा है। लेकिन कांग्रेस के पास विकल्पों का अभाव साफ देखा जा सकता है कि पिछला चुनाव हारे अश्विन जोशी को ही उसने फिर टिकट दिया है। आकाश विजयवर्गीय क्षेत्र में अपने पिता के कारण काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन श्री विजयवर्गीय ने साफ कर दिया है कि वे अपने बेटे के लिए वोट नहीं मांगेगे। वह अपनी काबिलियत की बदौलत सीट जीतकर दिखाए।
दतिया सीट पर भाजपा के नरोत्तम मिश्रा मैदान में हैं। वे प्रदेश सरकार में मंत्री भी हैं और पार्टी की प्रदेश इकाई के नीति निर्धारण में विशेष स्थान रखते हैं। वे लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। पहले डबरा सीट से और अब दतिया में 2008 से उनका कब्जा है। कांग्रेस से उनके सामने राजेंद्र भारती हैं जिन्हें वे 2008 और 2013 में पहले भी हरा चुके हैं। राजेंद्र भारती जनता का तो दिल जीत नहीं सके हैं इसलिए साम-दाम-दंड-भेद के सहारे उन्हें हराना चाहते हैं, जिसके चलते उन्होंने उन पर ‘पेड न्यूज’ के आरोप भी लगाए, मामला अदालत में गया, पर नरोत्तम के खिलाफ कुछ सिद्ध न हुआ।
रीवा सीट पर प्रदेश मंत्री राजेंद्र शुक्ल मैदान में हैं। पिछला चुनाव उन्होंने बसपा उम्मीदवार कृष्ण कुमार गुप्ता को हराकर जीता था। शुक्ल यहां से 2003 से जीत रहे हैं और एकतरफा जीत रहे हैं। अपने प्रतिद्वंद्वी से दोगुने से अधिक मत पाते हैं। कांग्रेस यहां मुकाबले में कभी नहीं रही है। जहां राजेंद्र को 50 प्रतिशत से अधिक मत मिलते हैं तो कांग्रेस को पिछले चुनावों में महज 17 फीसद मत मिले थे। 2008 में भी मुकाबले में बसपा थी। कांग्रेस को यहां से प्रत्याशी नहीं मिला तो उसने राजेंद्र शुक्ल से निजी तौर पर नाराज रहने वाले अभय मिश्रा को मैदान में उतार दिया।
चौसर बिछ चुकी है और मोहरे रखे जा चुके हैं। 28 नवम्बर को सभी उम्मीदवारों का भाग्य मशीनों में दर्ज होकर 11 दिसम्बर को सबके सामने होगा।
वर्तमान दलीय स्थिति
कुल सीटें - 230
भाजपा - 165
कांग्रेस - 58
अन्य  - 07