राजस्थान: चुनावों में एक दूसरे का पत्ता साफ करने में जुटे कांग्रेसी
स्रोत:    दिनांक 27-नवंबर-2018
 - डॉ. ईश्वर बैरागी               
राजस्थान विधानसभा चुनाव में बहुमत का ख्याली पुलाव पकाती कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के साथ भाजपा के विरुद्ध चुनाव मैदान में उतरी तो है लेकिन उसका मुकाबला भाजपा से नहीं, बल्कि अपने ही नेताओं से है। राज्य में कांग्रेसी एक-दूसरे का पत्ता साफ करने में जुटे हुए हैं। पार्टी में हवाई मुख्यमंत्री पद के लिए खींचतान अलग से है
 
राजस्थान में चुनाव प्रचार करती वसुंधरा राजे
राजस्थान में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार जोर पकड़ने लगा है। भाजपा-कांग्रेस समेत सभी प्रमुख दल अपने पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। राज्य की सियासी जमीन पर केवल भाजपा और कांग्रेस ही फल पाई हैं। अन्य दलों का अस्तित्व राजस्थान में नहीं के बराबर रहा। टिकट बंटवारे के बाद भाजपा-कांग्रेस में शुरू हुए सियासी ड्रामे का अब पटाक्षेप हो रहा है। टिकट न मिलने से नाराज बागी नेताओं के मान-मनौवल का दौर भी खत्म होने को है।
कांग्रेस ने चुनाव में 195 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है और पांच सीटें अपने सहयोगी दलों को दी हैं। इस बार कांग्रेस ने 110 नए चेहरों को मैदान में उतारा है। इनमें अजमेर से सांसद रघु शर्मा को केकड़ी और अलवर सांसद डॉ. करण सिंह यादव को किशनगढ़बास से उम्मीदवार बनाया गया है। वहीं, पिछले दिनों भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए सांसद हरीश मीणा को देवली उनियारा से टिकट मिला है। कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय के 15 नेताओं को टिकट दिए हैं। इनमें तीन महिलाएं भी हैं।
दूसरी ओर, भाजपा राज्य की सभी 200 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है। सत्ताधारी भाजपा ने 97 नए चेहरों पर भरोसा जताया है। पार्टी ने अपने 160 विधायकों में से 68 विधायकों के टिकट काटे हैं और 92 विधायकों को फिर से मौका दिया है। जिनके टिकट कटे हैं, उनमें छह मंत्री भी शामिल हैं। इनमें दो मंत्रियों के बेटों को टिकट मिला है। भाजपा ने बाड़मेर से सांसद सोनाराम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है और एक मुस्लिम उम्मीदवार को भी टिकट दिया है। राज्य में करीब 50 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। कई सीटों पर उनकी संख्या 40 हजार से भी ज्यादा है। टिकट बंटवारे के बाद प्रदेश की राजनीति में भाजपा का ग्राफ तेजी से उपर चढ़ा है। वहीं, कांग्रेस की स्थिति लौह नियम की तरह हो गई है, जहां अपने ही अपनों को काट रहे हैं।
कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान न कर एक साथ कई प्रमुख जातियों को साधने की कोशिश की है। कांग्रेस के इस निर्णय के बाद हर एक जाति के क्षत्रप को लगता है कि वह मुख्यमंत्री बन जाएगा। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा, ‘‘राजस्थान में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में लालचंद कटारिया, सचिन पायलट, सीपी जोशी, गिरिजा व्यास और रघु शर्मा भी हैं। कई बार चुनाव प्रचार कमेटी (कैंपेनिंग कमेटी) के चेयरमैन भी मुख्यमंत्री बन जाते हैं। सभी नेताओं को पार्टी आलाकमान पर विश्वास रखना चाहिए और पार्टी आलाकमान जो निर्णय ले, उसे मानना चाहिए।’’ यानी अंदरखाने कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर जो घमासान मचा है, उसे राज्य के मतदाता भी भली प्रकार महसूस कर रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी भी गाहे-बगाहे जाट मुख्यमंत्री का मुद्दा उछालकर खुद को इस दौड़ में बहुत पहले ही शामिल कर चुके हैं।
राजस्थान में कांग्रेस की हालत एक पार्टी से ज्यादा समूह की हो गई है। समूह का कोई एक चेहरा नहीं होता, विचारधारा नहीं होती। लोग मतलब के लिए इकट्ठा होते हैं और भीड़ की शक्ल ले लेते हैं। वैसे ही राज्य में कांग्रेस का कोई एक चेहरा नहीं है। भले ही सचिन पायलट प्रदेश अध्यक्ष हों, लेकिन पुरानी पीढ़ी के नेता उन्हें स्वीकार ही नहीं करते। ऐसे कई कारण हैं, जिससे प्रदेश की जनता कांग्रेस के हाथों में सत्ता की चाबी देने से पहले सोचेगी। टिकट बंटवारे के दौरान दिल्ली में कांग्रेस नेताओं की लड़ाई खुलकर सामने आई थी। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बिछाई चौसर में पायलट और डूडी फंसते नजर आए। जो पायलट-डूडी पहले गहलोत के बारे में गलबहियां डालकर बात किया करते थे, आज वही गहलोत, पायलट और डूडी को समझाते नजर आ रहे हैं।
 
राजस्थान की राजनीति पिछले दो दशक से राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत की उंगलियों पर नाचती है। गहलोत की इस महारत के आगे किसी जमाने में दिल्ली की राजनीति में सिमटे नटवर सिंह और राजेश पायलट जैसे नेता हों या फिर नारायण सिंह, बीडी कल्ला और सीपी जोशी जैसे स्थानीय नेता, सब उनके सामने बौने साबित हुए। आज राजनीति में छवि मायने रखती है। आम जनता से सहजता से जुड़ना और गरीबों-जरूरतमंदों के दुख-दर्द में शामिल होना गहलोत की सबसे बड़ी पूंजी रही है। इसी पूंजी के बल पर राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने राज्य की राजनीति में मुखर मिर्धा, ओला, मदेरणा परिवारों को किनारे लगा दिया। लेकिन बीते दो दशक में राजनीति के तौर-तरीके बदले हैं। इनके सामने नई पीढ़ी का एक नौजवान सचिन पायलट के रूप में चुनौती बनकर खड़ा है। राजस्थान कांग्रेस में जो हालात बने हैं, उन सबके जिम्मेदार स्थानीय नेता ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी हैं। जब नेतृत्व कमजोर होता है तो उसके निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है। ऐसे में वह कई बार परिस्थितियों को भाग्य के सहारे छोड़ देता है। जब कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची आई तो कौन कहां से आया, यह समझने में ही घंटों लग गए। कई उम्मीदवारों को तो सामने आकर यह कहना पड़ा कि हमने टिकट खरीदे नहीं, बल्कि हम राजस्थान कांग्रेस के सदस्य रहे हैं।
मेवाड़ हो, मारवाड़ या फिर जयपुर, हाड़ौती, बीकानेर या भरतपुर संभाग, हर जगह ऐसे उम्मीदवार उतारे गए हैं। उनके बारे में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लोगों को घर-घर जाकर बताना पड़ेगा कि इनका कांग्रेस से क्या रिश्ता रहा है। यहां तक कि भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए मानवेंद्र सिंह को जैसलमेर और बाड़मेर से लाकर झालरापाटन से उम्मीदवार बना दिया गया। इसके बाद वहां स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ही मानवेंद्र का विरोध शुरू कर दिया। कांग्रेस ने दो बार हारने वालों का टिकट काटा, लेकिन ऐसे उम्मीदवार को टिकट दिया गया जिनके पास कोई आधार नहीं है। दो बार हारने वाले प्रभावी नेताओं को संतुष्ट करने के लिए उनकी पत्नियों को टिकट थमाया गया है। राज्य में कांग्रेस को 135 सीटों की लहर पर सवार नेता यह मानकर चल रह हैं कि यदि उन्हें 90 और 100 के बीच भी सीटें आ जाए तो हमारी सरकार बन जाएगी। लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा है कि अगर 10 सीटें कम आ जाएंगी तो सरकार बनाने का सपना धरा रह जाएगा।
इन पांच सीटों पर रहेगी सबकी नजर
झालरापाटन: झालावाड़ जिले की झालरापाटन भाजपा की पंरपरागत सीट रही है। झालावाड़ शहर भी इसी सीट में आता है। झालावाड़ ऐसा जिला है, जिसके नाम से विधानसभा सीट नहीं है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे यहां से 2003 से चुनाव जीतती आ रहीं हैं। इस बार भी वे यहां से मैदान में हैं। यहां से उनके खिलाफ कांग्रेस ने भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह को टिकट दिया है। हालांकि राजे अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को कोई स्थानीय चेहरा नहीं मिल रहा था, इसलिए उसने बाहरी (मानवेंद्र) को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, मानवेंद्र ने कहा कि वे वसुंधरा के खिलाफ चुनौती स्वीकार करते हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में राजे 60,869 वोटों से जीती थीं। उन्होंने कांग्रेस की मीनाक्षी चंद्रावत को शिकस्त दी थी।
टोंक : नदी के ठीक दक्षिण में बसे टोंक शहर की सियासत में चार दशक बाद बड़ा फेरबदल हुआ। इस मुस्लिम बहुल सीट पर कांग्रेस ने 46 साल बाद पहली बार हिन्दू प्रत्याशी के तौर पर प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को मैदान में उतारा है। वहीं, भाजपा ने 38 साल बाद गैर हिन्दू एवं मुस्लिम उम्मीदवार के बतौर सरकार में नंबर दो माने जाने वाले कैबिनेट मंत्री यूनुस खान को प्रत्याशी बनाया है। यहां दोनों ही प्रत्याशी बाहरी हैं, इसलिए यहां किसी को यह कहने का मौका नहीं मिलेगा कि दूसरे दल का प्रत्याशी बाहरी है। कांग्रेस 1972 से लेकर 2013 तक टोंक से केवल मुस्लिम प्रत्याशी उतारती रही है। उसने 46 साल के इतिहास में कभी भी हिन्दू को उम्मीदवार नहीं बनाया। वहीं, 1980 से लेकर 2013 तक भाजपा केवल हिन्दू को ही टिकट देती रही। भाजपा ने पहले यहां से अजीत सिंह मेहता को मैदान में उतारा था। लेकिन ऐन वक्त पर अपनी रणनीति बदलते हुए डीडवाना से विधायक और कैबिनेट मंत्री यूनुस खान को मैदान में उतारा। मकसद अल्पसंख्यक चेहरे के रूप में सचिन पायलट को टोंक में ही घेरना है। 2013 में यहां से भाजपा के अजीत सिंह 30,343 मतों से जीते थे।
सरदारपुरा : जोधपुर की सरदारपुरा सीट पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की परंपरागत सीट रही है। पिछले चार विधानसभा चुनाव से कांग्रेस इस सीट से जीतती आ रही है। सरदारपुरा से जीतकर गहलोत दो बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं। मोदी लहर के बावजूद जोधपुर की 10 सीटों में से केवल सरदारपुरा सीट ही कांग्रेस के खाते में गई थी। 1998 में चुनाव के दौरान कांग्रेस विधायक मानसिंह देवड़ा ने सरदारपुरा सीट से चुनाव जीता था। हालांकि बाद में उन्होंने अपनी सीट अशोक गहलोत के लिए खाली कर दी थी। 1999 में अशोक गहलोत ने यहां से चुनाव लड़ा, उसके बाद से आज तक वे हर बार चुनाव में यहां से खड़े होते हैं और जीत दर्ज करते हैं। पिछले चुनाव में भी भाजपा ने राजपूत समाज से शंभू सिंह खेतासर को टिकट दिया था, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। इस बार भी भाजपा ने खेतासर पर ही दांव लगाया है। सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र में माली जाति, अल्पसंख्यक ब्राह्मण और राजपूत सहित सभी जातियां रहती हैं, लेकिन माली और अल्पसंख्यक समुदाय की तादाद अच्छी-खासी है। इस क्षेत्र की जनता अशोक गहलोत को ही वोट देती आई है।
नाथद्वारा : राजसमंद जिले की नाथद्वारा सीट 2008 में उस समय चर्चा में आई थी, जब यहां से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार और तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी केवल एक वोट से चुनाव हार गए थे। इसके बाद गहलोत दूसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। जोशी ने पिछली बार विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा था। वे लोकसभा चुनाव हारे थे। इस बार भाजपा ने यहां से पिछले दिनों कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए महेश प्रताप सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया है। महेश प्रताप 11 साल बाद भाजपा में लौटे हैं। वे शेखावत सरकार में मंत्री रहे शिवदान सिंह के भतीजे हैं। शिवदान ने 1990 में डॉ. सीपी जोशी को हराया था। विधानसभा क्षेत्र में पिछले 40 साल से मौजूदा विधायक को दूसरा मौका देने का ट्रेंड रहा है। मतदाताओं ने 1980 से 2013 तक हर चुनाव में मौजूदा विधायक को जिताया, लेकिन कोई भी उम्मीदवार जीत की तिकड़ी नहीं लगा सका। यह विधानसभा सीट शुरू से ही सामान्य रही। प्रमुख राजनीतिक दलों ने पिछले 14 चुनावों में राजपूत और ब्राह्मण उम्मीदवारों पर ही दांव खेला। कांग्रेस ने जैन और गुर्जर को एक-एक बार उम्मीदवार बनाया था। 1952 के पहले चुनाव में विधानसभा क्षेत्र का नाम खमनोर था। 1957 में हुए दूसरे चुनाव के समय क्षेत्र का नाम बदल कर नाथद्वारा विधानसभा कर दिया गया। वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा के कल्याण सिंह ने इस सीट पर 12,472 मतों से जीत दर्ज की थी। हालांकि उसी साल उनका देहांत हो गया। 
 उदयपुर: सत्ता की सीढ़ी कहे जाने वाले मेवाड़ अचंल की उदयपुर शहर सीट पर सबकी निगाहें हैं। यहां करीब तीन दशक बाद भाजपा और कांग्रेस के दो बड़े नेता आमने-सामने हैं। प्रदेश की दोनों ही बड़ी पार्टियों ने इस बार हर सीट पर अपने सबसे ताकतवर योद्धाओं को मैदान में उतारा है। भाजपा ने यहां से लगातार तीन बार चुनाव जीत चुके प्रदेश के गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया पर एक बार फिर से अपना भरोसा जताया है। कटारिया के विजय रथ को रोकने के लिए कांग्रेस ने अपनी पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. गिरिजा व्यास को टिकट देकर मैदान में उतारा है, जो कटारिया को दो बार मात दे चुकी हैं।
करीब तीन दशक के बाद एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे डॉ. गिरिजा व्यास और गुलाबचन्द कटारिया उदयपुर संभाग की राजनीति में खासा दखल रखते हैं। उदयुपर शहर की बात करें तो यहां वर्ष 1977 के बाद हुए 9 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था और सात बार यहां कमल खिला है। हालांकि इस दौरान भाजपा के बड़े नेताओं के सामने कांग्रेस किसी मजबूत नेता को चुनावी मैदान में नहीं उतार पाई थी। इस बार का मुकाबला अब तक के चुनावी इतिहास का सबसे दिलचस्प मुकाबला होगा और कोई भी प्रत्याशी एकतरफा जीत दर्ज नहीं कर पाएगा। 2013 के विधानसभा चुनाव गुलाबचंद कटारिया ने 24,608 मतों से जीत दर्ज की थी।
 
वर्तमान दलीय स्थिति
कुल सीटें - 200
भाजपा - 162
कांग्रेस - 21
अन्य - 16