आतंकी संगठन आईएसआईएस में शामिल हो चुके हैं पीएफआई के कई लोग
स्रोत:    दिनांक 29-नवंबर-2018
इस्लामी गुट पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के कई गुर्गे कुख्यात आतंकी संगठन आई.एस.आई.एस. में शामिल हो चुके हैं। यही नहीं, इसके संचालकों में से कई पर गंभीर आरोप हैं। इसके बावजूद बहुत ही चालाकी से उस पर उदारवाद का आवरण चढ़ा दिया गया है
गुलबर्गा में प्रदर्शन करते पी.एफ.आई. के समर्थक। दरअसल, इनके समर्थकों पर अनेक तरह के आरोप लगते रहते हैं। इसलिए ऐसे प्रदर्शन आम हो गए हैं 
इस्लामिक गुट पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पी.एफ.आई.) की शुरुआत केरल में 2006 में हुई। बाद में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट (एन.डी.एफ.), कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी (के.एफ.डी.) और तमिलनाडु की संस्था मनिथा नीति पासाराई (एम.एन.पी.) का इसमें विलय हो गया। इसी तरह कुछ अन्य राज्यों के समविचारी संगठनों के साथ भी पी.एफ.आई. के संबंध हैं। 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा था। इसके बाद एन.डी.एफ. ने 2003 में केरल के मराड में आठ हिंदू मछुआरों का नरसंहार किया। एन.डी.एफ. पर प्रतिबंध लगने की बात चली तो उसने 2007 में अपना विलय पी.एफ.आई. में कर दिया। एन.डी.एफ. और पी.एफ.आई. में अंतर बस नाम का ही था। एन.डी.एफ. भी पी.एफ.आई. की तरह खुद को सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पित बताता था।
2007 में एन.डी.एफ. ने तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ कट्टरवादी संगठनों के साथ मिलकर बेंगलुरू में ‘एम्पावर इंडिया कॉन्फ्रेंस’ आयोजित कर खुद को पी.एफ.आई. में समाहित कर लिया। इस प्रकार असल पी.एफ.आई. का जन्म हुआ। पी.एफ.आई. जाति और पांथिक आंदोलनों को हवा देने में शामिल रहा है। इसके अध्यक्ष ई. अबुबकर ने अपने एक वक्तव्य में भीमा कोरेगांव घटना की निंदा की थी। किसी घटना की निंदा करना तो ठीक है, पर उसकी आड़ में किसी को भड़काना कुछ और ही संकेत करता है। बकर ने कहा था, ‘‘2014 में हिंदुत्ववादी शक्तियों के सत्ता में आने के बाद इस तरह की घटनाएं बढ़ गई हैं।’’ इस एकमात्र बयान से ही बकर की मंशा पता चल जाती है। गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी के साथ भी पी.एफ.आई. के संबंध हैं। गुजरात चुनाव के समय मेवाणी की एक तस्वीर चर्चा में आई थी जिसमें वे पी.एफ.आई. की राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया (एस.डी.पी.आई.) के सदस्यों से चेक प्राप्त करते नजर आ रहे। मेवाणी की जीत पर पी.एफ.आई. ने देशभर में जश्न मनाया था। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भी एस.डी.पी.आई., मेवाणी और कांग्रेस में तालमेल हुआ था।
वंचित, मुस्लिम, कुछ जनजातीय गुटों, पिछड़े, खालिस्तानी और अन्य जातिवादी गुटों को मिलाकर राष्टÑ विरोधी मुहिम चलाने की योजना कोई नई नहीं है। असल में इस योजना को ‘दी न्यू रेसेपी आॅफ इंडियन पॉलिटिक्स’ का नाम दिया गया था। इसे परवान चढ़ाने के लिए इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट, दिल्ली और बेंगलुरू के अलावा ‘दलित वॉयस’ जैसी कई संस्थाओं ने अनेक कार्यक्रम किए और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर साहित्य का प्रकाशन भी किया, जबकि इन संस्थाओं में कई को सरकारी अनुदान मिलता है।
‘दलित वॉयस’ के संपादक वी.टी़ राजशेखर ने ‘दलित साहित्य अकादमी’ द्वारा 1993 में प्रकशित अपनी किताब ‘इंडियाज मुस्लिम प्रॉब्लम’ में लिखा है, ‘‘भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी मुस्लिम हिंदू नाजियों द्वारा सताई हुई है।’’ वे यह भी लिखते हैं, ‘‘चर्च ने माना है कि भारत में 95 प्रतिशत ईसाई वनवासी वंचित हैं। इसका मतलब यह है कि भारत के समस्त वंचित, मुस्लिम, वनवासी, पिछड़े, सिख और अन्य अल्पसंख्यकों का आपस में खून का रिश्ता है। इसीलिए इनमें राजनीतिक एकता की जरूरत है।’’
उन्होंने इसी क्रम में आगे कहा, ‘‘सिमी को इस विषय पर बहुत ही गंभीरता से काम करने की जरूरत है। भारत के मुसलमानों के ऊपर दो महती जिम्मेदारियां हैं। एक, अपने खून के संबंध वाले भाइयों यानी वंचित, मुस्लिम, वनवासी, पिछड़े, सिख और अन्य अल्पसंख्यकों को नाजी आर्यों से आजाद करवाएं। दूसरी जिम्मेदारी यह है कि इस्लाम ने सिमी के ऊपर यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वह इनको आजाद करवाए।’’ किताब के अंत में राजशेखर यह धमकी देने से नहीं चूकते, ‘‘भारत में मुसलमान 15 प्रतिशत हैं और अगर पुन: ‘बाबरी मस्जिद’ को बनाने नहीं दिया गया तो भारत एक भयंकर युद्ध के लिए तैयार रहे, जिसमें भारत के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।’’ पी.एफ.आई. रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों को भी मदद करता है, जबकि भारत सरकार उन्हें निकालने की बात कर रही है। दक्षिण 24 परगना (पश्चिम बंगाल) जिले के हरदा गांव में इन घुसपैठियों के लिए एक शिविर चलता है। इसका संचालन ‘देश बचाओ सामाजिक कमेटी’ करती है। इससे जुड़ा हुसैन गाजी कहता है, ‘‘ एक बार वे (पी.एफ.आई. वाले) हमसे मिलने आए और दो बार हम उनकी बैठकों में शामिल हुए।’’ गाजी का यह भी कहना है कि पश्चिम बंगाल पी.एफ.आई. के नेताओं ने उसके शिविर को मदद देने का वायदा किया है।
गाजी को उम्मीद है कि ममता बनर्जी की सरकार रोहिंग्याओं के लिए मतदाता पहचान पत्र/आधार कार्ड की व्यवस्था करेगी, ताकि वे सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा सकें और सही तरीके से जीवन-यापन कर सकें।
पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के महासचिव एम. मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने दस्तावेज ‘इश्यू एंड व्यूज’ के 34 पृष्ठ के आलेख में इसे नव-सामाजिक आंदोलन करार दिया है, जो हाशिए पर पड़े लोगों को शक्ति प्रदान करता है। इस दस्तावेज में अंतरराष्ट्रीय, मानवाधिकार, सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे, पॉपुलर फ्रंट के कार्यक्रम और संकल्पों का उल्लेख है। इसमें कई मुद्दों जैसे कि ‘रोहिंग्याओं का जातीय संहार, चीन में उइगर मुस्लिमों के उत्पीड़न, ‘अफस्पा’ का निरस्तीकरण, निर्दोषों की रिहाई, वंचितों पर जातीय अत्याचार की निंदा, ‘बाबरी मस्जिद’ मुद्दा, एनआईए संघ परिवार का ही एक संगठन, समान नागरिक संहिता का विचार त्यागना, असहिष्णुता, टीपू सुल्तान की अवमानना की निंदा, नव-औपनिवेशिक खतरे’ आदि की चर्चा है। जून, 2018 में गृह मंत्रालय द्वारा झारखंड सरकार को लिखे गए एक ख़ुफिया पत्र में कहा गया था, ‘‘अंजनी कुमार मल नामक एक व्यक्ति ने पी.एफ.आई. और माओवादियों से संबंधित संगठन मजदूर संघर्ष समिति (एम.एस.एस.) के वकीलों को झारखंड उच्च न्यायालय में एक साथ लाने का काम किया था, वहीं प्रधानमंत्री की हत्या के प्रयास को मुख्य षड्यंत्रकारी रोना विल्सन और वसंता कुमारी ने झारखंड सरकार के द्वारा पी.एफ.आई. पर लगाए गए प्रतिबंध को हटवाने की कोशिश की थी। साथ ही ‘पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स’, जिसे माओवादी समर्थक के रूप में जाना जाता है, ने भी प्रतिबंध हटाने की मांग की थी।’’ इस रपट में यह भी कहा गया है कि पूर्व में पी.एफ.आई. और माओवादी संगठन ने साथ मिलकर केरल में ‘एंटी फेक एनकाउंटर फ्रंट’ और ‘एंटी अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट फोरम’ नामक संगठनों के छद्म नाम से सरकार के विरुद्ध एक खास प्रकार का दुष्प्रचार करने का प्रयास किया था।
पी.एफ.आई. के साथ मानवाधिकार, सांस्कृतिक और मीडिया से जुड़े कुछ लोग हैं, जो उसके काम को प्रचारित करते हैं। पी.एफ.आई. का आनुषांगिक संगठन एन.सी.एच.आर.ओ., पीपुल्स यूनियन फॉर ह्यूमन राइट्स चेन्नई, पीपुल्स डेमोक्रेटिक फोरम बेंगलुरु, कमेटी फॉर प्रोटेक्शन आॅफ डेमोक्रेटिक राइट्स, मुंबई, विद्रोही मैगजीन, मुंबई, कबीर कला मंच पुणे और भारत मुक्ति मोर्चा जैसी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को मिलाकर एक तथ्य अन्वेषण दल बनाया जाता है और यह दल किसी दंगाग्रस्त इलाके का दौरा कर एक रपट तैयार करता है। उसमें सारा दोष भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कुछ ऊंची जातियों पर मढ़ दिया जाता है। इन मनगढ़ंत रपटों को देश-दुनिया में प्रचारित किया जाता है। असल में पी.एफ.आई. जो कर रहा है, उसकी योजना उसके जन्म से बहुत पहले ही बन गई थी। इस योजना को अलग-अलग समय में अलग-अलग प्रकार के संगठनों द्वारा आगे बढ़ाया गया और जब संगठन को किसी भी प्रकार की दिक्कत होती है तो तुरंत पूरे कार्यकलाप को किसी दूसरे संगठन में स्थानांतरित कर दिया जाता है। संदेह नहीं कि आने वाले समय में पी.एफ.आई. भी ऐसा ही करने वाला है।
(लेखक पी.एफ.आई. पर शोध कर रहे हैं)