समाज के लिए सेवा-साधना
   दिनांक 05-नवंबर-2018

 
कल्पना कीजिए, देश के एक जाने-माने सैल ट्रांस्प्लांट सर्जन की व्यस्तता की। हम बात कर रहे हैं कानपुर के विनम्र स्वभावी और सेवाभावी डॉ. अमरनाथ सारस्वत की। शहर के सुप्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक्स सर्जन, जिनके आजाद नगर जैसे संभ्रांत इलाके में स्थित अस्पताल डॉ. अमरनाथ सारस्वत क्लीनिक मंे हड्डियों के रोग से पीडि़त मरीजों का तांता लगा रहता है। हैरानी की बात है कि पिछले 6 साल से डॉ. सारस्वत बिना नागा महीने का चौथा सप्ताहांत समाज सेवा को समर्पित करते आ रहे हैं। यहां डॉक्टर और अध्यात्म का मेल अक्सर अचरज पैदा करता है, लेकिन आध्यात्मिकता की खोज में अखिल विश्व गायत्री परिवार के संपर्क में आने के बाद तो जैसे उनका जीवन ही सेवामय हो गया। वे डॉक्टरी के पेशे में तो हैं, लेकिन सेवाभाव से। इसी वजह से वे हर माह के दो दिन शांति कुंज, हरिद्वार के आरोग्य केन्द्र में जाकर मरीजों की तीमारदारी करते हैं। इसकी प्रेरणा कहां से मिली, यह पूछने पर वे बताते हैं, ''हरिद्वार स्थित शांति कुंज के अनुष्ठानादि में जाना होता था तो वहां के श्री राम शर्मा जन्म शताब्दी अस्पताल में देखा, कोई ऑर्थोपेडिस्ट नहीं है। तभी सोच लिया कि यहां अपना योगदान देंगे। गुरुदेव डॉ. प्रणव पंड्या की प्रेरणा से जुट गए सेवा में।'' वह दिन है और आज का दिन, डॉ. अमरनाथ को जैसे लाग लग गई हो दूसरों की सेवा की।
कानपुर के क्लीनिक में नियमित आने वाले मरीज भी जानते हैं कि महीने के कौन से सप्ताहांत में डॉ. साहब तीन दिन के लिए शहर से बाहर जाएंगे इसलिए वे उसी अनुसार दवा-परामर्श पहले से ले लेते हैं। शहर में भी डॉ. अमरनाथ के मित्र-परिकर पर अनकी सह्दयता और सेवाभावना जैसे जादुई असर करती है और वे खुले दिल से उनकी तारीफ करते हैं।
 
ऐसा संभव ही नहीं था कि ऐसे व्यक्ति के साथ रहने वाली उनकी धर्मपत्नी पर उनके इस सद्गुण का प्रभाव न पड़ता। डॉ. संगीता सारस्वत कानपुर की प्रसिद्ध गाइनोकॉलोजिस्ट यानी स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं और साथ ही गायत्री परिवार के संस्कार अभियान की प्रदेश संयोजक भी। मतलब यह कि हफ्ते के 5 दिन अस्पताल की भागमभाग के लिए हैं तो 2 दिन इस अभियान के तहत गर्भवती महिलाओं को आने वाले बच्चे को गर्भ में ही संस्कारित करने के प्रबोधन के लिए आरक्षित हैं। कैसे कर पाती हैं इतना सब कुछ? यह प्रश्न सुनकर वे हंसते हुए बोलीं,''लगन सब करा लेती है और समाज के लिए वक्त निकालना तो हम सबकी जिम्मेदारी है। क्यों?'' डॉ. संगीता के इस सेवा भाव के कारण ही शायद 'आओ गढ़ें संस्कारवान पीढ़ी' के संस्कार प्रबोधन कार्यक्रम में उनके सहयोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। पुंसवन संस्कार (गर्भाधान अनुष्ठान) का यह अभियान गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंड्या और उत्तर प्रदेश के चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग की पूर्व महानिदेशक डॉ. गायत्री शर्मा की सीधी देखरेख में चलता है। इस संस्कार के बारे में डॉ. संगीता बताती हैं, ''हम गर्भवती महिलाओं को समझाते हैं कि अगर अभिमन्यु को गर्भ में संस्कार मिल सकते हैं तो किसी भी गर्भस्थ शिशु को संस्कारित किया जा सकता है। इसके लिए हम उस महिला को योग, ध्यान, समाधि, जप, यज्ञ, संगीत आदि के जरिए सकारात्मक ऊर्जा पैदा करने की विधि बताते हैं। यह हमारी वैदिक ज्ञान परंपरा का ही अंग है। इस सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। अनेक वैज्ञानिक शोध इसे साबित कर चुके हैं।'' प्रदेश संयोजक बनने से पहले डॉ. संगीता ने हर महीने शांति कुंज, हरिद्वार जाकर इस कार्य का प्रशिक्षण लिया है। उनके अनुसार आजकल की भागमभाग भरी जीवनचर्या में बड़े पैमाने पर यज्ञ करने की सुविधा न हो तो भी 5 या 24 दीपक जलाकर दीप यज्ञ करके वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भरा जा सकता है। इसके अच्छे नतीजे मिले हैं। वे बताती हैं, ''पुंसवन संस्कार को अपनाने वाली अनेक महिलाओं ने बताया है कि उनके बच्चे दूसरे बच्चों की तुलना में कहीं शांत और तेज दिमाग वाले हैं। और इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि अच्छे वातावरण और संस्कारित जीवनशैली का शिशु पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता ही है।''
सारस्वत दंपती एक अनोखा उदाहरण है कि कैसे समाज में उसकी रीति-नीति से रहते हुए भी समाज के जरूरतमंद वर्ग के लिए अपना समय और संसाधन लगाना भारत की परंपरा रही है। सिर्फ और सिर्फ धन कमाने में समय लगाना उद्देश्य न होकर अपने हुनर को सबके साथ, सबके भले के लिए साझा करना कहीं ज्यादा श्रेयस्कर होता है।