आर्थिक क्षेत्र में कैसे मजबूत हो रहा भारत
स्रोत:    दिनांक 10-दिसंबर-2018
पिछले चार साल में भारत ने आर्थिक पायदानों पर जिस तेजी से आगे की तरफ कदम बढ़ाए हैं, वह असाधारण है। व्यापार की सुगमता हो या लाल फीताशाही से छुट्टी, भारत में अब विदेशी निवेशकों के लिए एक सकारात्मक माहौल दिखता है
कारोबार का बढ़ता व्याप: दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन (बाएं) के साथ नोएडा (उ. प्र.) में सैमसंग की नवनिर्मित निर्माण इकाई का निरीक्षण करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (फाइल चित्र)
राजनीतिक नियमों से भी ज्यादा ठोस होते हैं आर्थिक नियम यानी जिसकी हैसियत बढ़ती है उसकी ताकत अपने आप बढ़ती है। आर्थिक हैसियत राय या अनुमान का विषय नहीं होती, वह ठोस आंकड़ों के आधार पर तय होती है। भारत की आर्थिक हैसियत लगातार तेजी से बढ़ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि समस्याएं खत्म हो गयी हैं। बढ़ती हैसियत का मतलब सिर्फ यह है कि समस्याओं से निपटने के लिए आवश्यक ताकत में इजाफा हो रहा है।
महत्वपूर्ण आर्थिक खबर है कि ‘कारोबारी आसानी’ की विश्व सूची में भारत ने 100वें नंबर से छलांग लगाकर 77वें नंबर पर जगह बना ली है। देखा जाए तो, 2014 के बाद से भारत ने 65 जगहों की छलांग लगायी है। 2014 में इसमें भारत 142वीं पायदान पर था, तो 2018 में 77 पर आ गया है। यह अपने आप में बहुत बड़ी कामयाबी है। यह कामयाबी और चमकदार इसलिए भी हो जाती है कि भारत जैसे देश में तमाम बदलाव आसानी से नहीं आते। लगभग हर बड़े मसले पर कानूनी दांवपेंच, विरोध होते हैं।
लोकतंत्र की समस्याएं चीन ने भी कारोबारी आसानी के मामले में 32 पायदान की छलांग लगायी है, भारत की 23 पायदान की छलांग के मुकाबले। चीन कारोबारी योग्यता सूची में ‘टाप 50’ में शामिल है-चीन का नंबर है 46। भारत 77वें नंबर पर है। अब भारत को 50 की सूची में दाखिल होना है। पर चीन भारत से आगे है सिर्फ इस वजह से ही कारोबारी आसानी को लेकर भारत की उपलब्धियां छोटी नहीं हो जातीं।
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में छोटे से सुधार को लेकर ही बड़े बवाल-सवाल पैदा होते हैं। विपक्ष है, मीडिया है, अदालतें हंै, इन सबसे गुजरकर ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई सुधार हो पाता है। लोकतंत्र के अपने अनिवार्य झंझट होते हैं। चीन इस तरह के लोकतंत्र से मुक्त है। लोकतंत्र से मुक्ति कई मामलों में नीतियों के कार्यान्वन को गति दे देती है। वहां शीर्ष नेताओं को जो भी ठीक लगता है, उसे लागू करने में वह बहुत तेजी दिखा सकते हैं। तानाशाही की अपनी रफ्तार होती है जो भारत जैसे बड़े लोकतंत्र को उपलब्ध नहीं है। फिर भी चार साल में 65 पायदानों की छलांग बहुत बड़ी उपलब्धि है और इस उपलब्धि के लिए राजनीतिक नेतृत्व से लेकर नौकरशाही तक, हर वह तत्व बधाई का पात्र है जिसकी वजह से कारोबारी आसानी का यह स्तर संभव हुआ है।
आसानी की वजहें
पिछले साल के मुकाबले इस साल कारोबारी आसानी में जिन वजहों से बेहतरी आयी है, उनमें से एक वजह तो यह है कि उधार लेना अब पहले के मुकाबले आसान हो गया है। पिछले साल उधार मिलने में आसानी के मामले में भारत का 29वां दर्जा था, यह अब सुधरकर 22 पर आ गया है। कारोबार चलाने के लिए बिजली की खास भूमिका होती है। बिजली हासिल करने के मामले में पिछले साल भारत का दर्जा 29वां था, इसमें कुछ सुधार हुआ है और यह अब 24 पर है। निर्माण कार्य के लिए परमिट हासिल करने के मामले में बहुत जबरदस्त सुधार हुआ है। निर्माण कार्यों के लिए परमिट लेने के मामले में पिछले साल भारत का दर्जा 181वां था, इस बार इसमें जबरदस्त सुधार हुआ है और यह सुधरकर 52 पर आ गया है। यह बहुत ही शानदार सुधार माना जा सकता है। एक तरह से कहा जा सकता कि निर्माण कार्यों में नौकरशाही का तंत्र बेहतर हुआ है। यह आसान काम नहीं है। शीर्ष नेतृत्व राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाये और नौकरशाही उस इच्छाशक्ति को परिणामों में बदल दे, तब ठोस सुधार संभव होते हैं। तकनीक के इस्तेमाल ने कई प्रक्रियाओं को गति दी है, कई को पारदर्शी बनाया है।
मंजिलें और भी हैं
चीन इस ‘रैंकिंग’ में भारत से आगे है-46 नंबर पर, और मेक्सिको भी भारत से आगे है-54 नंबर पर। मैक्सिको भ्रष्टाचार और निकम्मी नौकरशाही के लिए कुख्यात रहा है। पर वहां भी सुधार हो रहा है। मैक्सिको और भारत में एक बुनियादी फर्क है कि पूरी दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था को एक परिपक्व लोकतंत्र के तौर पर देखा जाता है। भारत का उल्लेख एक तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था के तौर पर किया जाता है। मेक्सिको की छवि ऐसी नहीं है। दूसरी तरफ चीन का दर्जा भारत से बेहतर होने के बावजूद चीन में लोकतंत्र की अनुपस्थिति बहुत सी आशंकाओं को जन्म देती है। कुल मिलाकर नयी विश्व स्थिति में भारत खुद को एक बहुत मजबूत स्थिति में पेश कर सकता है।
 
भारत की यह नयी कारोबारी रैंकिंग विश्व बाजार में वैश्विक निवेशकों को लुभाने का एक बड़ा जरिया बन सकती है। इसका व्यापक प्रसार करने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पीछे नहीं हटेंगे, तमाम उपलब्धियों को दूर तक पहुंचाने का उनमें गजब का कौशल है। पर कुछ मसलों पर अब भी गहराई से चिंतन और काम जरूरी है। फर्मों के बंद होने और उनके दिवालिया होने के मामले अभी भी भारतीय कारोबारी जगत के लिए चुनौती हैं। बरसों बरस मामले खिंचते हैं। हाल में दिवालिया कानून के तहत कुछ कार्रवाई तेज गति से होती दिख रही है। पर इसकी गति को बढ़ाया जाना जरूरी है। कारोबार खोलने की आसानी के साथ कारोबार के निपटारे में भी आसानी होनी चाहिए। तब ही अर्थव्यस्था में गति बनी रहती है। भारत में संपत्ति के पंजीकरण के मामले में भी अभी गति आनी बाकी है। उसका भ्रष्टाचार मुक्त होना बाकी है। कर सुधारों की प्रक्रिया चल रही है, पर उसमें गति आ जाये तो भारत की ‘रैंकिंग’ पचास के उस पार जाने में आसानी होगी। भारत पहले ही तमाम किस्म की दौड़ों में इस कदर पिछड़ा हुआ है कि उसे अपनी रफ्तार और तेज करनी होगी। इसका मतलब यह नहीं है कि पिछले चार सालों की रफ्तार तेज नहीं है। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह रफ्तार भी अभूतपूर्व है, पर अभी काम इतना बाकी है कि कहीं थककर बैठने की गुंजाइश नहीं है। इसलिए जिस गति से सुधार अब तक चलते आ रहे हैं, उस गति को और तेज करके आगे की यात्रा तय की जानी चाहिए। अगले साल भारत शीर्ष पचास में हो, इस बात की कामना और प्रयास लगातार किये जाने चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने दिखाया है कि वह यह कर सकते हैं, उम्मीद है कि अगले लोकसभा चुनावों की तैयारियों में वह सुधारों की प्रक्रिया को धीमे नहीं पड़ने देंगे।
पारदर्शिता के फायदे
नोटबंदी की घोषणा को दो साल हो चुके हैं। बहुत कुछ बदला है अर्थव्यवस्था में। पेटीएम जैसे नाम अब परिचित हो गये हैं। पेटीएम के पास करीब 30 करोड़ प्रयोक्ता हैं। यानी इस देश की करीब चौथाई आबादी पेटीएम की प्रयोक्ता है। पेटीएम की प्रयोक्ता संख्या अमेरिका की जनसंख्या के लगभग बराबर है। पेटीएम ब्रांड अब अपनी पहुंच के दूसरे प्रयोग कर रहा है। म्यूचुअल फंड में सीधे निवेश के लिए इसका मोबाइल एप ‘पेटीएम मनी’ काम कर रहा है।
चौगुने से ज्यादा बढ़ोतरी
अगर पैसों के सारे डिजिटल लेनदेन का हिसाब लिया जाये तो नोटबंदी के बाद से अब तक आनलाइन लेनदेन में करीब 440 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है। अर्थव्यवस्था जितना आनलाइन तरीके से चलेगी उतना पारदर्शिता के लिहाज से बेहतर होता है।
करदाताओं में बढ़ोतरी
हालिया आंकड़ों के मुताबिक 2014-2015 से 2017-18 के बीच यानी करीब चार सालों में एक करोड़ रुपये सालाना से ज्यादा की आय दिखाने वाले व्यक्तिगत करदाताओं की संख्या में करीब 68 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 में ऐसे करोड़पति करदाताओं की तादाद 48, 416 थी , जो 2017-18 में बढ़कर 81,344 हो गयी।
इस खबर पर खुश हुआ जा सकता है कि चार साल में करीब 68 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2012-13 में कुल चार करोड़ 72 लाख करदाता थे, 2016-17 में ये बढ़कर 6 करोड़ 26 लाख हो गये। नोटबंदी के बाद की गयी कार्रवाइयों में 5,400 करोड़ रुपये की अघोषित आय पकड़ में आयी। 2016-17 में कर व्यवस्था में करीब 90 लाख नये करदाता जुड़े। हर साल जितने करदाता आमतौर पर बढ़ते हैं, उसके मुकाबले यह करीब 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। यह सब नोटबंदी के चलते हुआ, लोगों के मन में डर पैदा हुआ कि सरकार कुछ कड़े कदम उठा सकती है। इसलिए सरकार का कर आधार व्यापक हुआ है। कुल मिलाकर नोटबंदी ऐसी गोली दागना साबित हुई, जो निशाने पर ना लगने के बावजूद कुछ सकारात्मक परिणाम लेकर आयी। इसका एक सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि लोग नकदहीन अर्थव्यवस्था की तरफ उन्मुख हुए। नकद-न्यूनतम अर्थव्यवस्था के कई फायदे हैं, कालेधन के नये सृजन पर इसमें एक हद तक रोक लग जाती है।
ताकत की चिंताएं
समझदार लोग जानते हैं कि ताकत का एक स्रोत आर्थिक ताकत में निहित होता है। भारतीय ब्रांडों का मजबूत होना कहीं ना कहीं उन ताकतों को परेशान करता है, जो भारत के मुकाबले खुद को ही ज्यादा मजबूत देखना चाहती हैं। खुद को मजबूत करने का हक सबको है, पर हितों का टकराव उन क्षेत्रों में बहुत ज्यादा होता है, जहां बरसों से कुछ ब्रांडों को चुनौती ही ना मिली हो। ऐसी सूरत में वे चुनिंदा ब्रांड अपनी हैसियत, अपनी ताकत को शाश्वत समझते हैं और जहां उन्हें चुनौतियां मिलती हैं, वहां वे हरसंभव कोशिश करते हैं कि प्रतिद्वंद्वी भारतीय ब्रांडों को चुनौती दी जाये।
भारत से एक प्रतिद्वंद्वी ब्रांड रुपे कार्ड चुनौती पेश कर रहा है, मास्टर कार्ड जैसे बहुराष्ट्रीय ब्रांड के लिए। भारत में करीब चार करोड़ क्रेडिट कार्ड हैं और करीब 98 करोड़ डेबिट कार्ड हैं, इनमें से करीब आधे कार्ड भारतीय रुपे कार्ड सिस्टम के तहत आते हैं। यह बात मास्टर कार्ड समेत तमाम विदेशी कार्ड सेवाओं को चुभती है। बरसों बरस वीसा, मास्टर कार्ड जैसे विदेशी ब्रांड ही इस क्षेत्र में पैठ बनाये हुए हैं। अमेरिका की मास्टर कार्ड कंपनी ने अमेरिकन सरकार से शिकायत की है कि रुपे कार्ड को नरेंद्र मोदी राष्ट्रीयता के नाम पर बढ़ा रहे हैं। मास्टर कार्ड कंपनी का आशय यह है कि अमेरिकी सरकार को अपनी राष्ट्रीयता के नाम पर नरेंद्र मोदी को ऐसा करने से रोकना चाहिए। समझने की बात यह है कि जब कारोबार के विस्तार का वक्त होता है, तो तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां वैश्विक तौर-तरीकों की बात करती हैं और कहती हैं कि पूरी दुनिया एक है, पर जब उनकी कमाई पर किसी वजह से चोट पड़ती है तो उन्हें याद आने लगता है कि वे तो अमेरिकी कंपनी हैं।
अमेरिका विश्व का ताकतवर देश है उस ताकत का इस्तेमाल अमेरिकी कंपनियों के प्रतिद्वंद्वी ब्रांडों की पिटाई के लिए होना चाहिए। समझने की बात यह है कि कारोबार की दुनिया में राष्ट्रीयता का इस्तेमाल एक हद तक हो सकता है, किसी भी कंपनी को बाजार में टिकने के लिए सस्ती और बेहतर सेवाएं देनी होती हैं। राष्ट्रीयता के नाम पर विदेशी वोडाफोन कंपनी के ग्राहकों को सरकारी बीएसएनएल या एमटीएनएल की सेवाओं को प्रयोग करने के लिए प्रवृत्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए अमेरिकी कंपनी या किसी भी विदेशी कंपनी को अपनी सरकार से शिकायत के बजाय अपने उत्पादों को सस्ता और बेहतर बनाना चाहिए।
भारतीय उपभोक्ता सस्ते उत्पादों की ओर जाता है चाहे वह देशी हों या विदेशी। भारत के स्मार्ट फोन बाजार के पचास फीसदी से ज्यादा के हिस्से पर चीनी ब्रांडों का कब्जा है। यह अलग बात है कि अब भारत में बिकने वाले कुल मोबाइल में करीब 94 प्रतिशत भारत में बन रहे हैं। उनमें से कई ब्रांड भले ही चीनी हैं, पर उनका निर्माण भारत में ही हो रहा है। भारतीय सस्ते चीनी फोन की तरफ जा रहे हैं। यानी बाजार में राष्ट्रीयता या देशभक्ति की एक सीमित भूमिका है, वहां तो कोई भी ब्रांड लंबे समय तक अपनी क्षमताओं के आधार पर ही टिक सकता है। इसलिए मास्टर कार्ड समेत तमाम विदेशी ब्रांडों को अपनी सेवाएं सस्ती और बेहतर करनी चाहिए। भारतीय ब्रांड हो या विदेशी ब्रांड, लंबे समय तक बाजार में टिकने के लिए उन्हें अपनी क्षमताएं पैदा करनी होंगी।इसमें संदेह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही है और विश्व की सबसे बड़ी और कुशल अर्थव्यवस्थाओं में अपना नाम दर्ज करा चुकी है।