जयंती विशेष: बालासाहब देवरस समरसता के मंत्रदाता
स्रोत:    दिनांक 11-दिसंबर-2018
यदि छुआछूत पाप नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है।'' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस के ये शब्द रूढि़ग्रस्त मन पर तगड़ी चोट करते हैं। झकझोरते हैं। ये शब्द आज भी मशाल बने हुए है। बालासाहब व्यावहारिकता के कठोर धरातल पर मजबूती से कदम जमाकर चलने वाले व्यक्ति थे। द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी स्वयंसेवकों से कहते थे कि आपमें से अनेक लोग हैं जिन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार को नहीं देखा है। आप बालासाहब को देखिए। आपको डॉ. हेडगेवार दिखेंगे।
श्री गुरुजी डॉ. हेडगेवार की खोज थे, तो बालासाहब डॉ. हेडगेवार द्वारा गढ़ा हुआ व्यक्तित्व। गुरुजी और बालासाहब का जोड़ अनोखा था। दोनों एक दूसरे के प्रति अत्यंत सम्मान का भाव रखते थे। एकबार गुरुजी ने बालासाहब का परिचय करवाते हुए कहा था ''जिनके कारण मैं सरसंघचालक कहलाता हूं ऐसे ये बालासाहब देवरस।''11 दिसंबर, 1915 को उनका जन्म हुआ था।
पूजा-पाठ और कर्मकांड उनके स्वभाव को रुचते नहीं थे, लेकिन कर्मयोगी थे, गीता कंठस्थ थी। मेघदूत तो उलटे क्रम में शब्दश: दोहरा देते थे। उन्होंने संघ में आज व्यवहार में आने वाली अनेक पद्धतियों का प्रारंभ किया था। 1925 में संघ का प्रारंभ हुआ। 1927 में वे संघ से जुड़े और अगले पांच दशकों तक संघ वृक्ष को सींचते रहे। डॉ हेडगेवार, गुरुजी और बालासाहब संघ के विकास के तीन चरण हैं- पहला चरण था संगठन का निर्माण और विकास, दूसरा चरण हुआ अलग-अलग क्षेत्रों में इसके प्रभाव का विस्तार, बालासाहब ने इस विस्तार को सामाजिक निहितार्थ प्रदान किया। संघ के स्वयंसेवकों को निर्देशित करते हुए उन्होंने कहा था,- ''संघ की शाखा खेल खेलने अथवा कवायद (परेड) करने का स्थान मात्र नहीं है, अपितु सज्जनों की रक्षा का बिन बोले अभिवचन है। तरुणों को अनिष्ट व्यसनों से मुक्त रखने वाला संस्कार पीठ है। समाज पर अकस्मात् आने वाली विपत्तियों अथवा संकटों में त्वरित, निरपेक्ष सहायता मिलने का आशा केंद्र है। महिलाओं को निर्भयता तथा सभ्य आचरण का आश्वासन है। दुष्ट तथा देशद्रोही शक्तियों पर अपनी धाक स्थापित करने वाली शक्ति है, और सबसे प्रमुख बात यह है कि समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सुयोग्य कार्यकर्ता उपलब्ध कराने हेतु योग्य प्रशिक्षण देने वाला विद्यापीठ है।''
1973 से 1994 तक उन्होंने सरसंघचालक के नाते संघ का मार्गदर्शन किया। इस दौरान अनेक ऐसी घटनाएं घटीं जिन्होंने देश के इतिहास को गहरे प्रभावित किया, फिर वह चाहे सारे देश को जेल में बदल देने वाला कुख्यात आपातकाल हो, देश में सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन लाने वाला राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन हो, या मंडल कमीशन के बाद बना वातावरण। इन सभी मौकों पर बालासाहब के सकारात्मक सामाजिक नेतृत्व को देश ने देखा।
 
आपातकाल विरोधी आंदोलन देश में परिवर्तन का प्रतीक बना। यह प्रतीक प्रतिक्रियावाद में न बदलने पाए, इस ओर से उन्होंने बड़ी सावधानी रखी, और 'भूल जाओ, माफ करो' कहकर आगे बढ़ने का इशारा किया। श्री राममंदिर आंदोलन हिन्दू स्वाभिमान का मुद्दा बना तो बालासाहब ने इसकी भूमिका को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू शब्द किसी विशेष पूजा पद्धति या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। जो भी भारत और भारत की संस्कृति में आस्था रखता है, वह हिंदू है। हिंदू शब्द बहुत व्यापक है। मंडल कमीशन के समय देश में गरमाते वातावरण पर उन्होंने सद्भावना के ठंडे छींटे मारे और संघ ने जाति आधारित आरक्षण के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। 'आरक्षण कब समाप्त होगा' इस प्रश्न पर उन्होंने कहा कि जब जातिगत भेदभाव के शिकार लोगों को लगने लगे कि आरक्षण की आवश्यकता नहीं रह गई है। उन्हें ही फैसला करना है। संघ के जन्मकाल से ही स्वयंसेवक सेवा और राहत के कार्यों में लगे रहे , परंतु समय के साथ इन सेवा कार्यों को सांगठनिक रूप देने की आवश्यकता अनुभव की गई। बालासाहब की ही प्रेरणा से 1979 में सेवाभारती का सूत्रपात हुआ। आज देशभर में संघ के स्वयंसेवक 1 लाख 55 हजार से ज्यादा सेवा कार्य संचालित कर रहे हैं। उन्होंने अनेक नई परंपराओं का सूत्रपात भी किया। श्रीगुरुजी डॉ. हेडगेवार के देहांत के बाद, स्वयं बालासाहब गुरुजी के देहत्याग के बाद सरसंघचालक बने। लेकिन उन्होंने अपने जीवित रहते हुए नूतन सरसंघचालक नियुक्त करने की प्रथा प्रारंभ की। संघ के कार्यक्रमों में भारतमाता के साथ प्रथम और द्वितीय सरसंघचालक का चित्र रखा जाता रहा है, बालासाहब ने स्पष्ट निर्देशित किया कि उनके बाद उनका चित्र न रखा जाए। प्रथम और द्वितीय सरसंघचालकों का दाहसंस्कार स्वयंसेवकों ने नागपुर के रेशिमबाग संघ कार्यालय में किया था। बालासाहब ने निर्देश दिया कि उनका अंतिम संस्कार सामान्य व्यक्ति की भांति श्मशान में किया जाए और उनकी समाधि न बनाई जाए। अंतिम दिनों में वे देह से अत्यंत अशक्त हो गए थे, फिर भी कार्यकर्ताओं से मिलने और उनकी चिंता-पूछताछ करने का उनका क्रम टूटा नहीं। 1993 में चेन्नई के संघ कार्यालय में जिहादी आतंकियों ने बम धमाका किया। अनेक स्वयंसेवकों समेत 11 लोगों ने प्राण गंवाए। बालासाहब को डॉक्टरों ने छोटी यात्रा करने के लिए भी सख्त मनाही कर रखी थी। व्हील चेयर के बिना एक पग नहीं रख सकते थे। लेकिन वे आग्रह करके नागपुर से चेन्नै गए और शोकसंतप्त परिवारों से 'देर से आने के लिए' भरे गले से क्षमा मांगी। 17 जून, 1996 को उन्होंने देहत्याग किया। उनका जन्म नागपुर में हुआ था, लेकिन मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले का कारंजा उनका पैतृक गांव है।