राममंदिर : पुनः प्रतिष्ठित हो भारत का गौरव
स्रोत:    दिनांक 12-दिसंबर-2018
- चम्पत राय                           
 
श्रीराम जन्मभूमि को प्राप्त करके राम मन्दिर के पुनर्निर्माण का संघर्ष शताब्दियों से चलता आ रहा है। अनेक पीढि़यों ने इस संघर्ष में अपना योगदान किया है। इस स्थान को प्राप्त करने हेतु 76 युद्धों का वर्णन इतिहास में दर्ज है। देश के अनेक बुद्धिजीवियों का यह मत है कि इस विषय का समाधान आपसी वार्तालाप अथवा न्यायिक प्रक्रिया द्वारा हो। अत: विश्व हिन्दू परिषद ने वार्तालाप के सभी माध्यमों द्वारा यह प्रयास किया कि भारत के मुस्लिम नेता हिन्दू समाज की भावनाओं को, आस्थाओं को जानें, समझें व आदर करें। जबकि अनुभव यह आया कि मुस्लिम नेतृत्व स्वयं अपनी ओर से, सदियों पुराने इस संघर्ष को समाप्त करके परस्पर विश्वास और सद्भाव का नया युग प्रारम्भ करने के लिए किसी प्रकार की पहल नहीं करता।
श्री चन्द्रशेखर के प्रधानमन्त्रत्विकाल में भारत सरकार की स्वागत योग्य पहल पर प्रारम्भ हुई द्विपक्षीय वार्ता में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई। 1 दिसम्बर, 1990 को अखिल भारतीय बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्यों के साथ विश्व हिन्दू परिषद के प्रतिनिधियों ने बिना किसी पूर्वाग्रह के वार्ता प्रारम्भ की। परिषद की ओर से श्री विष्णुहरि डालमिया, श्री बद्रीप्रसाद तोषनीवाल, श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित, श्री मोरोपंत पिंगले, श्री कौशलकिशोर, श्री भानुप्रताप शुक्ल, श्री आचार्य गिरिराज किशोर व श्री सूर्यकृष्ण उपस्थित रहे। 4 दिसम्बर, 1990 को दूसरी बैठक में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री क्रमश: श्री मुलायम सिंह यादव, श्री शरद पवार व श्री भैरोंसिंह शेखावत भी उपस्थित रहे।
इस बैठक में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के श्री जफरयाब जिलानी ने दावा किया कि-
1. किसी भी हिन्दू मन्दिर को तोड़कर उसी स्थल पर किसी मस्जिद के निर्माण के पक्ष में कोई भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
2. ऐसा कोई भी पुरातात्विक अथवा ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जिससे यह ज्ञात हो कि मस्जिद निर्माण के पूर्व इसी स्थल पर खड़े किसी मन्दिर को तोड़ा गया था। उन्होंने यह भी कहा कि विश्व हिन्दू परिषद का यह आन्दोलन एकदम नया है।
3. बैठक की कार्रवाई में यह दर्ज है कि कई मुस्लिम नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बाबर कभी अयोध्या नहीं आया, फलत: उसके द्वारा मन्दिर तोड़े जाने का प्रश्न ही नहीं उठता।
श्री मोरोपंत पिंगले ने सुझाव दिया था कि अगली बैठक में दोनों पक्षों की ओर से तीन-तीन, चार-चार विशेषज्ञों को सम्मिलित किया जाए, वे ही अपने पक्ष के प्रामाणिक साक्ष्य प्रस्तुत करें। राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भैरोंसिंह शेखावत ने सुझाव दिया था कि दोनों पक्षों के विशेषज्ञ इन प्रमाणों का परस्पर आदान-प्रदान करें और सत्यापन करें। इस पर श्री जिलानी ने कहा कि पहले समिति के सदस्य आपस में साक्ष्य सत्यापन कर लें तब विशेषज्ञों का सहयोग लें। श्री पिंगले ने सुझाव दिया कि इस विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए एक समय सीमा निर्धारित कर ली जाए।
इस पर निर्णय हुआ कि-
1.  दोनों पक्ष 22 दिसम्बर, 1990 तक अपने साक्ष्य गृह राज्यमंत्री को उपलब्ध कराएं।
2.  मंत्री महोदय साक्ष्यों की प्रतिलिपियां सभी संबंधित व्यक्तियों को 25 दिसम्बर,1990 तक उपलब्ध कराएं।
3.  इन साक्ष्यों के सत्यापन के पश्चात दोनों पक्ष पुन: 10 जनवरी, 1991 को प्रात: 10.00बजे मिलें।
द्विपक्षीय वार्ता का एक औपचारिक दस्तावेज गृह राज्यमंत्री के कार्यालय में तैयार हुआ। एक-दूसरे के साक्ष्यों का प्रत्युत्तर 6 जनवरी, 1991 तक देना था। विश्व हिन्दू परिषद ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के दावों को निरस्त करते हुए अपना प्रत्युत्तर दिया। जबकि बाबरी कमेटी की ओर से केवल अपने पक्ष को और अधिक प्रमाणित करने के लिए कुछ अतिरिक्त साक्ष्यों की फोटोप्रतियां दी गईं। कोई भी प्रत्युत्तर नहीं दिया। बाबरी कमेटी की ओर से प्रत्युत्तर के अभाव में सरकार के लिए यह कठिन हो गया कि सहमति और असहमति के मुद्दे कौन-कौन से हैं। 10 जनवरी, 1991 को गुजरात भवन में बैठक हुई। अन्य प्रतिनिधियों के अतिरिक्त विश्व हिन्दू परिषद की ओर से विशेषज्ञ रूप में प्रो. बी़ आर. ग्रोवर, प्रो. देवेन्द्र स्वरूप व डॉ. एस़ पी. गुप्ता सम्मिलित हुए। यह तय किया गया कि प्रस्तुत दस्तावेजों को ऐतिहासिक, पुरातात्विक, राजस्व व विधि शीर्षक के अन्तर्गत वर्गीकृत कर लिया जाए। यह भी तय हुआ कि दोनों पक्ष अपने विशेषज्ञों के नाम देंगे, जो संबंधित दस्तावेजों का अध्ययन करके 24 व 25 जनवरी, 1991 को मिलेंगे और अपनी टिप्पणियां 5 फरवरी, 1991 तक दे देंगे। तत्पश्चात् दोनों पक्ष इन विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर फिर से विचार करेंगे। पर बाबरी मस्जिद कमेटी ने अचानक पैंतरा बदलना शुरू कर दिया। कमेटी ने अपने विशेषज्ञों के नाम नहीं दिए।
18 जनवरी तक उन्होंने जो नाम दिए उसमें वे निरन्तर परिवर्तन करते रहे। 24 जनवरी, 1991 को जो विशेषज्ञ आए उनमें चार तो बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की कार्यकारिणी के पदाधिकारी थे व डॉ. आऱ एस़ शर्मा, डॉ. डी़ एऩ झा, डॉ. सूरजभान व डॉ. एम़ अतहर अली विशेषज्ञ थे। परिषद की ओर से न्यायमूर्ति गुमानमल लोढ़ा, न्यायमूर्ति देवकीनन्दन अग्रवाल, न्यायमूर्ति धर्मवीर सहगल व वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह चौधरी सरीखे कानूनविद् तथा इतिहासकार के रूप में डॉ.हर्ष नारायण, श्री बी़ आर. ग्रोवर, प्रो. के़ एस़ लाल, प्रो. बी.पी़ सिन्हा, प्रो. देवेन्द्र स्वरूप तथा पुरातत्वविद् डॉ. एस़ पी. गुप्ता उपस्थित थे। बैठक प्रारम्भ होते ही बाबरी कमेटी के विशेषज्ञों ने कहा कि हम न तो कभी अयोध्या गए और न ही हमने साक्ष्यों का अध्ययन किया है। हमें कम से कम 6 सप्ताह का समय चाहिए। यह घटना 24 जनवरी, 1991 की है।
25 जनवरी को बैठक में कमेटी के विशेषज्ञ आए ही नहीं। जबकि परिषद के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ दो घण्टे तक उनकी प्रतीक्षा करते रहे। इसके पश्चात् की बैठक में भी ऐसा ही हुआ। अन्तत: वार्तालाप बन्द हो गया। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने मुख्य मुद्दों का सामना करने की बजाए बैठक के बहिष्कार का रास्ता चुना। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का सुझाव आया है कि विषय आस्था से जुड़ा है अत: संबन्धित पक्ष आपस में मिल-बैठकर समाधान खोज लें। इस परिस्थिति में मुस्लिम समुदाय के पुराने अनुभव को देखते हुए सोचना पड़ता है कि यह कितना सार्थक होगा अथवा इससे कठिनाइयां और बढ़ेंगी। उचित तो यही है कि सर्वोच्च न्यायालय शीघ्र सुनवाई कर न्याय करें और भारत सरकार संसद में कानून बनाकर गुलामी के कलंक को सदा-सर्वदा के लिए समाप्त करें, समस्या का स्थायी समाधान हो और भारत के गौरव की पुन: प्रतिष्ठा हो।
(लेखक विहिप के अन्तरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)