भारत माता का दु:ख
स्रोत:    दिनांक 13-दिसंबर-2018
 - भानुप्रताप शुक्ल                      
अयोध्या राष्ट्रीय अखण्डता को अपने-अपने हानि-लाभ की तुला पर तौलने वालों के लिए चुनौती भी है और चेतावनी भी। अयोध्या देश और राष्ट्र की प्रतीति का प्रमाण पत्र है
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के प्रयास को लेकर तूफान खड़ा किया जा रहा है कि ‘‘यदि मन्दिर बना तो देश टूट जाएगा। देश के कोने-कोने में साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ेगा। देश रक्त की नदी में डूब जाएगा। श्रीराम मन्दिर का निर्माण भारत के सेकुलर चरित्र के विरुद्ध है, इसके कारण अल्पसंख्यक सम्प्रदाय देश से अलग हो जाएगा।’’ यह तूफान निर्माण करने का प्रयास 2 फरवरी, 1986 के बाद से विशेष रूप से किया गया उसके बाद 9-10 नवम्बर,1988 को शिलान्यास, 30 अक्तूबर, 1990 को सत्ता का दम्भ तोड़कर श्रीराम मन्दिर का शिखर ध्वजारोहण और 2 नवंबर,1990 को हौतात्मय आदि ऐसे प्रसंग रहे, जिनके कारण मुस्लिमपरस्त मुसलमान नेताओं ने देश को हिन्दू-मुस्लिम खेमे में बांट देने का हरसंभव प्रयास किया, यह प्रयास इस तथ्य को अनदेखा करके किया गया कि देश के निवासियों में मजहब और सम्प्रदाय का अभिमान जगाकर, देश के देवता के निवास स्थान को विवादित बताकर, जिस स्थान पर भारत राष्ट्र का प्रकाश पुरुष अवतरित हुआ था उसे आक्रमण और अपमान के स्मारक के रूप में अक्षत रखने का अभियान चलाकर एक देश की भूमि पर अनेक समानान्तर राष्ट्रों की आधारशिला रखेगा। एक साल बीता। 30 अक्तूबर,1991 को 30 अक्तूबर, 1990 के शौर्य दिवस की वर्षगांठ मनाई गई। 2 नवम्बर को हुतात्माओं को श्रद्धांजलि दी गई। देश के उस वर्ग ने देशमाता का प्राण स्पन्दन जिसके प्राणों की धड़कन है, इस दिन को जिस प्रेरणा और प्राण की शक्ति के साथ मनाया वह दिन आज नहीं तो कल राष्ट्र-पर्व अवश्य बनेगा। तथाकथित राष्ट्रीय एकता अभियान दल के छह मिनटीय नायक ने 31 अक्तूबर, 1991 को जो प्रदूषण पैदा किया, उसकी मारक दुर्गन्ध से देशवासी जितना शीघ्र मुक्त हो सकें उतना ही हितकर रहेगा। अगर यह ‘एकता अभियान दल’ अयोध्या न गया होता और इंका के श्री एम.जे. अकबर श्रीराम मन्दिर में चप्पल सहित प्रविष्ट न हुए होते तो रामभक्त उत्तेजित न हुए होते। शौर्य और हौतात्म्य दिवस के संवेदनात्मक प्रसंग को राजनीतिक कुटिलता का कलंक लगाने का प्रयास भी हुआ। 21 अक्तूबर, 1991 को कुछ रामभक्तों ने भावोद्रेक में श्रीरामलला के मन्दिर के शिखर पर भगवाध्वज फहराया तो अखबारों को पढ़कर ऐसा लगा कि ‘‘मानो इस कारण भयंकर भूचाल आ गया हो कि देश उलट-पलट हो गया हो।’’ यह ध्वारोहण श्रीराम कारसेवा समिति या श्रीराम जन्मभूमि न्यास की योजना का अंग नहीं था, तो भी श्रीराम मन्दिर पर भगवाध्वज फहराना कोई अपराध नहीं था और न ही उसकी निंदा करना किसी उदारता का परिचायक .
योजना और अनुशासन की बात अलग है, भावना और समर्पण का संदर्भ अलग। श्रीराम मंदिर को किसी हानि-लाभ के लेखे-जोखे के साथ जोड़ना सर्वथा अनुचित है। यह भारत राष्ट्र की राष्ट्रीयता और राष्ट्र का प्रतीक है, अत: इसे सत्ता व राजनीति की अंधी गली में न धकेलकर राष्ट्र और राष्ट्रीयता के साथ ही सम्बंध रहने देना उचित और हितकारी होगा।
फिर भी यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि जिन रामभक्तों ने 31 अक्तूबर, 1991 को श्रीराम मन्दिर पर भगवाध्वज फहराकर शौर्य दिवस मनाया उन्होंने निर्धारित पद्धति के अनुकूल आचरण नहीं किया। इसका अपना विशिष्ट महत्व है। 30 अक्तूबर, 1990 को श्रीराम मन्दिर पर ध्वज फहराना जनता दल और मुलायम सिंह की दम्भी सत्ता की चुनौती स्वीकार करके उसे उसकी औकात बता देने की योजना का अंग था। 31 अक्तूबर, 1991 का ध्वारोहण बिना किसी योजना एवं स्वीकृति के किया गया। परन्तु यह मानना होगा कि बिना किसी निश्चित योजना के श्रीराम मन्दिर के शिखरों पर फहराए गए ध्वजों में देशवासियों की भावनाएं एवं प्राण ध्वनि निहित थे। देशवासी चाहते हंै कि श्रीराम मन्दिर का निर्माण यथाशीघ्र प्रारंभ हो और उस भव्य मन्दिर में यथाशीघ्र उन्हें श्रीरामलला की अर्चना-आराधना करने का सुख-सौभाग्य प्राप्त हो। श्रीराम मन्दिर पर भगवाध्वज फहराना न कोई अपराध है और न ही संविधान या आचार-संहिता का उल्लंघन। जिस मन्दिर में श्रीराम की निरन्तर पूजा होती है, जहां घंटा-घड़ियाल बजते हैं, उस मन्दिर के शिखर पर श्रीराम का ध्वज होना ही चाहिए। इस पर आपत्ति करने का कोई औचित्य नहीं है, यह एक परम्परा का निर्वाह मात्र है।
दंगा कराने का प्रयास
किन्तु इस ध्वजारोहण को उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को कत्ल करने का हथियार बनाया गया। तथाकथित राष्ट्रीय मोर्चे और वाममोर्चे के घटकों, बाबरी मस्जिद कार्रवाई समिति, मुस्लिम लीग और भयभीत बुद्धिजीवियों ने कभी अलग-अलग तो कभी संयुक्त रूप से वक्तव्य दिए, धरने दिए, गिरफ्तारियां देकर ऐसा दृश्य निर्माण करने का असफल प्रयास किया मानो देश में कोई खूनी संषर्ष होने जा रहा है। प्रकारान्तर से इन सभी का यह प्रयास रहा कि देश, विशेषकर उत्तर प्रदेश में हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो और वे हिन्दू-मुसलमानों के खून से अपना राजनीतिक आटा सानकर अपनी सत्ता की रोटी सेकें। ये सभी प्रसंग ऐसे रहे कि इनके प्रकाश में देश की सेकुलरी राजनीति का पाखण्ड साफ-साफ दिखाई दिया। गत वर्ष सितम्बर महीने से ही तब की मुलायम सिंह की जनता दल सरकार ने उत्तर प्रदेश को अर्द्धसैनिक बलों की छावनी और पुलिस लाइन में परिवर्तित कर दिया था। आवागमन के सभी साधनों पर रोक लगा दी थी। रेलगाड़ियां बंद थीं। सड़कों पर बसें नहीं चलीं। साइकिल पर चलना भी दूभर हो गया। पैदल चलना खतरे से खाली नहीं रहा था। हर दस किलोमीटर पर सड़कों पर अवरोध लगे थे। हजारों वर्ष से चली आ रही अयोध्या की पंचकोषी परिक्रमा नहीं होने दी गई थी। उच्च न्यायालय के एक नहीं, दर्जनों आदेशों का उल्लंघन किया गया, श्री लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या नहीं जाने दिया गया, लाखों रामभक्तों को स्थायी और अस्थायी जेलों में केवल इसलिए बंदी बना दिया गया कि वे अयोध्या जाकर शांतिपूर्ण तरीके से श्रीराम मन्दिर पुनर्निर्माण का अपना अधिकार प्राप्त करना चाहते थे। सभी सरकारी अवरोधों और राजनीतिक विरोधों के बावजूद उस समय भी कारसेवकों ने अपने प्राण देकर ध्वजारोहण किया था किन्तु तब किसी कम्युनिस्ट, किसी जनता दलीय, किसी कांग्रेसी, किसी बुद्धिजीवी, मानवाधिकारों के किसी भी झण्डावाहक ने जनाधिकारों के हनन, संविधान के उल्लंघन, न्यायालय की अवमानना, धार्मिक स्वतंत्रता पर किए गए आघात के विरुद्ध कोई आवाज नहीं उठाई थी, तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के संविधान विरोधी कार्यों और नरसंहार करने के अपराध के फलस्वरूप उनकी सरकार को भंग करने की चर्चा तक नहीं की थी। हिंसक नक्सलपंथियों और अराजकतावादी आतंकवादियों की हत्या को मानवाधिकारों और सांविधानिक मान्यताओं का हनन मानने वाले तथाकथित मानवाधिकारवादियों को 2 नवम्बर, 1990 की अयोध्या हत्याकांड, कुछ भी नहीं लगा। जिन लोगों ने पीलीभीत में मारे गए आतंकवादियों के पक्ष में वक्तव्य दिए, लेख लिखे, आंदोलन की धमकी दी और कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर देने की मांग की, वे सभी अयोध्या हत्याकाण्ड पर मौन रहे थे। उस हत्याकाण्ड की न्यायिक जांच करके दोषियों को दंडित करने की मांग की अपनी परम्परागत तोता रटंत भी नहीं की। किन्तु उन्होंने कल्याण सिंह की सरकार के विरुद्ध अभियान चलाया। उनकी दृष्टि में भारत में रामभक्त होना अपराध है। हिन्दूहित की बात करना साम्प्रदायिकता है। राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्ध होना कट्टरपंथी होना है। राष्ट्रीय परम्परा के साथ जुड़ना देश में सांप्रदायिक दंगा कराना है।
वोट राजनीति की विवशता
इन सेकुलरिस्टों को केवल अयोध्या ही दिखाई देती है। इनकी दृष्टि कश्मीर, पंजाब, असम, आंध्र, तमिलनाडु आदि राज्यों में व्याप्त आतंकवाद नहीं देख पाती। ये बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों की सरपरस्ती तो करते हैं, किन्तु कश्मीर से भगा दिए, लाखों हिन्दू विस्थापितों की पीड़ा का इनके लिए कोई महत्व नहीं है। अयोध्या को लेकर दो बार राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक हो चुकी है किन्तु कश्मीर, पंजाब, असम, आंध्र और तमिलनाडु में फैले आतंकवाद और अलगाववाद के कारण राष्ट्रीय अखण्डता के लिए उत्पन्न चुनौती पर विचार करने के लिए राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक बुलाने का विचार तक उनके मन में नहीं उभरता। ऐसा क्यों है? क्यों अयोध्या को ये लोग देश-तोड़क कहते हैं और क्यों कश्मीर, पंजाब, असम, आंध्र आदि राज्यों में व्याप्त अतंकवाद को केवल आर्थिक समस्या मानकर मौन हो जाते हैं?
इस प्रश्न को केवल वोट राजनीति की विवशता या तुष्टीकरण कहकर टाला जा सकता है। इसमें सत्यांश भी हैं; किन्तु इतना ही नहीं है। इसमें यह एक मूलगामी प्रश्न निहित है कि देश और राष्ट्र की एकता की बातें करने, राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक बुलाने वाले साम्प्रदायिकता-विरोधी और सेकुलरिज्म का झंडा ढोने वालों को क्या देश, राष्ट्र, साम्प्रदायिकता और सेकुलरिज्म की प्रतीति है? इस प्रश्न का उत्तर मिल जाए तो अयोध्या और आतंकवाद का समीकरण बदल जाए। तब अयोध्या, कश्मीर, पंजाब, असम, आंध्र के आतंकवाद का उत्तर बनकर उभरती दिखाई देगी, और इस सत्य को सभी सहज भाव से स्वीकार कर लेंगे कि अयोध्या कश्मीर से जुड़ी है, उसका उसके संदर्भ से जुड़ा रहना ही राष्ट्रीय एकता की आश्वस्ति है। अयोध्या राष्ट्रीय अखण्डता को अपने-अपने हानि-लाभ की तुला पर तौलने वालों के लिए चुनौती भी है और चेतावनी भी। अयोध्या देश और राष्ट्र की प्रतीति का प्रमाण पत्र है।
(लेखक पाञ्चजन्य के सम्पादक रहे हैं। यह आलेख उनके ‘राष्ट्रचिंतन’ स्तम्भ के अंतर्गत पाञ्चजन्य के 7 नवम्बर, 1991 अंक में प्रकाशित हुआ था। 2006 में श्री शुक्ल का अवसान हुआ)