सच को दबाता सेकुलर मीडिया
स्रोत:    दिनांक 13-दिसंबर-2018
निजी स्वार्थों के लिए कुछ पत्रकार और मीडिया संस्थान सच को दबाकर झूठ परोसते हैं
 
कांग्रेस ने अपने 70 साल के शासनकाल में और कुछ किया हो या न किया हो, हर लोकतांत्रिक संस्था में अपने लोग जरूर बिठा दिए। यह एक ऐसा मकड़जाल है जिसकी सामान्य लोग कल्पना भी नहीं कर सकते। मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। सिर्फ पत्रकार ही नहीं, बल्कि कई बड़े मीडिया संस्थानों के मालिकों की पृष्ठभूमि पता करें तो उनकी जड़ें गांधी परिवार के आसपास ही मिलती हैं। यही वह मीडिया संस्थान और पत्रकार हैं जो किसी रक्षा सौदे में दलाली की खबर दबाने के बदले में करोड़ों रुपये के सौदे करते हैं। अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले की खबर भारतीय मीडिया तो दबा चुका था, लेकिन इटली में भंडाफोड़ होने के कारण बात भारत पहुंच गई। इस सौदे के बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल को भारत लाया गया, तो यह बात उभरी कि कुछ जाने-पहचाने पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की भूमिका बेहद संदिग्ध है। यह बात पहले ही सामने आ चुकी है कि इस सौदे में 45 करोड़ रुपये पत्रकारों के बीच बांटे गए थे। लेकिन इसका जिक्र मुख्यधारा मीडिया से गायब है। उन ‘सिग्नोरा गांधी’ और ‘एपी’ के बारे में भी कोई ज्यादा बात नहीं कर रहा, जिन्होंने अरबों रुपये की दलाली खाई। अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला कांग्रेस और मीडिया की सांठ-गांठ का आदर्श उदाहरण है, जिसकी परतें खोलने का जिम्मा सोशल मीडिया बखूबी निभा रहा है।
बुलंदशहर में मुसलमानों का एक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। बिना किसी पूर्व सूचना के उसमें लाखों लोग पहुंच गए जिससे पूरे शहर की व्यवस्था ठप पड़ गई। ट्रेनों और बसों को बंधक बनाया गया। सामान्य लोगों से मारपीट की गई। लेकिन क्या मजाल जो वहां से चंद किलोमीटर दूर दिल्ली की मीडिया ने इस सरेआम गुंडागर्दी की एक भी खबर दिखाई हो। लेकिन गोहत्या की घटना के बाद भड़की हिंसा और पुलिस के साथ झड़प के पीछे कौन लोग हैं ये मीडिया को फौरन पता चल गया। ज्यादातर चैनलों ने उग्र लोगों के लिए ‘हिंदुत्ववादी गुंडे’ जैसे विशेषणों का प्रयोग किया। प्रश्न उठता है कि ऐसे ही विशेषण मुसलमानों के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल किए जाते? उन मामलों में या तो खबर ही नहीं दिखाई जाती या दिखाई जाती है तो ‘समुदाय विशेष’ जैसे संबोधनों के साथ। कानून तो दोनों वर्गों ने तोड़ा है, फिर अलग-अलग रवैया क्यों? एबीपी न्यूज समेत कुछ चैनलों ने शुरू में बताया कि गोहत्या के बाद लोगों में गुस्सा भड़का और बात बढ़ गई। इधर विधानसभा चुनाव से जुड़ी खबरें मीडिया में छाई रहीं। राजनीतिक बयानबाजियों के अलावा ईवीएम को लेकर विवाद पैदा करना कांग्रेस की आदत बन चुकी है। लेकिन आश्चर्य तब होता है जब मीडिया इसमें बराबर का भागीदार बनता है। पिछले कुछ समय से भारत के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया को संदिग्ध बनाने की एक संगठित कोशिश चल रही है। कांग्रेस को इसमें मीडिया का भरपूर समर्थन मिला हुआ है। ईवीएम की गड़बड़ियों से जुड़े जितने भी आरोप लगाए गए चुनाव आयोग ने सभी के संतोषजनक उत्तर दिए। लेकिन मीडिया का सारा जोर झूठे आरोप दोहराने पर था, न कि चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण पर। वह मीडिया जो राहुल गांधी के मूर्खतापूर्ण बयानों को पूरी गंभीरता के साथ दिखाता है वह भाजपा नेताओं के सामान्य चुनावी भाषणों को भी विवादित बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। हनुमान को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक बयान को चैनलों ने कुछ इस तरह से काटकर चलाया मानो वह कह रहे हों कि ‘हनुमान जी दलित थे’। जबकि पूरा बयान सुनें तो समझ में आ जाता है कि योगी ने क्या कहा था।
राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में मुसलमानों की जनसंख्या में खतरनाक तरीके से बढ़ोतरी पर बीएसएफ की रिपोर्ट कुछ अखबारों में छपी। आम तौर पर किसी राज्य में चुनाव हो तो वहां से जुड़े मुद्दे मीडिया में अधिक जगह पाते हैं, लेकिन दिल्ली के तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया ने इस खबर को अनदेखा कर दिया। यह किसी से छिपा नहीं है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों को भी मीडिया पांथिक चश्मे से देखता है। इसी का नतीजा है कि वह हर उस खबर को दबाने में जुटा है जिससे लोगों को यह पता चलता हो कि देश का एक मजहबी समूह राजनीतिक कारणों से अपनी आबादी बढ़ाने में जुटा है।