संकेत और सबक
स्रोत:    दिनांक 14-दिसंबर-2018
क्‍या हार में क्‍या जीत में,
किंचित नहीं भयभीत मैं।
संघर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही वह भी सही।।
-शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ (वरदान माँगूँगा नहीं)
पांच राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम) के विधानसभा चुनाव नतीजे आ चुके हैं। मीडिया, सोशल मीडिया सब भारतीय जनता पार्टी पर बुरी तरह हमलावर दिखते हैं। जैसे परिणाम हैं, उसके मुकाबले भाजपा के प्रति आक्रोश कहीं अधिक अभिव्यक्त हो रहा है।
क्या यह अस्वाभाविक है? नहीं, यह होना ही था। भाजपा को अपनों के ताने और परायों के वार दोनों एक साथ झेलने पड़ रहे हैं। अपनों का अतिशय प्यार और विरोधियों की भाजपा से हद से ज्यादा नफरत इसका कारण है। इसलिए नतीजों के आने से पहले ही यह तय था कि लोकसभा चुनाव के लिए एक-एक दिन घटने के साथ भाजपा के लिए राजनीतिक माहौल में तीखापन लगातार बढ़ेगा। यह परिणामों से ज्यादा इसके बाद हवा बनाए जाने की रणनीति है जिसे अनजाने में ही सही, रूठे हुए भाजपा समर्थकों का गुस्सा और वजन दे रहा है। यदि आप विश्लेषण में गहरे उतरें तो पाएंगे कि भाजपा से नाराजगी के गुबार की पहेली दो शब्दों पर टिकी है-भ्रष्टाचार और विकास।
पहले बात भ्रष्टाचार की। घोटालों और हेराफेरी को यथासंभव थामे जिस तरह भाजपानीत सरकारें पिछले कुछ समय से काम करती रहीं उससे यह पार्टी ऐसे दलों को बुरी तरह चुभने लगी है जिनका खाद-पानी विचारधारा या देश की बजाय सिर्फ सत्ता और इससे रिसने वाले लाभ हैं। मिशेल-माल्या या हेराल्ड.. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की स्तरहीन भाषा और थोथे-ओछे आरोप इसी छटपटाहट का उभार हैं। ज्यादा साफ देखना हो तो गेस्ट हाऊस कांड के बाद सांप-नेवले जैसी दुश्मनी भुलाकर बसपा-सपा का एकजुट होने को देखिए, यह भी इसी बौखलाहट का एक अन्य आयाम है।
अब बात विकास की। विकास अच्छी बात है किन्तु लगातार सिर्फ विकास की ही बात करना देश की सबसे बड़ी पार्टी के संवेदनशील जनाधार को कहीं न कहीं खल गया। विकास दिखता है, उसके ठोस आंकड़े तर्क और तुलना की कसौटी पर भाजपा शासन को अन्य दलों के मुकाबले अतुलनीय ऊंचाई भी देते हैं, मगर इससे पूरी बात नहीं बनती।
तर्कशीलता की बजाय भावनात्मकता भाजपा के जनाधार का स्वभाव है, क्योंकि आपके मतदाता वे हैं, जिनकी आस्था और श्रद्धा के बिन्दु स्पष्ट हैं। यह तर्क नहीं, भावनात्मकता की बात है। आपके जो तर्क विरोधियों को परास्त, विश्लेषकों को संतुष्ट कर सकते हैं, वही तर्क भावुक मतदाता को रुष्ट भी कर सकते हैं। तर्क की रुखाई और भावनाओं की गहराई का यह अंतर भाजपा को समझना होगा। राम मंदिर, गोवंश, धारा 370 तथा 35ए- ये विकास के मुद्दे भले न हों, परंतु ये भाजपा के घोषणापत्र के अभिन्न हिस्से हैं, जिनसे भाजपा समर्थकों की भावनाएं गहरे जुड़ी हैं। इनकी उपेक्षा करते हुए वर्तमान परिणामों का विश्लेषण नहीं किया जा सकता। इन दबे तथ्यों के बरक्स कुछ झूठ भी हैं जो खूब उछाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा पूरी तरह भर-भराकर गिर चुकी है और पार्टी के सबसे चमकीले नाम की चमक छीज रही है। कहा जा रहा है कि किसानों का वोट कांग्रेस के साथ जुड़ गया है। यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस का हर नया दांव पूरी तरह सफल रहा।
आंकड़ों को जरा-सा ध्यान से देखने पर आप पाएंगे कि इनमें से हर दावा कोरा झूठ है और केवल लोकसभा चुनाव की दहलीज पर भाजपा और इसके समर्थकों को किसी भी कीमत पर हताश करने के लिए रचा गया है। चुनाव आयोग द्वारा ईवीएम में गड़बड़ी को साबित करने या मशीन को‘हैक’ करने की चुनौती देने पर जो दल भाग खड़े हुए वे ईवीएम की‘रखवाली’ का प्रपंच रचते हैं तो हवा बनाने के इस खेल को समझना चाहिए।
नतीजों की घोषणा से भी पहले जो लोग मध्य प्रदेश में ‘मोदी’ और ‘शाह’ के मुखौटे लगाकर चाय बेचने निकल पड़े उनके मन में पलती नफरत और शरारती मंसूबों को समझना चाहिए। भाजपा सरकारों के भरभरा जाने का झूठ उस जनाधार के आइने में साफ दिखता है जो जरा छिटका भले हो, लेकिन फिर भी मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस के मुकाबले बीस ही बैठता है। राजस्थान में कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले ज्यादा मिले .5 प्रतिशत वोट की बात करते हुए यह नहीं भूला जाना चाहिए कि अन्य राज्यों में जहां मत प्रतिशत बढ़ा है, वहीं राजस्थान में इसमें 3.23 प्रतिशत की कमी आई है। पिछली बार वोट डालने वाला और इस बार घर बैठा मतदाता और किसी का नहीं, भाजपा का नाराज समर्थक है, यह मानने के लिए किसी को राजनीति का महान व्याख्याकार होने की जरूरत नहीं है। इसी तरह किसानों के भाजपा विरोध में लामबंद होने की बात है। यह झूठ ‘मंदसौर’ के आइने में आसानी से पकड़ा जा सकता है। मध्य प्रदेश में मंदसौर किसानों के आक्रोश का केंद्रस्थल था। खुद राहुल गांधी ने यहां जाकर किसानों के गुस्से की आग को भाजपा विरोध का रुख देने का काम किया था। मगर हुआ क्या- मंदसौर जिले की चार में से तीन सीटों पर भाजपा ने ठीक-ठाक अंतर से जीत दर्ज की। चौथी सीट पर भी कांग्रेस उम्मीदवार की बढ़त सिर्फ साढ़े तीन सौ वोट के करीब रही।
मोदी बनाम राहुल के तिलिस्म को समझने के लिहाज से भी मंदसौर रोचक उदाहरण है। यह ऐसा जिला है जहां जब-जब कोई प्रधानमंत्री प्रचार करने आया जिले के लोगों ने उसकी पार्टी को हरा दिया। किन्तु इस बार बात उलटी रही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदसौर का ऐसा मिजाज और किसानों का भारी गुस्सा देखते हुए भी खुद वहां गए और राहुल के भरपूर जोर लगाने के बावजूद लोगों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया। इसके बाद बात आती है राजनीतिक पैंतरों की जिसके बारे में कहा जा रहा है कि राहुल की चाल भाजपा पर भारी पड़ी। दरअसल, हुआ इसका उलटा है। राहुल के सबसे बड़े हथियार ‘महागठबंधन’ पर ही इस चुनाव में सवालिया निशान लग गया है। महागठबंधन की माला जपते और चंद्रबाबू नायडू को इसके अघोषित संयोजक के रूप में घुमाने का जो खामियाजा कांग्रेस ने तेलंगाना में झेला है उसके बाद हैरानी नहीं कि चंद्रबाबू की इच्छाएं और महागठबंधन के समीकरण बोतल में बंद हो जाएं।
यह जरूर है कि छत्तीसगढ़ में मुकाबला त्रिपक्षीय होने से भाजपा को लाभ होने का अनुमान गलत रहा और इससे यहां कांग्रेस ने जनाधार की दृष्टि से दस प्रतिशत की बढ़त बना ली। किन्तु इन्हीं परिणामों में यह बात साफ झलकती है कि जोगी-माया गठबंधन द्वारा काटे गए कुल मतों का प्रतिशत कांग्रेस की भाजपा पर बढ़त के मुकाबले ज्यादा है। यानी यह भरोसा टूटने की बजाय भ्रमित करने का खेल है।
बहरहाल, भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में मत प्रतिशत और आंकड़े केवल भविष्य की रणनीति बनाने में सहायक होते हैं। सत्ता की स्थिति परिणाम पर ही निर्भर करती है। फिर चाहे जीत-हार एक वोट से ही क्यों न हुई हो। तो निष्कर्ष यही है कि कुछ राज्यों में भाजपा सत्ता से भले दूर हुई हो, जनता का भरोसा उसमें पहले की ही तरह कायम है।
भाजपा विरोध में किसी पार्टी के पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा रहा कोई‘एंकर’ जब अति उत्साह में सीधे प्रसारण में ही खुशी से चीख पड़ता है, ‘‘हमें सरकार बनाने के लिए अब केवल दो सीटों की दरकार है’’ तो समझ लेना चाहिए कि भाजपा के लिए यह लड़ाई सीधी नहीं है। लोगों का भरोसा बनाए रखते हुए उसे बड़ी लड़ाई उस ‘भरम’ के खिलाफ लड़नी है, जो बनाया जा रहा है।