सिखों के खून से सने हैं कांग्रेसियों के हाथ
स्रोत:    दिनांक 18-दिसंबर-2018
1984 के खूनी दंगों में सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा मिली है। उन दंगों को मैंने खुद दिल्ली के कनॉट प्लेस में देखा था। देखा था कि किस तरह से मानवता को ताक पर रखकर सिखों को बर्बरता से मारा जा रहा था। तब धर्मदास शास्त्री करोल बाग से कांग्रेस के सांसद थे। वे भी दंगे भड़का रहे थे। वे दंगों के आरोपी थे। अब वे नहीं रहे पर उनके नाम पर आज दिल्ली में एक सड़क है 
आप यदि राजधानी दिल्ली में रहते हैं तो आपने पटेल नगर क्षेत्र को अवश्य देखा होगा। यहां एक सड़क है जिसका नाम धर्मदास शास्त्री मार्ग है। यह वही इंसान थे,जो सज्जन कुमार की तरह श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में भड़के सिखों के खिलाफ दंगों का नेतृत्व कर रहे थे। शास्त्री तो अब इस संसार में नहीं रहे हैं, पर सज्जन कुमार को अब शेष जीवन जेल की सलाखों के पीछे गुजारना पड़ेगा। सज्जन कुमार को हत्या, साजिश, दंगा भड़काने और भड़काऊ भाषण देने का दोषी पाया गया।
देर से ही लेकिन 34 सालों के एक लंबे इंतजार के बाद सज्जन कुमार को कानूनी लड़ाई में हार का मुंह देखना ही पड़ा। आप इसे क्या कहेंगे कि जब हार्ट कोर्ट सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा सुना रहा था,उसी दिन कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री कमलनाथ भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। बीबीसी ने 16 जून,2016 की अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि-“1984 के सिख दंगों में कमलनाथ पर आरोप लगे थे। यूपीए सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे मनोहर सिंह गिल ने तो कहा था कि कमलनाथ की ( पार्टी के पंजाब के प्रभारी के रूप में) नियुक्ति दरअसल 'सिखों के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने' के जैसी है।” कमलनाथ पर आरोप हैं कि वह दिल्ली के रक़ाबगंज गुरुद्वारे पर हुए हमले में शामिल थे। वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने साल 2006 में एक गवाह कोर्ट के समक्ष पेश किया था। इस गवाह के बयान के आधार पर ही कमलनाथ का नाम सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में जोड़ा गया था।
सज्जन कुमार पर कोर्ट के फैसले और कमलनाथ के ऊपर लगे तमाम आरोपों की रोशनी में राजीव गांधी के उस अति संवेदनहीन बयान को कौन भूला सकता है, जब उनसे सिखों के खिलाफ भड़के दंगों के बारे में पूछा गया था तो उनका जवाब था, "जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तब पृथ्वी भी हिलती है"। उस बेहद भयावह दौर में भीड़ को उकसाने में सज्जन कुमार सबसे आगे रहे थे। दिल्ली कैंट इलाके में पांच सिखों केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुविंदर सिंह, नरेंद्र पाल सिंह और कुलदीप सिंह का कत्ल हुआ था। इस दर्दनाक केस के मुख्य आरोपी सज्जन कुमार ही थे। दिल्ली में पैदा सज्जन कुमार बचपन से ही कांग्रेस में सक्रिय थे। वो शुरुआती दिनों में परिवार के भरण-पोषण के लिए चाय बेचते थे। ये बातें 70 के दशक की हैं। उस दौरान उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई। इसके साथ ही सज्जन कुमार की सियासत में दिलचस्पी बढ़ी और उन्होंने पहली बार दिल्ली में नगरपालिका का चुनाव लड़ा और जीते। फिर तो वे संजय गांधी के करीबी दोस्त बन गए। सज्जन कुमार ने 1980 में पहली बार बाहरी दिल्ली से ही लोकसभा का चुनाव लड़ा और उन्होंने दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री रहे चौधरी ब्रह्म प्रकाश को हरा दिया। वे संजय गांधी के 'पांच सूत्रीय' कार्यक्रम को लागू करने वाली टीम के अहम सदस्य थे। हैरानी तो इस बात की है कि 1984 के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें अपने से दूर नहीं जाने दिया। वे बाद में भी कांग्रेस के सांसद बनते रहे।
दिल्ली की ही तरह कानपुर आगरा , पानीपत , जयपुर अहमदाबाद और महाराष्ट्र के कई बड़े जिलों मे सिख विरोधी दंगे हुये थे। कांग्रेस ने दंगों के बाद केंद्र में लंबे समय तक शासन किया, लेकिन कभी भी इतने भयावह कत्लेआम के  पीड़ितों को न्याय कैसे मिले इस पर चिंता नहीं की। जाहिर है, चूंकि सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस के नेता शामिल थे, इसलिए कांग्रेस ने इनको बचाती रही।
सिखों को न्याय दिलाने के क्रम में पहला बड़ा काम अटल बिहारी वाजपेयी ने नानावटी कमीशन बनाकर किया था। नानावटी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि योजनाबद्ध तरीके से सिखों को मारा गया था। 
अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजधानी में भड़के सिख विरोधी दंगों को अपनी आंखों से देखा था। उस समय का एक किस्सा है। जब दंगे भड़के तब अटल जी दिल्ली प्रेस क्लब के सामने स्थित 6 रायसीना रोड के बंगले में रहते थे। राजधानी जल रही थी। सिखों को बर्बरता से मारा जा रहा था। अटल बिहारी वाजपेयी ने 1 नवंबर,1984 को सुबह दस बजे अपने बंगले के गेट के बाहर आए तो देखा उनके घर के सामने स्थित टैक्सी स्टैंड पर काम करने वाले सिख ड्राइवरों पर हल्ला बोलने के लिए भीड़ एकत्रित हो रही थी। वे तुरंत बंगले से अकेले ही निकलकर टैक्सी स्टैंड पर पहुंच गए। लोगों ने उन्हें पहचान लिया। अटल जी ने भीड़ को कसकर खरी-खरी सुनाई। इस पर लोग वहां से चले गए।
तब उस टैक्सी स्टैंड में पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार निवासी बलबीर सिंह विवेक विहार की कुछ टैक्सियां भी लगी हुईं थीं। घटना की जानकारी उन्हें अपने ड्राइवरों से मिली। उन्हें बताया गया कि अटल जी देवदूत बनकर वहां पर प्रकट हो गए थे। अगर कुछ और देर जाती तो टैक्सी स्टैंड पर मौजूद ड्राइवरों और टैक्सियों को जला दिया गया होता।
बहरहाल देर से ही सही पर सिख दंगों पर आए फैसले से कुछ मरहम तो पीड़ितों के जख्मों पर लगा ही है। अब सिख दंगों के बाकी दोषियों को भी सजा मिल जाए तो उनके दिलों में थोड़ी ठंडक तो जरूर पड़ेगी।