विश्व का सबसे बड़ा मेला जहां आस्था के लिए जुटते हैं करोड़ों लोग
स्रोत:    दिनांक 21-दिसंबर-2018

प्रयागराज में कुम्भ का आयोजन होने जा रहा है. किसी भी बड़े आयोजन में लोगों को बुलाने के लिए निमंत्रण भेजना पड़ता है मगर हमारे देश में कुम्भ के आयोजन में करोड़ों हिन्दू बिना निमंत्रण के आते हैं. कुम्भ छठे और महाकुम्भ बारहवें वर्ष लगता है लेकिन प्रयाग में माघ मेला प्रत्येक वर्ष लगता है जिसमें एक माह तक कल्पवासी कड़ाके की ठण्ड में एक कठिन जिन्दगी जी कर अपने कल्पवास को पूरा करते हैं.
पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के बाद प्राप्त हुए अमृत को लेकर देवताओं और राक्षसों में विवाद हुआ था. यदि अगर राक्षस अमृत पीने में सफल हो जाते तो वह अमरत्व प्राप्त कर लेते. यही वजह थी कि देवता, राक्षसों को अमृत नहीं देना चाहते थे. जब देवता अमृत को लेकर आकाश मार्ग से जा रहे थे उसी समय चार जगहों पर अमृत छलक गया था. इन चार स्थानों - प्रयाग, हरिद्वार, नासिक एवं उज्जैन -में कुम्भ का मेला लगता है. ग्रह -गोचर के अनुसार पड़ने वाली तिथि पर करोड़ों लोग संगम तट पर स्नान के लिए आते हैं. स्नान - ध्यान और दान करके अपने गंतव्य को लौट जाते हैं.
प्रयाग का अर्ध कुम्भ हुआ कुम्भ -
दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ प्रयाग और हरिद्वार में महाकुम्भ और अर्ध कुम्भ का आयोजन होता है अन्य दो स्थानों - नासिक और उज्जैन - में केवल महाकुम्भ मेले का ही आयोजन किया जाता है. नासिक और उज्जैन में अर्ध कुम्भ नहीं लगता है. इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मत था कि कुम्भ का मतलब घड़ा होता है और घड़ा कभी आधा नहीं हो सकता है. इसलिए अर्ध कुम्भ को कुम्भ के नाम से जाना जाएगा. इसलिए इस बार प्रयाग में आयोजित हो रहे अर्ध कुम्भ को कुम्भ का नाम दिया गया है.
कुम्भ मेला कब और कहां लगेगा यह ग्रहों की चाल पर निर्भर करता है -
कुम्भ मेला कब और कहां लगेगा यह ग्रहों की चाल पर निर्भर करता है. दरअसल कुम्भ मेले के आयोजन में बृहस्पति ग्रह की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है. प्रयाग जनपद के ज्योतिषी रमेश उपाध्याय बताते हैं कि “गोचर में जब बृहस्पति ग्रह वृश्चिक राशि में प्रवेश करते हैं. उस वर्ष प्रयाग में अर्ध कुम्भ (वर्तमान में कुम्भ मेले) का आयोजन किया जाता है. बृहस्पति के वृश्चिक राशि में प्रवेश करने के बाद जब माघ का महीना आता है. तब गंगा और यमुना के तट पर मेले की शुरुआत होती है.” अखाड़े, कुम्भ मेले का ख़ास आकर्षण है, अखाड़े सिर्फ कुम्भ और महाकुम्भ में ही प्रयाग आते हैं. माघ के महीने में मकर संक्रांति , मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी के अवसर पर सभी अखाड़े शाही स्नान करते हैं. अमावस्या को कुम्भ दिवस भी कहा जाता है. अमावस्या के दिन करोड़ो की संख्या में श्रद्धालू गंगा एवं संगम में स्नान करते हैं.
बृहस्पति ग्रह जब वृष राशि में प्रवेश करते है तब प्रयाग में महाकुम्भ का आयोजन होता है. कुम्भ की ही तरह महाकुम्भ में भी मकर संक्रांति , मौनी आमवस्या और बसन्त पंचमी के अवसर पर अखाड़ों का शाही स्नान होता है.
माघ के महीने में गंगा की रेत पर एक माह तक होता है कल्पवास -
प्रयाग के मेले में एक ख़ास बात यह है कि प्रत्येक वर्ष माघ के महीने में गंगा एवं संगम के तट पर माघ मेला का आयोजन किया जाता है. प्रत्येक वर्ष लगने वाला माघ मेला , पौष पूर्णिमा के स्नान से शुरू होकर माघी पूर्णिमा तक चलता है. माघ के महीने में गृहस्थ एवं साधु – संत एक माह तक संगम की रेती पर निवास करते हैं. ऐसे गृहस्थ जो एक माह तक गंगा की रेती पर बने अस्थायी शिविरों में रह कर दोनों समय संगम स्नान करते हैं , उन लोगों को कल्पवासी कहा जाता है. कल्पवासी अपने शिविरों में रह कर दोनों समय का भोजन स्वयं बनाते हैं और शाम के समय माघ मेले में चल रहे धार्मिक प्रवचनों को सुनकर पुन्य अर्जित करते हैं.
 
कभी - कभी ऐसा होता है कि मकर संक्रांति पहले पड़ जाती है और पौष पूर्णिमा बाद में पड़ती है. ऐसी दशा में भी कल्पवासी पौष पूर्णिमा के स्नान से ही अपने कल्पवास की शुरुआत करते हैं. यदि मकर संक्रांति, पौष पूर्णिमा के बाद पड़ती है तभी कल्पवासी मकर संक्रान्ति के स्नान में शामिल होते हैं. तीसरा और सबसे बड़ा स्नान मौनी अमावस्या का पड़ता है. माघ मेले का चौथा स्नान बसंत पंचमी और पांचवा स्नान माघी पूर्णिमा का होता है. माघी पूर्णिमा के स्नान के बाद कल्पवासी और सभी साधु -संत अपने - अपने गंतव्य को लौट जाते हैं. मेले की प्रशासनिक व्यवस्था महाशिवरात्रि तक रहती है. महाशिवरात्रि के स्नान के बाद मेले का औपचारिक समापन हो जाता है.
ब्रिटिश सरकार ने बनाया था माघ मेला अधिनियम - 
गंगा के तट पर माघ मेले की शुरुआत कब से हुई है. इसका सटीक विववरण नहीं मिल पाता है. माघ मेला भी काफी प्राचीन है. गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित मानस में लिखा है कि- “माघ मकरगत रवि जब होई / तीरथ पतिहिं आव सब कोई.” पूर्व माघ मेला अधिकारी डॉ एस के पाण्डेय कहते हैं “माघ मेला एक्ट 1938 में बना. इसलिए ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि जब गंगा जी के तट पर माघ के महीने में भीड़ बढ़ने लगी होगी. तब उस समय की ब्रिटिश सरकार को इस माघ मेले के संचालन के लिए यह अधिनियम बनाना पड़ा होगा.”
प्रत्येक वर्ष जिला प्रशासन की तरफ से माघ मेला का आयोजन किया जाता है. सितम्बर माह के बाद जब बाढ़ समाप्त हो जाती है तब गंगा जी की धारा को देखते हुए जिला प्रशासन माघ मेले के लिए भूमि का समतलीकरण करा कर धार्मिक संस्थाओं को भूमि आवंटित करता है. उसके बाद धार्मिक संस्थाए एवं धर्माचार्य मेले में आकर बस जाते हैं. संत - महात्मा तो माघ मेले में आते ही हैं. काफी बड़ी संख्या में गृहस्थ माघ मेले में एक महीने कल्पवास करते हैं. ठीक इसी तरह कुम्भ मेले का भी आयोजन किया जाता है. बस फर्क इतना रहता है कि जिस वर्ष कुम्भ होता है उस वर्ष मेले का आयोजन बहुत बड़े पैमाने पर किया जाता है. गंगा जी के कटान के बाद जो भूमि उपलब्ध रहती है उसी में माघ मेला का आयोजन हो जाता है मगर कुम्भ मेले के आयोजन के लिए आस - पास के किसानों की भूमि का अधिग्रहण करना पड़ता है.
तीर्थ - पुरोहित मधु चकहा बताते है कि “ कल्पवास का संकल्प 12 वर्षों का होता है. आम तौर पर कल्पवास एक महाकुम्भ से शुरू होकर अगले महाकुम्भ तक चलता है. बारह माघ मेले का कल्पवास पूरा होने पर कल्पवासी, अपने तीर्थ - पुरोहित को दान में गृहस्थी का सारा सामान मसलन सुई , धागा , चम्मच, कटोरी , थाली , राशन समेत सभी कुछ दान करता है. उसी के बाद कल्पवास पूर्ण माना जाता है
इस तरह से गंगा एवं संगम तट पर माघ मेला हर वर्ष लगता है . हर वर्ष कल्पवासी आते हैं .जिस वर्ष कुम्भ लगता है उस वर्ष भी कल्पवासी माघ महीने में नियम संयम से कल्पवास करते हैं और फिर अपने - अपने घरों को लौट जाते हैं.