क्या कंधार विमान अपहरण में अटल जी की सरकार ने टेके थे घुटने
स्रोत:    दिनांक 24-दिसंबर-2018
 -प्रो. संतोष कुमार तिवारी                           
1999 में जब आईसी 814 विमान का अपहरण हुआ था, जिसे कंधार अपहरण कांड के नाम से जाना जाता है। तब कहा गया था कि अटल जी ने आतंकियों की मांग मानते हुए यात्रियों को छुड़ाने के लिए तीन आतंकियों को छोड़ दिया था, लेकिन क्या यह सच है !
कंधार अपहरण कांड से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं अटल बिहारी वाजपेयी को नहीं दी गई थीं (फाइल चित्र )
उन्नीस सौ निन्यानवे में आईसी 814 विमान अपहरण में बंधक बनाए गए 150 से अधिक यात्रियों की रिहाई के लिए तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने तीन आतंकवादियों को छोड़ा था। आम धारणा है कि सरकार को ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि इन यात्रियों के नाते-रिश्तेदारों ने प्रधानमंत्री के घर के सामने प्रदर्शन किया था, धरना दिया था। मीडिया ने भी उन प्रदर्शनों को दिखा-दिखाकर यह राय बनाई थी कि यात्रियों को सुरक्षित रिहा कराया जाए। कांग्रेस भी यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के समर्थन में थी। प्रदर्शनकरियों और धरना देने वालों की भीड़ के बीच में कम्युनिस्ट पार्टी की वृन्दा करात भी देखी गई थीं।
उस विमान अपहरण कांड को आज करीब 19 वर्ष हो गए हैं। पर आज तक कांग्रेस यह दोषारोपण करती रही है कि अटलजी ने विमान अपहर्ताओं के सामने घुटने टेक दिए थे। आज आम जनता को यह मालूम नहीं है कि किस प्रकार अटल बिहारी वाजपेयी को इस विमान अपहरण के कई पहलुओं से अंधेरे में रखा गया था।
हुआ यह था कि यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के लिए स्विट्जरलैंड और अमेरिका समेत कई देशों ने भारत पर दबाव डाला था, क्योंकि उस अपहृत विमान में स्विट्जरलैंड का एक अति विशिष्ट, धनाढ्य व्यक्ति बैठा था। उसकी विमान में मौजूदगी के बारे में न तो भारत सरकार को पता था, न ही अपहर्ताओं को। ध्यान देना होगा कि कांग्रेस के पिछले शासन कालों में जब ऐसी परिस्थितियां आईं, तो उन्होने क्या किया था।
इटली में पैदा हुए रोबर्टो गिओरी नामक उस व्यक्ति के पास स्विट्जरलैंड और इटली की दोहरी नागरिकता है। गिओरी स्विट्जरलैंड में एक प्रिंटिंग प्रेस का मालिक है। उसकी प्रेस में कोई अखबार नहीं, बल्कि विभिन्न देशों की मुद्रा के नोट छपते हैं। 1999 में उसकी प्रेस में दुनिया के लगभग 150 देशों की मुद्रा के नोट छपते थे। जिस समय यह कांड हुआ, उस दौरान गिओरी की कंपनी डे ला रुई गिओरी अमेरिकी डॉलर के नवीनतम प्रारूप, रूसी रूबल, जर्मन मार्क आदि अनेक यूरोपीय मुद्राओं पर काम कर रही थी। अमेरिकी पत्रिका टाइम के अनुसार, विश्व की 90 प्रतिशत मुद्रा की छपाई पर गिओरी की कंपनी का नियंत्रण है।
चेन्नै से प्रकाशित होने वाले दैनिक द हिन्दू ने इस अपहरण कांड के समाप्त होने के बाद अपने 6 जनवरी, 2000 के अंक में इटली और स्विट्जरलैंड के कुछ अखबारों का हवाला देते हुए एक खबर छापी थी। खबर में जेनेवा से प्रकाशित फ्रेंच अखबार 'ले टेंप्स' के हवाले से बताया गया था कि विमान अपहरण के बाद तत्कालीन स्विस विदेश मंत्री जोसेफ डीस ने भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह को सीधे फोन किया था। उनसे सीधे शब्दों में कहा गया था कि 'यात्रियों की रिहाई के लिए सब कुछ किया जाए, बशर्ते बंधकों की सुरक्षा की गारंटी हो।' स्विट्जरलैंड सरकार ने वहां की राजधानी में इस संकट से निपटने के लिए एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया था और अपने एक दूत हांस स्टाल्डर को कंधार (अफगानिस्तान) भेजा था, जहां अपहृत विमान खड़ा था। इतालवी अखबार 'ला रिपब्लिका' और 'कोरीरे डेल्ला सेरा' के अनुसार अपहरण कांड के समाप्त होने के बाद गिओरी को विशेष वायुयान भेजकर स्विट्जरलैंड वापस बुलाया गया था। उसकी सारी टेलीफोन बातचीत जांची गई थीं, ताकि विमान अपहृर्ता भविष्य में उसकी किसी तरह पहचान न कर सकें और उस तक न पहुंच न सकें । 'कोरीरे डेल्ला सेरा' के अनुसार गिओरी विश्व का अत्यंत धनाढ्य और सर्वाधिक संरक्षित व्यक्ति है। गिओरी आत्म प्रचार से कोसों दूर रहता है। स्विट्जरलैंड के कानून के अनुसार उसकी कंपनी के खाते भी गोपनीय रखे जाते हैं। रोबर्टो गिओरी की फोटो तक मिल पाना असंभव है। जब आईसी 814 के विमान अपहृर्ता भारतीय जेलों से 36 आतंकवादियों की रिहाई और 20 करोड़ डॉलर दिए जाने की मांग कर रहे थे, तब उन्हें यह पता नहीं था कि उस विमान में एक इतना नामी और धनाढ्य व्यक्ति बैठा है जिसके लिए 20 करोड़ डॉलर हाथ की मैल बराबर हैं। भारतीय मुद्रा में उस समय अर्थात् 1999 में 20 करोड़ डॉलर की कीमत लगभग नौ सौ करोड़ रुपये थी, आज यह कीमत लगभग 14,00 करोड़ रुपये हो गई है।
विमान से अपनी सुरक्षित रिहाई के बाद अमेरिकी समाचार पत्रिका टाइम गिओरी ने (17 जनवरी 2000) को बताया, 'मुझे अचानक लगा कि इन आदमियों (विमान अपहृर्ताओं) को हत्या करने या स्वयं के मारे जाने की कोई समस्या नहीं है। मैं एक सौ हजार प्रतिशत विश्वास के साथ कह सकता हूं कि वे अंत तक लड़ते। वे पूरी तरह से प्रशिक्षित और उन्माद से भरे थे।' गिओरी का दृढ़ विश्वास था कि अगर भारत ने मौलाना मसूद अजहर को जेल से नहीं छोड़ा होता, तो अपहर्ता विमान को जबरन उड़वा कर कंधार के चारों ओर की किसी पहाड़ी से टकरा देते। गिओरी ने कहा कि एक सप्ताह अपहृर्ताओं के चंगुल में रहने का मुझे जो अनुभव हुआ है, उसने मुझे हमेशा के लिए बदल दिया है। मैं हिन्दुत्व के बारे में नहीं जानता। लेकिन जिस तरह से सभी यात्री, यहां तक कि बच्चे भी इस कटु अनुभव के दौरान शांति के साथ रहे, वह अनुकरणीय है। मैंने स्वयं से कहा कि यदि यह विमान इतालवी या फ्रेंच लोगों से भरा होता, तो स्थिति पूरी तरह भिन्न होती।' गिओरी ने बताया कि विमान अपहर्ता हवाई जहाज के माइक से बंधकों को इस्लाम और कश्मीर की पृथकतावादी लड़ाई के बारे में भाषण दे रहे थे। वे यह भी कह रहे थे कि जिस तरह तुम लोग तकलीफ भुगत रहे हो, तो जरा सोचो कि हमारे भाई लोग भारत की जेलों में क्या भुगत रहे होंगे। अपहृर्ता भारतीय जेलों से जिन 36 आतंकवादियों की रिहाई की मांग कर रहे थे उनमें से 33 पाकिस्तान या उसके कब्जे वाले कश्मीर से थे, एक ब्रिटिश था, एक श्रीनगर (भारत) का रहने वाला था और एक अफगानिस्तान का था।
 
जिन पांच अपहृर्ताओं ने उस विमान का अपहरण किया था, उनकी बाद में पहचान हुई थी, वे थे-इब्राहीम अतहर (बहावलपुर), शाहिद अख्तर सईद (गुलशन इकबाल कॉलोनी, कराची), सुन्नी अहमद काजी (डिफेंस कॉलोनी, कराची), मिस्त्री जहूर इब्राहीम (अख्तर कॉलोनी, कराची), शाकिर (सक्कर शहर)। लंबी समझौता वार्ता के बाद बंधकों की रिहाई के लिए 36 में से जिन तीन आतंकवादियों को भारतीय जेलों से छोड़ा गया, वे थे—मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर और अहमद उमर सईद शेख। इनमें से अहमद उमर सईद शेख को बाद में अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या के आरोप में पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया था और 2002 में उसे फांसी की सजा सुनाई गई थी। चेन्नै से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'फ्रंटलाइन' के 8 से 21 जनवरी, 2000 के अंक में बताया गया कि अमेरिका के तत्कालीन क्लिंटन प्रशासन को इस अपहरण कांड की भर्त्सना करने में चार दिन लग गए, जबकि विमान में बंधक बनाए गए लोगों में एक अमेरिकी और एक कनाडा का नागरिक भी था। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने तो इस अपहरण कांड की निंदा ही नहीं की। विमान में कुल 11 देशों के नागरिक सवार थे, फिर भी भारत को इस अपहरण कांड से निपटने में उतना अंतरराष्ट्रीय सहयोग नहीं मिला जितना कि मिलना चाहिए था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह उदासीनता इसलिए थी क्योंकि अमेरिका और स्विट्जरलैंड जैसे प्रभावशाली देश चाहते थे कि रोबर्टो गिओरी की शांति के साथ सुरक्षित रिहाई हो जाए। इस बारे में भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह को आगाह कर दिया गया था। भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के तत्कालीन प्रमुख ए. एस. दौलत ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक 'कश्मीर:द वाजपई ईयर्स' में भी कहा है कि भारत उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया था। दौलत ने अपनी पुस्तक में इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख नहीं किया कि उस अपहृत विमान में उनकी खुफिया एजेंसी रॉ का एक अधिकारी भी बैठा था जिसका नाम शशि भूषण सिंह तोमर था। यह अधिकारी काठमाण्डू स्थित भारतीय दूतावास में फर्स्ट सेक्रेटरी के तौर पर कार्य कर रहा था। तोमर की तत्कालीन कैबिनेट सचिव एन.के. सिंह से नजदीकी रिश्तेदारी थी।
अपहृत विमान में इतना ईंधन नहीं था कि उसे लाहौर या कंधार ले जाया जाता। इस कारण उसे अमृतसर हवाई अड्डे पर उतरना पड़ा, जहां अपहृर्ताओं ने गुरुग्राम निवासी रूपन कत्याल नामक एक यात्री को इतना घायल कर दिया कि बाद में उसकी विमान में ही मृत्यु हो गई थी। 25 वर्षीय कत्याल शादी के बाद हनीमून मनाने काठमाण्डू गया हुआ था। विमान में उसकी पत्नी रचना सहगल उसके साथ थी।
अमृतसर हवाई अड्डे को दिल्ली स्थित क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का निर्देश था कि किसी तरह विमान को वहीं रोक कर रखा जाए पर ईंधन न भरा जाए। इस बीच हवाई अड्डे के निदेशक विजय मुलेकर के पास एक फोन आया जिसमें एक आदमी ने यह निर्देश दिया कि हवाई जहाज में ईंधन भर दिया जाए और उसे आगे उड़ान भरने दी जाए। फोन करने वाले आदमी ने अपना नाम सी. लाल बताया और कहा कि वह गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव है। विजय मुलेकर ने उसकी बात नहीं मानी और कहा कि 'मैं केवल दिल्ली स्थित क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की ही बात मानूंगा।' जांच करने पर पता चला कि वह फोन एक यूरोपीय देश से आया था। यूरोप से आए इस फोन वाली घटना का जिक्र अंग्रेजी समाचार पत्रिका 'इंडिया टुडे' के 10 जनवरी, 2000 अंक में किया गया है। इस घटना की चर्चा अंग्रेजी पुस्तक 'आईसी 814 हाइजैक्ड! द इनसाइड स्टोरी' में भी पृष्ठ संख्या 203 पर की गई है। वहां सी. लाल की जगह जे. लाल लिखा हुआ है।
बाद में विमान लाहौर के लिए रवाना हो गया जहां उसे ईंधन दिया गया। उसके बाद वह दुबई पहुंचा। दुबई में कत्याल के शवों विमान से उतार दिया गया तथा 13 महिलाओं और 11 बच्चों समेत 27 लोग छोड़ दिये गए। परंतु रूपेन कत्याल की विधवा को नहीं छोड़ा गया। फिर अगले दिन अपहृर्ताओं के इशारे पर विमान को कंधार (अफगानिस्तान) ले जाया गया, जहां उस समय इस्लामिक उग्रवादी संगठन तालिबान का कब्जा था। अंत में जसवंत सिंह उन तीन आतंकवादियों (मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर और अहमद उमर शेख) को विमान से कंधार ले गए थे।
कई दिनों की वार्ता के बाद तीन आतंकवादियों को छोड़े जाने पर ही बाकी बचे बंधकों को विमान अपहर्ताओं ने रिहा किया। पूरा अपहरण कांड 24 से 30 दिसम्बर तक चला, 31 दिसम्बर 1999 को उस विमान के यात्रियों को सुरक्षित दिल्ली लाया गया था।
अब देखते हैं कि अपहरण की कुछ ऐसी ही घटनाओं पर कांग्रेस ने अपने शासनकाल में क्या किया था। भोला पांडे और देवेंद्र पांडे ने 20 दिसंबर,1978 को इंडियन एयरलाइन्स की घरेलू उड़ान आईसी-410 का अपहरण कर लिया था। अपहरण के समय विमान अलीगढ़ के ऊपर उड़ रहा था और विमान में 132 यात्री सवार थे। भोला पांडे और देवेंद्र पांडे की मांग थी कि इन्दिरा गांधी को जेल से छोड़ा जाए और उनके पुत्र संजय गांधी के खिलाफ अभियोग वापस लिए जाएं। कुछ घंटे तक यात्रियों को बंधक बनाए रखने के बाद दोनों ने मीडिया के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्होंने बताया कि उनके पास जो हथियार थे, वे एक तरह के खिलौने थे।
इन दोनों पर मुकदमा दर्ज किया गया जिसे बाद में कांग्रेस के शासन काल में वापस ले लिया गया। 1980 में इन दोनों इन्दिरा-वफादारों अर्थात् भोला पांडे और देवेंद्र पांडे को 1980 में कांग्रेस का टिकट दिया गया और दोनों जीतकर उत्तर प्रदेश में विधानसभा सदस्य बने। देवेंद्र पांडे को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव भी बनाया गया था। उसका 2017 में निधन हो गया।
1991 में इंडियन ऑयल के कार्यकारी निदेशक का श्रीनगर में अपहरण किया गया। अपहरण 54 दिनों तक चला। फिर उनकी रिहाई के लिए कांग्रेस शासन ने 9 आतंकवादियों को जेलों से छोड़ा था। छोड़े गए आतंकवादियों में जावेद अहमद शेल्ला भी शामिल था जिस पर कशमीर विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीरुल हक और हिंदुस्तान मशीन टूल्स के अधिकारी एच.एल. खेड़ा की हत्या का आरोप था।
1993 में हजरतबल मस्जिद में लगभग तीन दर्जन आतंकवादियों ने 170 लोगों को बंधक बनाया था। बंधकों को छुड़ाने के लिए उन आतंकवादियों को अभयदान दे कर वहां से सुरक्षित जाने दिया गया था। ये सब तथ्य बताने के पीछे मकसद सिर्फ इतना है कि कुछ छुपे और कुछ भुला दिये गए तथ्य पाठकों के सामने आएं। किस मौके पर सरकार ने क्या कदम उठाया, यह पता चले। हां, वे कदम सही थे या गलत, इसे बारे में सबकी अपनी-अपनी राय हो सकती है।