पश्चिमी बंगाल का पाकुड़ बना बंगलादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं की शरणस्थली
स्रोत:    दिनांक 24-दिसंबर-2018
- बिनय कुमार सिंह                                  
पश्चिम बंगाल की सीमा से सटा झारखंड का पाकुड़ जिला अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की शरणस्थली बन चुका है। पी.एफ.आई. जैसे संगठन इन घुसपैठियों को बसाने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं
पी.एफ.आई. द्वारा पाकुड़ में आयोजित एक रैली। कहा जाता है कि इसमें ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगे थे। (फाइल चित्र)
केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वी़ एस़ अच्युतानंदन ने कहा- ‘‘पी.एफ.आई. केरल को ‘मुस्लिम राष्ट्र’ बनाना चाहती है।’’ केरल सरकार ने केरल उच्च न्यायालय में भी पी.एफ.आई. के खतरनाक मंसूबों को विस्तृत रूप से रखा है। इसके बावजूद बहुत ही चालाकी से उस पर उदारवाद का आवरण चढ़ा दिया गया है।
इस्लामी गुट पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पी.एफ.आई.) की लपटें झारखंड तक पहुंच गई है। इसकी हरकतों को देखते हुए राज्य सरकार ने 21 फरवरी, 2018 को झारखंड में पी.एफ.आई. पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने वाला झारखंड देश का पहला राज्य बना, लेकिन यह प्रतिबंध ज्यादा दिन तक नहीं रहा। 27 अगस्त, 2018 को रांची उच्च न्यायालय ने प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया।
सूत्रों के अनुसार एक बार फिर झारखंड सरकार पी.एफ.आई. पर प्रतिबंध लगा सकती है। सूत्रों ने यह भी बताया कि इसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। झारखंड में पी.एफ.आई. का विस्तार हो रहा है। इसके लिए उसने झारखंड में रहने वाले बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों का सहारा लिया है। उल्लेखनीय है कि ये घुसपैठिए झारखंड के पाकुड़ जिले में बड़ी संख्या में हैं। इस राज्य में पी.एफ.आई. को उन संगठनों का साथ मिल रहा है, जो कन्वर्जन में लगे हैं, नक्सलवाद के नाम पर मार-काट करते हैं और देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। झारखंड में पी.एफ.आई. को नक्सली संगठनों का साथ हासिल है। प्रधानमंत्री की हत्या के प्रयास का मुख्य अभियुक्त रोना विल्सन (कमिटी फॉर रिलीज फॉर पॉलिटिकल प्रिजनर्स), जो अभी भी पुलिस हिरासत में है और वसंता कुमारी (कमिटी फॉर डिफेंस एंड रिलीज आॅफ जी़ एऩ साईबाबा) ने पी.एफ.आई. से प्रतिबंध हटवाने के लिए अनेक प्रयास किए थे। पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, जो भाकपा-माओवादी समर्थक संगठन है, ने भी प्रतिबंध हटाने की मांग की थी। प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश में शामिल लोगों ने आठ ऐसे मोबाइल नम्बरों का उपयोग किया था, जिसके सिम कार्ड झारखंड के थे। वहीं झारखंड के ईसाई पादरी स्टेन लउरडु स्वामी उर्फ स्टेन स्वामी का भी नाम पुणे पुलिस की सूची में था। स्टेन स्वामी ने पत्थरगड़ी को जनजातियों के हित में बताने की कोशिश की थी, जबकि इसे वे लोग शह दे रहे थे, जो देश-विरोधी कार्यों में लगे थे। स्टेन स्वामी इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट, बेंगलुरू के कई वर्षों तक निदेशक रहे हैं।
5 जुलाई, 2017 को पाकुड़ में पी.एफ.आई. के राज्य उपाध्यक्ष हंजला शेख, राज्य सचिव अब्दुल हन्नान और पूर्व राज्य सचिव हबीबुर रहमान द्वारा एक सशस्त्र रैली का आयोजन किया गया। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई तो पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा और इन नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। पी.एफ.आई. के करीब 43 गुर्गों को स्थानीय पुलिस के साथ संघर्ष करने और उनके हथियार छीनने की कोशिश करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
आश्चर्य है कि इसके बाद देश के कई स्थानों से कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता पाकुड़ आए। इन लोगों ने पी.एफ.आई. के समर्थन में आवाज उठाई। दिल्ली के नेशनल कन्फेडरेशन आॅफ ह्यूमन राइट्स आर्गेनाइजेशन (एन.सी.एच.आर.ओ.) के एक दल ने 10 अगस्त, 2017 को पाकुड़ का दौरा किया और एक रपट गढ़ कर कहा, ‘‘पुलिस ने शांतिपूर्ण रैली पर बल प्रयोग किया।’’ एन.सी.एच.आर.ओ. वास्तव में पी.एफ.आई. का ही सहयोगी घटक है। जो देश में हर जगह पी.एफ.आई. की अवैध गतिविधियों को मानवाधिकार की ढाल प्रदान करता है।
2015 में हंजला शेख का नाम देश-विरोधी कई प्रदर्शनों में प्रमुखता से सामने आया था। साहेबगंज में पी.एफ.आई. समर्थकों ने शेख के नेतृत्व में एक देश-विरोधी प्रदर्शन किया था, जिसमें पाकिस्तानी झंडा लहराया गया था। 15 अगस्त, 2017 को जामताड़ा में भाजपा द्वारा निकाली गई तिरंगा यात्रा पर हमला किया गया। भीड़ ने तिरंगा फाड़ दिया था।
पी.एफ.आई. ने झारखंड के कई जिलों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। इसके प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल कबीर, जामताड़ा जिले के नरोडीह गांव के रहने वाले हैं। तो महासचिव अब्दुल वदुद, साहेबगंज जिले के बालूग्राम गांव से हैं। उपाध्यक्ष हंजला शेख पाकुड़ जिले के मणिरामपुर से हैं। राज्य सचिव शमीम अख्तर और राज्य कोषाध्यक्ष हाफिज अब्दुल सलाम साहेबगंज से ताल्लुक रखते हैं। पी.एफ.आई. का झारखंड मुख्यालय भी पाकुड़ जिले के गांव-चंद्रापारा, पो.-राशिपुर, थाना-मुफस्सिल में स्थित है।
एक बात यह भी कही जा रही है कि नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजन्स (एन.आर.सी.) जैसी किसी भी स्थिति से बचने के लिए बांग्लादेशी घुसपैठिए झारखंड में बड़ी संख्या में वनवासी लड़कियों से शादी कर रहे हैं। इसके पीछे पी.एफ.आई. का ही दिमाग है। हाल ही में ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित एक सरकारी रपट के हवाले से दावा किया गया था कि मुस्लिम संगठनों से जुड़े लोगों ने झारखंड के संथाल परगना में वनवासी लड़कियों से शादी कर 10,000 एकड़ जमीन खरीदी है। रपट के अनुसार राजमहल, उधवा, तालझारी और बरहेट प्रखंड के अयोध्या, जोगोटोला, वृंदावन, करमतोला, महाराजगंज, बालुग्राम, गंगटी, जोंका, तीनपहाड़ बाजार और पाकुड़ के चंद्रपाड़ा, राशिपुर, जोगाडीह और पदरकोला गांवों में सबसे ज्यादा जमीन खरीदी गई है। कई गांवों में इन्होंने जमीन पर पहले कब्जा किया और बाद में औने-पौने दाम दे दिए।
वनवासी महिलाओं से शादी के बाद कागजी तौर पर इनका मजहब इस्लाम नहीं दिखाया जाता है, ताकि उन्हें वनवासी के नाम पर सरकारी सुविधाएं मिलती रहें। यह एक प्रकार से धोखा है। हालांकि राज्य सरकार ने इसे संज्ञान में लिया है। सरकार एक नया कानून बनाने में जुटी है। इसके अनुसार यदि कोई भी वनवासी महिला किसी गैर-वनवासी पुरुष से विवाह करती है तो वह अपने वनवासी होने के अधिकारों के लाभ से वंचित हो जाएगी।
ये मुसलमान वनवासी महिलाओं से विवाह कर अपने दो उद्देश्यों को पूरा करना चाहते हैं। एक है वनवासियों की जमीन हथियाना और दूसरा है वनवासियों और अल्पसंख्यकों की मित्रता के नाम पर किसी विद्रोह में उनका इस्तेमाल करना।
23 अगस्त को पाकुड़ के महेशपुर प्रखंड के डांगापाड़ा गांव में बकरीद के दिन दंगा हुआ था। इस दंगे में मुस्लिम घुसपैठियों ने प्रशासन और गैर-मुस्लिमों को अपनी ताकत का अहसास कराने का प्रयास किया था। मस्जिद के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल मुस्लिम आबादी को दंगे के लिए एकजुट करने के लिए किया गया था।
उल्लेखनीय है कि इस इलाके में म्यांमार और बांग्लादेश के मुसलमान बड़ी संख्या में रह रहे हैं। ये लोग इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए हर हथकंडा अपना रहे हैं। लोग यह भी बताते हैं कि एन.आर.सी. से बचने के लिए भी असम में रह रहे घुसपैठिए झारखंड के अनेक हिस्सों, विशेषकार पाकुड़ जिले में प्रवेश कर चुके हैं।
ऐसी परिस्थितियों में पाकुड़ जिले के एक गांव को पी.एफ.आई. द्वारा अपने राज्य मुख्यालय के रूप में स्थापित करना एक खतरनाक मुहिम की ओर संकेत कर रहा है।
(लेखक पी.एफ.आई. पर शोध कर रहे हैं)