पार्कों और आम रास्तों पर नमाज जायज नहीं
स्रोत:    दिनांक 28-दिसंबर-2018
दिल्ली से सटे नोएडा के सेक्टर-58 स्थित एक पार्क में पिछले पांच साल से होने वाली नमाज के चलते होने वाली परेशानी पर स्थानीय लोगों के विरोध के बाद पुलिस ने वहां नमाज पढ़े जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब वहां नमाज पढ़ने को लेकर सियासत हो रही है। मजहबी जानकारों का कहना है  सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ना जायज नहीं है और इस्लाम के कायदों के खिलाफ है
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक एवं वरिष्ठ अधिवक्ता शिराज कुरैशी का कहना है कि पैगंबर मुहम्मद ने फरमाया है, ‘तुम रास्ते में बैठने से बचो।’ लोगों ने पूछा, ‘ऐ अल्लाह के रसूल! यह तो हमारे लिए जरूरी है।’ मोहम्मद ने फरमाया, ‘ अगर तुम्हारे लिए यह जरूरी है कि तो रास्ते को उसका हक दो।’ उन्होंने मालूम किया कि रास्ते का क्या हक है? पैगम्बर ने फरमाया, ‘निगाहें नीची रखना, तकलीफ देने वाली चीजों को रास्ते से हटा देना, सलाम का जवाब देना और बुराई से दूर रहना।’ लेकिन पैगम्बर मोहम्मद द्वारा कही गई बातों को शुक्रवार के दिन होने वाली जुमे की नमाज पर देश के हर छोटे-बड़े शहरों में सड़क जाम करके नमाज पढ़कर अनुसना किया जाता है।
उल्लेखनीय है कि देश के हर छोटे-बड़े शहरों में बड़ी-बड़ी मस्जिदें हैं, लेकिन अक्सर ऐसा देखने में आता है कि वह खाली पड़ी रहती हैं और नमाजी वहां पर नमाज के लिए नहीं पहुंचते हैं। बल्कि उसके उलट यह देखने में आता है कि नमाजी मस्जिद में न जाकर समूह बनाकर सड़कों को घेरकर नमाज पढ़ने लगते हैं। उनको इससे कोई मतलब नहीं रहता कि समाज को उनके कार्य से कितनी समस्या हो रही है। समाजिक वातावरण खराब न हो इसलिए समाज भी इस आपराधिक कार्य को सहता रहता है।
भारत में आस्था को बहुत ही संवेदनशील विषय माना जाता है। बात किसी भी मजहब की हो, प्रबुद्ध वर्ग इससे जुड़ी पेचीदगियों पर चर्चा करने से कतराता है। उन्हें लगता है कि हमारा जनमानस तथ्यों को समझने के लिए अभी तैयार नहीं है।
देश के के विभिन्न स्थानों से आए दिन सड़क पर नमाज को लेकर विरोध के स्वर सुनाई देते रहते हैं। जब इसका अधिक विरोध हो जाता है तो जुमे की नमाज पर उग्र भीड़ द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा तक की नौबत आ जाती है।
ऐसा ही एक उदाहरण है मेरठ का। जुलाई,2013 को छीपी टैंक पर शिव चौक के पास सड़क पर नमाज अदा करने को लेकर हिंसा हुई। कई बार बिहार, लखनऊ, मेरठ, रामपुर, भागलपुर, दिल्ली, हैदराबाद, मुंबई, इलाहाबाद में सड़क पर नमाज पढ़ने के विरोध में साम्प्रदायिक हिंसा की नौबत तक आ चुकी है।
इस सन्नाटे का कारण कर्फ्यु नहीं...
दिल्ली में अनेक संरक्षित मकबरों और सार्वजनिक सड़कों पर आज के समय जबरदस्ती नमाज पढ़ी जाती हैं। व्यस्त सड़कों पर जुमे की नमाज के समय सन्नाटा पसर जाता है। इस सन्नाटे का का कारण कोई कर्फ्यु या धारा 144 नहीं होता है बल्कि जुमे की नमाज होती है। दिल्ली के ही गोविंदपुरी , श्रीनिवासपुरी-कैप्टन गौड़ मार्ग, दिल्लीगेट निकट मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, सीलमपुर-मोजपुर सड़क, मस्जिद सड़क भोगल, जाफराबाद, वेलकम-खुरैजी और ऐसी ही दर्जनों प्रमुख सड़के हैं,जहां पर जुमे की नमाज के दौरान पूरी तरह से सड़क बंद कर दी जाती है। उस समय ऐसा लगता है कि इन सड़कों का निर्माण वाहनों के लिए नहीं बल्कि मुसलमानों की नमाज पढ़ने के लिए हुआ है। इस दौरान लोगों को परेशानी होती है तो हुआ करे... कोई मरीज इस भीड़ में फंसा है तो फंसा रहे... आखिर हम तो इबादत कर रहे हैं...
वर्ष 2010 में उत्तरी दिल्ली के अलकनंदा में अरावली अपार्टमेंट के गेट नं. 10 का एक ऐसा ही मामला तब समाने आया था, जब वहां के लोगों ने प्रशासन से शिकायत की थी कि पास में मदनी मस्जिद होने के कारण स्थानीय निवासियों को काफी दिक्कत होती है। समस्या से छुटकारा पाने के लिए अरावली रेजीडेन्ट्स वेलफेयर एसोसिएशन दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंची। एसोसिएशन ने न्यायालय से निवेदन किया कि यह मस्जिद अवैध है। इसलिए इसे हटाया जाए। मुकद्मा संख्या 535-43/2006 पर लंबी बहस के बाद उच्च न्यायालय ने 10 फरवरी,2009 को आदेश दिया कि मस्जिद की चारदीवारी के भीतर नमाज पढ़ी जाए और यह काम सुनिश्चित करने का काम पुलिस का है। लेकिन दिल्ली पुलिस इस आदेश पर कुंडली मारकर बैठी रही। जबकि अर्पामेंट के लोगों ने बार-बार पुलिस से इस पर कार्रवाई करने को कहा और नमाज पढ़ने वाले को रोकने को कहा लेकिन पुलिस ने इस पर लचर रवैया अपनाये रखा और मुसलमान नमाज पढ़ते रहे और यह क्रम आज भी जारी है।
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान दिल्ली में कार्यरत मोहम्मद हनीफ खान शास्त्री इस पूरे मामले पर कहते हैं,‘जो लोग सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ते हैं,उनको न ही दीन का ज्ञान है और न ही सामाजिक ज्ञान है। बस यह है कि लोग लगे हुए हैं तो लगे हुए हैं। इसमें पढ़ा-लिखा तबका या जिसको अपने दीन-धर्म का ज्ञान है वह ऐसा नहीं करता है। यह एक तरीके से अंधानुकरण है। अपनी इबादत में अपना ,अपने प्रभु का और प्रभु की सृष्टि में जो मानवीय समाज है उनको कोई कष्ट न हो इसका ध्यान देना बहुत ही जरूरी है। लेकिन दुख है लोग इस बात को नहीं समझते।’ वे आगे कहते हैं, ‘ये अंधानुकरणीय लोग हैं जो सिर्फ नमाज पढ़ने के लिए आते हैं, उनको यह मतलब नहीं कैसे पढ़ें, कहां पढ़े। बस नमाज पढ़ना है! उनको न तो समाज का ख्याल है, न अपने मालिक का ख्याल है और न ही नमाज की पवित्रता का ख्याल है। मेरा तो इस बात पर एक ही मत है कि आपकी इबादत से किसी को भी कष्ट न पहुंचे अगर कष्ट पहुंचता है तो ऐसी इबादत से कोई फायदा नहीं है। अगर मालिक को खुश करना है तो मालिक की रचना को खुश करना चाहिए।’
- उपासना के नाम पर उत्पात ?
-उत्तर प्रदेश के कई शहर सड़क पर नमाज पढ़ने के विवाद से तप चुके हैं।  इलाहाबाद, मेरठ, रामुपर, वाराणसी, लखनऊ, आजमगढ़, अलीगढ़, बुलन्दशहर एवं ऐसे ही दर्जनों जिले जहां खुलेआम प्रमुख सड़कों को जबरदस्ती घेरकर जुमे की नमाज अदा की जाती है। जो भी इसका विरोध करता है मुसलमानों द्वारा साम्प्रदायिक रंग देने में देर नहीं की जाती।
इसी विषय पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं शिया नेता कल्वे सादिक कहते हैं,‘इस्लाम का काम रास्ता देना है न कि रास्ता रोकना। हमें इबादत के समय ख्याल रखना चाहिए कि हमारी इबादत से किसी को भी कष्ट न पहुंचे।
डॉ. सरदार पटेल पैरामेडिकल कॉलेज से दंत चिकित्सा की पढ़ाई करने वाले डॉ. उमर मुख्तार कहते हैं,‘हमें अल्लाह की इबादत बड़े ही शान्ति प्रिय तरीके से करनी चाहिए। कुछ लोग इबादत के नाम पर सड़क पर नमाज अदा करके शन्ति प्रिय तरीके से करना चाहिए। कुछ लोग इबादत के नाम पर सड़क पर नमाज अदा करे शक्ति प्रदर्शन करते हैं जिससे आमजन को काफी कठिनाई होती है। उस इबादत का कोई मतलब नहीं रह जाता जिसे करते समय किसी दूसरे व्यक्ति को कष्ट पहुंचे। अल्लाह भी इसे स्वीकार नहीं करता।’
बंगाल-
सड़कों पर कब्जा करके नमाज पढ़ना और विरोध करने पर साम्प्रदायिक दंगा करना पश्चिम बंगाल में आज देखा जा सकता है। आए दिन आते समाचार और स्थानीय लोगों की मानें तो शुक्रवार के दिन मुसलमानों द्वारा जबरन सड़क को कब्जाया जाता है और फिर नमाज पढ़ी जाती है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता राजर्षि हलदर कहते हैं,‘शुक्रवार के दिन होने वाली नमाज से पूरा कोलकाता अस्त व्यस्त हो जाता है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के 20 किमी. दूरी तक शुक्रवार को निकलना मुश्किल हो जाता है। साल्ट लेक, निजाम पैलेस जो न्यायालय के दस से बीस किमी. की दूरी पर हैं लेकिन जुमे पर इन रास्तों से निकलना मुश्किल हो जाता है। यह बड़ी ही गंभीर समस्या बनती जा रही है। कई बार तो ऐसा हो जाता है कि बड़े ही महत्वपूर्ण कार्य इसके कारण छूट जाते हैं। वे आगे कहते हैं,‘ जिस प्रशासन की जिम्मेदारी ऐसे आपराधिक कार्यों को हटाने की है वह मदद करते हुई दिखती है। इस भीड़ में पता नहीं कितने मरीज विभिन्न अस्पतालों के फंसे होते हैं। लेकिन कोई नहीं होता है इसे देखने के लिए। ’
अंतर बस इतना...
भारत और विश्व के अन्य देशों में अंतर बस इतना है कि यहां अल्पसंख्यक के गलत काम को भी सही ठहरा दिया जाता है और अगर इनका कोई विरोध करता है तो पहले तो अल्पसंख्यक होने का रोना रोया जाता है या फिर इस्लाम के विरोधी होने की तान छेड़ दी जाती है। ऐसा करने से माहौल साम्प्रदायिक हो जाता है। इसी कारण लोग विरोध करने से कतराते हैं और गलत को सहते जाते हैं। सड़क पर नमाज पढ़ना भी एक ऐसी ही समस्या है। भारत सहित अधिकतर यूरोप के देश इस समस्या से जूझ रहे हैं। फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों ने इसे अपने यहां इस कार्य को अपराध की श्रेणी में डाल दिया और सड़क पर नमाज पढ़ने को पूरी तरह रोक लगा दी है।
इन सात स्थानों नहीं पढ़नी चाहिए नमाज 
-नापाक जगह
-कमेला
-कब्रिस्तान
-सड़क और आम रास्तों में
-ऊंट के बाड़े में
-बेतुल्लाह की छत पर